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22 February 2008

प्रेम दुबे की एक कविता- "स्त्री"

हिंदी साहित्य में एम ए करने के दौरान आवारा बंजारा को जिन गुरुओं का मार्गदर्शन मिला उनमे से एक हैं श्री प्रेम दुबे। कवि-समीक्षक श्री दुबे छह महीने पहले ही सेवानिवृत हुए हैं उनके ही शब्दों में हिंदी के प्रोफेसर की तरह काम करता था और वैसे ही रिटायर हो गया। इन्होनें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के उपन्यासों, मध्यप्रदेश की बोलियों, हिंदी व भाषा विज्ञान में पृथक शोधोपाधि प्राप्त की है। सेवानिवृत होने के बाद अब कंप्यूटर और इंटरनेट की अबूझ दुनिया को बूझने की कोशिश कर रहे हैं। आवारा-बंजारा को उन्होने अपने कविता संग्रह "होना सब कुछ और न होना कुछ भी" की प्रति भेंट की जिसमे से एक लंबी कविता "स्त्री" ने ख़ासा प्रभावित किया।




स्त्री

वर्जित फल की सज़ा में
ढकेल दिया गया
अस्तित्व को
ज़मीन पर
स्वर्ग से।

सज़ा आदम को नही
मुझे मिली
जो हव्वा है अब तक
अस्तित्व के अंधकार में।

दुरूह जंगलों में
शिकार
पशुओं का नही
हर बार
मेरा ही।

हर जीत
आदम के कबीलों की
रही अधूरी
गायों
बकरियों
और संपत्ति के साथ
न परोसी गई जब-तक
औरत
बनाम मैं
बनाम हव्वा।

बांधा पशुओं को
खूंटे से बलि के लिए
दूध के लिए
और
विजय का निशान
टाँक दिया गया
मेरी देह पर।

हुए समझौते
लेकिन
हव्वा बाँधी रही खूँटों से
घर को सजाने।

सभ्यता के नियमों ने
बनाए
युद्ध के
शांति के नियम
मेरे लिए नही
आदम की जात के लिए।

कबीले में
हर मर्द आदम
एक-एक
आदम
अनेक-अनेक
हव्वाएं।

जताने स्वामित्व
बुदबुदाई गई ध्वनियाँ कुछ
अलाव की आग में
और टीप दी गई
फाँक में
रक्त की बूँद
ऊपर
केशों के बीच
समांतर में ठीक वैसी ही
जैसी
नीचे हुआ करती थी
जंघाओं की संधि में।

चमकी हथकड़ियां
और
बना दी गई चूड़ियाँ
बन गई पाँवों की बेड़ियाँ
पायज़ेब
बना दी गई नाथ की डोरी
नथुनी
गले की फाँद
बन गई हार
माथे पर टीका
ठीक वैसे ही
जैसे बलिपशु के माथे पर्।

हाँ
हव्वा भी है
सजाया सँवारा बलिपशु ही
जिसे देख
खिल जाती है बांछे
गाहे-बगाहे
पुरुष की।

कबीलों की लड़ाई में
सबसे क़ीमती सामान
मैं ही थी
हव्वा
हव्वाएं
हव्वा की जात
देखते ललचाहट की जुगुप्सा से
बार-बार
शत्रु जिसे
विजय का चिन्ह थी जो
आदम की मर्दानगी का।
रौंदा मुझे बर्बर आक्रमणों ने
बार-बार
भेजा
मर्दानगी को योद्धाओं ने
हव्वा की देह पार
हर बार।

चौकसी
बड़ी थी तेज
सुरक्षा का घेरा इतना दृढ़
कि चौखटों में की गई क़ैद
लंबा आच्छद
चेहरे पर
कि नज़र न चढ़ पाऊँ
किसी के
और भागूँ
तो बजे छुन-छुन
पाँवों की बेड़ियां।
गुलामी के अंतहीन
गलियारों में भटकती हूं अब तक
हव्वा यानी मैं
घिसती हूं साबून
और साबुन की तरह
घिसी जाती हूं मैं
घर की चौखट से
ग्लोबल
बाज़ारों तक।

आज़ादी इतनी
कि छपकी जाती रही कपड़ों की तरह
माँजी जाती रही बर्तनों की तरह
सँजोई जाती रही अन्त:पुरों में
जैसे
छिपाकर रखे जाते हैं आभूषण
बैंक के लॉकरों में
रखी जाती रही गिरवी
चौपड़ों पर
आदम की नैतिकता को ढोने।

आदम की सभ्यता
और
हव्वा की मुसीबतें
कि आज़ादी मिलती है मुझे
मय साज़ो-सामान
मर्दों के हाट में
ठेकों पर बेचने के लिए
देखभाल की शर्तों के साथ
ठीक वही हथकड़ी
वही बेड़ियां
वही रक्त-चिन्ह माथे पर
अब भी ढोती है
हव्वा
तलाक़-तलाक़-तलाक़
की तिकोनी दीवारों के बीच।

हर फ़ैसले में
चाहे जीते वह
या मैं
हारती हूँ मैं ही
आज़ाद
की जाती हूँ
अपनी गुलामी में

आज़ादी
वापरे हुए
किसी पुराने माल की तरह
सजाने के लिए
किसी कबाड़ की नुमाईश
जहाँ
लोग
हँसते हैं
लगाते हुए बोलियाँ
ज़ंग ढूँढते हुए माल का
लगाते नुक़्स
कि सौदा महँगा है
कम दामों पर भी।

यूनान
और रोम
के हाटों से शुरु बोलियाँ
जारी है अब भी
ठहाकों के बीच

मियामी के सागर-तट से
इंटरनेट
के बुद्धू-बकसों तक
अब भी
हो रही टाँगों की
वक्ष
और कमर की पैमाइश
ठीक वैसे ही
हुआ करती थी जैसे
उन दिनों।

दिए जा रहे हैं ख़रीदार
बोनस-अंक
मुस्कुराहटों पर
हाज़िर-जवाबी पर
करने तसदीक
कि बढ़िया है चीज़
सब तरफ से ठीक-ठाक।

बींधती जाती है
भीड़ की
हँसी
और हया से
दोहरी होती जाती है हव्वा
मन की परतों
के भीतर
गहरे अनावृत
सृष्टि के आरंभ में
ढकेली जाकर स्वर्ग से
एक बार
ढो रही है सज़ा की सलीब
लगातार
अनन्त-यात्रा में।

आदम ने
रच लिया है स्वर्ग
फिर अपना
अपनी तरह
परतंत्र थी हव्वा तब भी
और है
अब भी।

सज़ा
आदम को नही
मुझे मिली
जो
हव्वा है अब तक
समूची आदमजात के लिए
संदेह में धुँधुआता है मन
आज
फिर-फिर
कि सज़ा देने वाला ईश्वर
ख़ुद
हो-न-हो
रहा होगा आदम ही।

कौन रही होगी
मेरी आदिमाता
हव्वा?

ढोती होगी सलीब
क्या आज तक वह भी
स्वर्ग में
ठीक वैसे ही
ढोती हूँ औरतपन की सलीब
जैसे
मैं यहाँ
ठीक इसी वक्त।




13 टिप्पणी:

Gyandutt Pandey said...

यह बहुत अच्छा लगा कि श्री दुबे कम्प्यूटर तकनीक को इस उम्र में अपनाने का जज्बा रखते हैं। अपने महत अनुभव और इस तकनीक के प्रयोग से वे हम सब के नित्य के साथी बन सकते हैं। कि नहीं?

mamta said...

कविता मे बहुत सार्थकता है।

बाल किशन said...

श्री दुबे से और उनकी रचना से परिचय करवाने के लिए साधुवाद स्वीकारें.
ज्ञान भैया ने सही कहा है ये हौसला प्रेरणा दायक है.

बाल किशन said...

श्री दुबे से और उनकी रचना से परिचय करवाने के लिए साधुवाद स्वीकारें.
ज्ञान भैया ने सही कहा है ये हौसला प्रेरणा दायक है.

छत्‍तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

श्री दुबे सर को मेरा प्रणाम, आशा है उनकी और कवितायें पढने को मिलेंगी ।

धन्यवाद ।

anuradha srivastav said...

दिल को छू लेने वाली..............

anitakumar said...

कविता बहुत ही मर्मस्पर्शी है और एकदम सत्य ब्यां करती। दूबे जी को बारंबार धन्यवाद जो पुरुष हो कर स्त्री पर इतनी संवेदनशील कविता लिखे। अपने से पहले आयी टिप्पणियों को देख इस बात पर गौर किए बगैर नहीं रह सकी कि पुरुष पाठकों ने कविता के बारे में कुछ नहीं कहा सिर्फ़ उसके रचियता पुरुष का स्वागत किया और महिला पाठक ने कविता की सार्थकता पर टिपियाया। क्या अर्थ निकाला जाए।

रंजू said...

सच में बहुत ही अच्छी कविता है ..दिल को छू जाने वाली है इस में !शुक्रिया इसको यहाँ पढ़वाने का संजीत जी !

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छी कविता है। कई बार पढ़ी। पढ़वाने के लिये शुक्रिया।

सजीव सारथी said...

बहुत मर्मस्पर्शी कविता.... धन्येवाद संजीत भाई

मीनाक्षी said...

स्त्री पर लिखी गई रचना मर्मस्पर्शी है. भावभीनी रचना पढ़वाने के लिए दूबे जी और संजीत जी दोनों का ही बहुत बहुत शुक्रिया.

Mired Mirage said...

बहुत ही सुन्दर व स्त्री के मन को पढ़कर लिखी गई कविता ।
घुघूती बासूती

Dr. Chandra Kumar Jain said...

MARMSPASHI KAVITA...

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आपकी राय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।