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18 February 2008

रवि रतलामी के साथ एक मुलाकात

कल रविवार होने के बाद भी सुबह गलती से जल्दी उठना हो गया। चाय और अखबार पान करने के बाद कंप्यूटर ऑन किया तो पाया कि मोडम ने नमस्ते कह दिया है चलने से इनकार। सो एयरटेल वालों को फोन किया जवाब मिला कि सोमवार दोपहर डेढ़ बजे तक ही सुधारा/बदला जाएगा मोडम।और अभी सोमवार को बारह बजे तक एयरटेल का बंदा सुधारकर चला भी गया। तो संडे की सुबह तो ऐसे हुई लेकिन दुपहरी अच्छी गुजरी पूछिए क्यों,न भी पूछें तो हम तो बताएंगे ही। शनिवार से ही रवि रतलामी जी रायपुर में थे और फोन पर संपर्क में,तय यह हुआ था कि रविवार सुबह 11 से दोपहर दो-ढाई बजे तक वह फ़्री रहेंगे तो इस बीच एक मुलाकात हो जाएगी आई रिपिट एक मुलाकात नॉट एक्जैक्टली लाईक "ब्लॉग ट्रेनिंग एट्सेट्रा"। यह सूचना हमने रायपुर और भिलाई के दोनो ब्लॉगर को पहले ही दे दी थी और रायपुर के ही एक और ब्लॉगर जयप्रकाश मानस जी तो खैर उस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता के रूप में ही थे जिसमे शामिल होने रतलामी जी आए हुए थे।

तो करीब साढ़े ग्यारह बजे आरंभ वाले संजीव तिवारी जी हमारे पास पहुंचे,उन्हे दस मिनट का इंतजार करवाया अपन ने (इतना तो अधिकार बनता है) और फिर उनके साथ निकल लिए आयोजन स्थल की ओर,वहां पहुंचे,कार्यक्रम चल रहा था अंतर्राष्ट्रीय लघुकथाकार सम्मेलन व अलंकरण समारोह। यह दो दिवसीय कार्यक्रम था जिसके दूसरे दिन अर्थात रविवार को ही रवि रतलामी जी ने इंटरनेट पर हिंदी और हिंदी ब्लॉग्स पर अपनी बात रखी और इसी दिन रवि जी का सम्मान होना था यहां बतौर कोई साहित्यकार नही बल्कि इंटरनेट पर हिंदीकरण और छत्तीसगढ़ी ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने के कारण। हम पहुंचे तो पाया कि रवि जी अपनी बात पहले ही रख चुके थे। माईक पर तब थे व्यंगकार गिरीश पंकज जी। उन्हें दस मिनट सुनते हुए रवि जी को तलाशा,जब वह मिल गए तो वह मैं और संजीव जी कार्यक्रम हॉल से बाहर प्रांगण में बैठकर बात करने लगें,यूं ही चर्चा हुई थोड़ी बहुत,न तो ब्लॉग जगत की बहसें न ही विवाद आदि की चर्चा न ही "इंटरनेट पर हिंदी बढ़ाने के संकल्प" आदि के बारे में बस रवि जी से कुछ अपनी तकनीकी जिज्ञासाएं शांत की गईं। हम तीनों बैठे बात ही कर रहे थे कि एक-एक करके स्थानीय और भारत के अन्य प्रांतो से आए साहित्यकार आकर साथ बैठने लगे,जैसे कि कोयंबटूर से आए डॉ श्री सी जयशंकर बाबू जो कि अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी में भी ब्लॉग लिखते हैं और खास बात यह कि उन्होनें जानते बूझते अपने ब्लॉग को किसी एग्रीगेटर से नही जोड़ा है। यह सब साहित्यकार रवि रतलामी जी से कार्यक्रम के दौरान परिचित हो चुके थे और इंटरनेट पर हिंदी ब्लॉग्स के बारे मे ज्ञान ले चुके थे। फिर अचानक हमारे नज़दीक आए समीक्षक श्री प्रेम दुबे जो कि एम ए हिंदी के दौरान हमें पढ़ा भी चुके हैं। उनके आकर हमारे पास बैठते ही और लोग आने लगे और ऐसे ही हम तीन से आठ-दस लोग हो गए साथ बैठे। लघुकथाकार महेश राजा व संवेदनाओं के पंख ब्लॉग वाले महेश परिमल जी और एटा से आए एक बुजुर्ग साहित्यकार,हरिभूमि रायपुर के स्थानीय संपादक श्री संजय द्विवेदी और एक दो और साहित्यकार। सबसे परिचय हुआ बातें हुईं। अधिकतर साहित्यकार दो दिन से चल रहे कार्यक्रम की खामियों पर चर्चा कर रहे थे।

इसी बीच हमारे बीच आए श्री लक्ष्मण मस्तूरिहा जिनकी रचना आवारा बंजारा पर पहले डाली जा चुकी है। लक्ष्मण मस्तूरिहा जी से हम सबने मस्तूरिहा जी से निवेदन किया कि वह अपनी प्रसिद्ध रचना " मोर संग चलव रे" का सस्वर पाठ करें,और उन्होने पाठ किया भी जिसे रवि रतलामी जी ने फौरन अपने डिजिटल कैमरे में रिकॉर्ड किया। दर-असल रवि रतलामी जी आवारा बंजारा के मस्तूरिहा जी वाली पिछली पोस्ट पर ही कमेंट कर यह मांग कर चुके थे कि मस्तूरिहा जी की इस रचना का एम पी थ्री सुनाया जाए या उपलब्ध करवाया जाए। आवारा बंजारा को इसकी एम पी थ्री कहीं मिली नही थी और क्यों नही मिली इसका राज मस्तूरिहा जी ने खोला। उन्होने बताया कि यह रचना ग्रामोफोन के तवे पर उपलब्ध थी। सीडी में अब तक उपलब्ध नही है,किसी ने तवे से सीडी बनाई भी होगी तो जानकारी नही। खैर! अब तो रतलामी जी ने उनका सस्वर पाठ ही रिकॉर्ड कर लिया।

यह सब बातें चलती रही करीब पौने तीन बजे तक,सूचना मिली कि अंदर हॉल में मुख्यमंत्री और अन्य अतिथिगण आ चुके हैं तो अलंकरण समारोह शुरु होगा अब,तो हम हॉल के अंदर आ गए । जहां बैठे देखा कि अगली पंक्ति में पूर्णिमा बर्मन जी बैठी हैं उनका भी सम्मान होना था,उनके साथ ही नेपाल से आए कुमुद अधिकारी भी थे।न्यूज़ीलैंड से आए रोहित हैप्पी भी हॉल में मौजूद थे। बातें नही हो पाई इन सबसे। रवि जी,मैं और संजीव तिवारी जी बैठे देखते रहे कार्यक्रम,फिर रतलामी जी का नाम भी पुकारा गया और बताया गया कि इनका सम्मान क्यों किया जा रहा है,हॉल तालियों से गूंजा आखिर कार्यक्रम छत्तीसगढ़ में हो रहा था और छत्तीसगढ़ी ऑपरेटिंग सिस्टम बनानेवाले का सम्मान हो रहा था।


बस इसके बाद हम वहां पांच मिनट और रुके रवि जी को बधाई देते हुए हम और संजीव तिवारी जी दोनो ही निकल लिए क्योंकि साढ़े तीन बज गए थे और संजीव जी को भिलाई जाना था। रतलामी जी को शाम सात बजे वापसी की ट्रेन पकड़नी थी।

हम बातों में ऐसे खोए रहे मिलने वालों के साथ कि फोटो लेने का ख्याल ही नही आया,सो फोटो दिखेंगे रवि रतलामी जी के ब्लॉग्स पर। अपन को तो अच्छा लगा वहां साढ़े तीन घंटे रहना और बातचीत करना!! अरे हां ज्ञान दद्दा को एक बात तो बताना भूल ही गया, रवि रतलामी जी तो रायपुर के ब्लॉगर्स के लिए रतलामी सेंव लेकर पहुंचे थे ;)


23 टिप्पणी:

काकेश said...

सही वर्णन.साइट भी चमक रही है.सब रवि जी की किरपा है क्या?

आशीष said...

जय हो, रतलामी सेव मुझे भी खाना है

बाल किशन said...

अच्छा संस्मरण बताया.
रवि जी को बधाई.
आपको भी. इसे प्रस्तुत करने के लिए.

mamta said...

विस्तृत और सम्पूर्ण विवरण मुलाकात का पढ़कर अच्छा लगा।

पर भाई अगली बार से जरा फोटो-शोटो भी ले लिया करें। :)

रवि जी को एक बार फ़िर से बधाई।

संजय बेंगाणी said...

अनुभव साँझा करने के लिए साधूवाद.

प्रशांत तिवारी said...

मुझे समय निकाल कर आना था .आपके पोस्ट को पढने के बाद मुझे यह अहसास हुआ .

Shiv Kumar Mishra said...

रवि रतलामी जी को बधाई. बहुत बढ़िया लगा वर्णन, संजीत. और हाँ, काकेश जी अच्छा कहा, ब्लॉग और चमकीला हो गया है.

Udan Tashtari said...

मुलाकात का ब्यौरा उपलब्ध कराने का आभार. अच्छा लगा.

दिनेशराय द्विवेदी said...

रवि भाई को बधाई।
कोटा में रतलामी सेव के नाम से सेव की एक किस्म बनती है। मुझे बहुत पसंद है। रतलाम स्टेशन से एक बार सेव खरीद लिए थे वे बिलकुल पसंद नहीं आए। एक बार किसी से मंगाए तो लहसुन वाले मिले जो हम खाते नहीं। अब देखते हैं कब मौका मिलता है प्रसिद्ध रतलामी सेव की बेहतरीन किस्म का स्वाद चखने का?

Gyandutt Pandey said...

संजीत, रवि के साथ मुझे कई विषयों पर चर्चा करनी है। कण्टीन्यूड ब्लॉगिंग भी एक विषय है। मुझे मालूम नहीं कि रवि से फेस टू फेस सम्प्रेषण कैसा होता है। मैं तो बात करने में बड़ा असहज सा होता हूं।
देखें कब कैसे मिला जाता है।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

थोडा ठहरो कुछ समय मे ऐसी तकनीक आ जायेगी कि तुम्हारे ब्लाग पर आने वालो को सीधे ही रतलामी सेव की फाँक मिल जायेगी, तब तक पढकर ही संतोष करना होगा। :)

महावीर said...

संस्मरण बड़े रोचक ढ़ग से प्रस्तुत किया है। रवि रतलामी जी को बधाई।

anitakumar said...

वाह संजीत जी आप का इतवार तो बहुत अच्छा गुजरा। रवि जी को बधाई। रतिलामी सेव मेरे लिए भी बचा के रखना भाई, सब ज्ञान जी को मत खिला देना…:)

छत्‍तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

धन्‍यवाद संजीत भाई, अरे भाई हम तो बिलागर गियान पोटली में बांध कर लाने गये थे और लाये भी, वहां तो लघु - लघु पर वृहद चर्चा हो रही थी और सबै लघु लिखने वालों से मेल मुलाकात भी हो गई, बहुतै मजा आया और डॉ. परिमल जी नें मजा को दुगना कर दिया । अरे हां, डाक्‍टर साहब लिंक लगा दे हंव, अब मत खिसियाबे मोला ।

अजित वडनेरकर said...

रतलामी जी से मुलाकात बढ़िया रही.....बखान रतलामी सेव का भी हो गया।

Mired Mirage said...

आपका दिन तो बढ़िया रहा । हमें इस मिलन के बारे में बताने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती

Tarun said...

रवि जी को बधाई आपको धन्यवाद लेकिन रतलामी सेव खाने को मन तो हमारा भी करने लगा।

anuradha srivastav said...

अलसाये इतवार को उपयोगी बना लिया तुमने तो सबसे मुलाकात करके .............

' said...

प्रस्तुत करने के लिए साधूवाद

ambrish kumar said...

achha hai ,pratikrya ke sath likhna bhi suru kare.ravi ji to brand ban gaye hai.
ambrish

ashwini kesharwani said...

posting achchi lagi,raipur nahi pahuch pane ka dukh hua.

अनूप शुक्ल said...

सम्मान समारोह के विवरण जानकर अच्छा लगा। फोटो हम देख चुके। जहां संजीत हैं वे अच्छी हैं। :)

Dr. Chandra Kumar Jain said...

BHAI SANJEET JI,
RAVISHANKAR MERE MITRA AUR SAHPATHI RAHE HAIN, RAJNANDGAON KE DIGVIJAY COLLEGE MEIN.
AAPKI IS MULAKAT SE LAGA MAINE BHI KAR LI MULAKAT APNE AZIZ DOST SE.
SHUKRIYA...BATA DOON KI RAVISHANKAR AARAMBH SE MEDHAVI RAHE.
MATHEMATICS MEIN VE COLLEGE-LIFE MEIN HI RESEARCH SCHOLOR KI TARAH NAAM KAMA CHUKE THE.
HAMEN AISE QABIL DOST PAR NAAZ HAI.

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