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25 February 2008

विनोद कुमार शुक्ल और उनकी सादगी

प्रसिद्ध कवि-लेखक श्री विनोद कुमार शुक्ल की सादगी और अंतर्मुखी स्वभाव के बारे मे काफी कुछ सुना था। कल देख भी लिया। कल शाम रायपुर प्रेस क्लब के हॉल में छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी ने चयनिकाओं के लोकार्पण और प्रसिद्ध समीक्षक श्री राजेंद्र मिश्र की किताब "गांधी अंग्रेजी भूल गया " पर एक चर्चा आयोजित की थी। इसमें वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के कुलपति अच्युतानंद मिश्र, वरिष्ठ अधिवक्ता व विचारक कनक तिवारी, के साथ युवा आलोचक जयप्रकाश व जयशंकर और बहुत से साहित्यकार व पत्रकार भी मौजूद थे। कार्यक्रम में पहुंचे प्रसिद्ध कवि विनोदकुमार शुक्ल चुपचाप हॉल में आए और सबसे पीछे की कुर्सी पर अकेले बैठे गए,नज़र पड़ने पर छत्तीसगढ़ हिंदी ग्रंथ अकादमी के संचालक व वरिष्ठ पत्रकार रमेश नैयर ने उनके नज़दीक जाकर मंच पर चलकर बैठने का आग्रह किया जिस पर शुक्ल जी ने इनकार कर दिया। इस पर नैयर जी नें एक तरह से ज़िद करके उन्हें उठाया और अपने साथ मंच की ओर ले चले। पहली पंक्ति में एक कुर्सी खाली देखकर श्री शुक्ल मंच पर जाने से इनकार कर दिए और यह कहते हुए वहीं बैठ गए कि नही जाऊंगा मंच पर। इसपर फिर उन्हें ज़िद करके मंच पर बिठाया गया।


शुक्ल जी इतने अंतर्मुखी व्यक्तित्व के हैं कि किसी से जल्दी खुलते नही,बात करने में झिझकते हैं,अपने मे ही खोए हुए से रहने वाले। शायद कम बोलने और अपने में खोए हुए रहने का ही असर है कि वह ऐसी उत्कृष्ट रचनाएं लिख पाते हैं। वो नही बोलते, उनकी रचनाएं बोलती हैं

अब बात करें समीक्षक राजेंद्र मिश्र की किताब "गांधी अंग्रेजी भूल गया है" की,यह किताब दरसल पिछले कुछ बरसों में जनसत्ता और लोकमत समाचार अखबारों में छपे राजेंद्र मिश्र के कॉलम को संग्रह कर किताब के रूप में प्रकाशित है। इसे किताब की शक्ल में प्रकाशित करवाने का श्रेय श्री अच्युतानंद मिश्र को जाता है।

आवारा बंजारा की कोशिश है कि इस किताब के कुछेक अंश इस ब्लॉग पर उपलब्ध करवाए जा सकें।



21 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी 25/2/08 17:40  

बहुत लोग हैं जो विनोद जी की तरह अन्तर्मुखी होते हैं, लेकिन उन की रचनाएं खूब बोलती हैं।

काकेश 25/2/08 17:57  

अनतर्मुखी तो हम भी हैं जी पर हमारी रचनाऎं तो नहीं बोलती...उनको बुलवाने का उपाय बताइये जी.

बाल किशन 25/2/08 18:05  

हमे इन्तजार है उस किताब के आपके ब्लॉग पर प्रकाशित होने का.

yunus 25/2/08 18:20  

विनोद जी को जब मोदी फाउंडेशन का अवॉर्ड मिला था तो उन्‍हें मुंबई में देखा सुना था । उन दिनों हमने ताज़ा ताज़ा उनकी पुस्‍तक 'दीवार में एक खिड़की रहती है' खत्‍म की थी । अदभुत अनुभव हैं उस दिन के । पूरे आयोजन में वो खुद को मिसफिट से मानते हुए...सहमे सिकुड़े बैठे रहे । अपना भाषण दिया जो दिव्‍य था । बहुत अच्‍छा लगा ।

Gyandutt Pandey 25/2/08 19:51  

विनोद जी से मैं कुछ अवगुण कॉमन रखता हूं।

Samrendra Sharma 25/2/08 21:54  

ठीक कहा तुमने कह्ते है ना सिम्पल लिविग एन्ड हाइ थिकिन्ग

anitakumar 25/2/08 22:39  

अब विनोद जी से मिलवाया है तो उनकी कविताएं भी सुनवाइए॥वैसे एक विनोद जी को हम भी जानते है वो भी अंतर्मुखी हैं …॥:)

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari 25/2/08 22:42  

धन्यवाद, शुक्ल जी एवं मिश्र जी के संबंध में जानकारी देने के लिए ।

bhuvnesh 25/2/08 22:42  

विनोदजी को पढ़ने का सौभाग्‍य प्राप्‍त नहीं हुआ है। अब पढ़ने की इच्‍छा तीव्र हो उठी है।


मिश्रजी की पुस्‍तक के अंश मैं भी पढ़ना चाहूंगा।

Lokesh Sharma 25/2/08 23:11  

आपने अच्छा परिचय करा दिये. काफ़ी दिनो से शुक्ला जी कि उपन्यास "A Window lived in a Wall" पढना का मन है. लेकिन यहा पर मिल पाना मुश्किल है. कभी मौका मिला तो जरुर पढुंगा.

मीनाक्षी 25/2/08 23:19  

विनोद जी का परिचय दिया है तो उनकी रचनाएँ भी पढ़वाएँ. इंतज़ार है.

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia 26/2/08 01:59  

शुक्ला सर कृषि वैज्ञानिक है और उन्होने मुझे पढाया भी है। हम लोग यूथ फेस्टीवल मे नाटक मे मदद के लिये उन्ही के पास जाते थे। आप उन्हे अंतरमुखी कह रहे है तो मुझे अचरज हो रहा है। हमारे और किसानो के साथ तो वे हमेशा से खुले रहे। मुझे लगता है कि किसी कारणवश अब वे ऐसे हो गये होंगे। यह तो कडवा सच है कि प्रदेश के बाहर के लोगो ने उन्हे अधिक समझा और सम्मानित किया। पर प्रदेश मे उन्हे उतना सम्मान नही मिल पाया।

soaurabh 26/2/08 10:17  

aisa hi ek prasang mujhe bhi yaad hai, tab namwarji aaye the,shuklji sabse peechhe baithe huye unke sabse gambheer shrota the. namwarji ne aagrahpurvak unhe samne bulaya aur apni speech main muktibodh ko yaad karne ke turant baad shuklji ko unhi ki tarah hindi sahity ka shalaka purush kaha. vishay se thoda hatkar ek baat aur batana chahunga,aayogan bhishm sahni ki smriti par tha lekin kisi waqta ne unke sambandh main ek shabd bhi nahi kaha,is baat ne bhishm ke chahne walon ko jarur dukhi kiya hoga.

आस्तीन का अजगर 27/2/08 13:50  

हिंदी उपन्यासों में अगर दस बेहतरीन किताबों का जिक्र करें, तो विनोद कुमार शुक्ल का नाम एक से ज्यादा बार लिया जा सकता है. मैंने कई बार कोशिश की कि हिंदी उपन्यासों की फेहरिस्त बनाऊं, बहुत लंबी वह कभी भी नहीं बनी. अगर वैश्विक स्तर पर भी उपन्यास को देखें, तो विनोद कुमार शुक्ल का नाम वहां होना ही है, अगर चुनने वाले ने उन्हें पढ़ा है. उनकी किताब पढ़ना उनके साथ लंबी सैर पर जाना है और उन्हें एक तरह से सुनना है एक बालकौतुक के साथ ऐसी बातें करना, जिनके मायने गहरे हैं, परतों में बहुत मासूमियत के साथ खुलते हैं. उनकी कविताओं के बारे में भी यही कहा जा सकता है. छत्तीसगढ़ी होने के कारण उन्हे पढ़ना एक तरह से गरियाबंद या सिहावा या नारायणपुर लौटना है और उन्हें पढ़ना एक मनुष्य का प्रकृतिस्थ हो जाना भी है. विनोद कुमार शुक्ल में एक आदिवासी रहता है. मैं उसे तंग किये जाने के सख्त ख़िलाफ हूं.
और हम पता नहीं क्यों उम्मीद करते हैं कि लेखक को उठना, बैठना, बोलना, खुरपेंच लगाना, भाषण देना, एक दूसरे को नीचा दिखाना, गैंगवार करना आना चाहिए. विनोद कुमार शुक्ल गर ये सब करते तो पता नहीं वह सब कैसे लिख पाते जो उन्होंने लिखा. लेखक को लिखना चाहिए और वही उसकी इकलौती कसौटी, पहचान और योगदान होना चाहिए. रायपुर के मध्यवर्गीय और मीडियॉकर बुद्धिजीवी वर्ग को कोशिश भी नहीं करनी चाहिए कि विनोद कुमार शुक्ल को असहज स्थितियों में डालकर परेशान करे. रायपुर और उस तरह के किसी भी शहर का सभ्य समाज आदिवासियों को रेड इंडियन्स या चिड़ियाघर का आइटम समझता है. उन्हें विनोद जी को कोंचना नहीं चाहिए, सिर्फ इसलिए कि वे उनके सजदे, दुरभिसंधियों, गोष्ठियों, भाईचारे, गैंगवार, माफियागिरी में शामिल नहीं हैं. वे इस वक़्त हिंदी में लिखने वाले अकेले ऐसे शख्स हैं, जिन्हें आप गाब्रियल गार्सिया और मिलान कुंदेरा जैसे लेखकों की बगल में रखकर पढ़ सकते हैं.

anuradha srivastav 28/2/08 12:56  

विनोद कुमार शुक्ल जी के बारें में जितना तुमने लिखा और जो कुछ भी टिप्पणियों के द्वारा पता चला उससे उनकी रचनाधर्मिता के प्रति जिज्ञासा बढ चुकी है। अब उनकी कुछ रचनाऒं से भी रुबरु करवा दो।

Dr. Chandra Kumar Jain 6/3/08 19:22  

BANDHU,
MAIN US SHAHAR KA HI HUN JANAN VINODKUMAR SHUKLA JAISE
SAHITYA SADHAK NE JANMA LIYA HAI. RAJNANDGAON...LIHAZAA UNHEN JANANE,SUNNE,SAMAJHNE KE MAUKE BHEE MILTE RAHE HAIN.
RANANDGAON MEIN 29 NOVEMBER 2004 KO VINOD JI,KEDARNATH SINGH AUR VISHNU KHARE KE KAVYAPATH-PRASANG PAR SANCHALAN KA SAUBHAGYA MUJHE MILA THA.
YAADGAR THA VAH AAYOJAN.
AAPKE TAZAA POST NE
MERI VAH YAAD TAZAA KAR DEE.
SACHMUCH, VINOD JI APNEE HASTI SE CHUCHAP MILTE RAHNE VALE AISE KALAMKAR HAIN JINHEN KOI BAHREE CHAMAK-DAMAK KABHI LUBHA NA SAKEE.LEKIN UNKI KALAM KII CHAMAK AUR ROUSHNEE MEIN ZINDGI KE ANDHERE HAATH MALTE RAHE HAIN.
SARTHAK POST KE LIYE SHUKRIYA...

Deepak 7/3/08 19:59  

मेरा मानना है की
असल में वो बोलते है ,हम भाषण के बीच जी रहे है इसीलिए हमें उनका वास्तविक बोलना कम लगता है और अपना ज्यादा बोलना वाजिब.

प्यार लफ्जो की दुनियदारी नहीं ,
ये आँखों की भाषा है ,दील तक जाती है.

संजीत जी मुझे आपका यह ब्लाग बहूत अच्छा लगा इसीलिए आपके लिए भी .........

आवारगी है यारो ,या की मयकदा है ""
जाम ए सुरूर में की देखो,दुनिया बह चली "

Sanjeet Tripathi 7/3/08 23:09  

शुक्रिया दीपक साहब, शिकायत बस यही है कि आप अपना पता ठिकाना कुछ छोड़ नही गए इधर!!

deepakrajim 8/3/08 14:06  

Residential address.
लीजिये आपकी शियाकत दूर कर देते है
दीपक शर्मा ,मंगफ़ ,फ़हाहील ,कुवैत,
पोस्ट बॉक्स न -४७०७६ कोड ६४०२१ ,

permanent adress
दीपक शर्मा ,पटेवा (नवापारा राजिम),रायपुर छत्तीसगढ़
ईमेल deepak_lab@yahoo.com

deepakrajim 8/3/08 14:09  

Residential address.
लीजिये आपकी शियाकत दूर कर देते है
दीपक शर्मा ,मंगफ़ ,फ़हाहील ,कुवैत,
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neeraj tripathi 23/3/08 18:20  

वो नही बोलते, उनकी रचनाएं बोलती हैं। यह पंक्ति बहुत अच्छी लगी ...

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