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01 November 2012

राज-शाही 'गढ़ों' का प्रतीक नहीं है छत्तीसगढ़!

                                                                 इतिहासकारों से क्षमा मांगते हुए
                                  राज-शाही 'गढ़ों' का प्रतीक नहीं है छत्तीसगढ़!
                                                    सनत चतुर्वेदी
''वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान''। यह प्रसिद्ध पंक्ति सुमित्रानंदन पंत की है। अच्छे और सच्चे कवि सदा अपनी समस्त संवेदनाओं को समेटकर अंतर्मन के भावों को शब्दों के रूप में प्रकट करते हैं चाहे व हर्ष हो या विवाद। ऐसे ही अंचल के पुरातन विस्मृत कवियों को नमन करते हुए यहां पर उन्हें याद कर रहे हैं जिन्होंने 15-17वीं शताब्दी के दौरान अपनी रचनाओं में 'छत्तीसगढ़' शब्द का प्रयोग किया है। इन कवि-पुरखों में गोपाल मिश्र, बाबू रेवा राम और दलराम के नाम लिए जा सकते हैं।

अंचल के इन ज्ञात कवियों से सबसे पुराने खैरागढ़ राज के कवि दलराम हैं, उन्होंने 1487 के आसपास लिखी रचनाओं में छत्तीसगढ़ का उल्लेख किया है। इसका मतलब यह है कि 1487 के पहले से छत्तीसगढ़ शब्द प्रचलित था। इतिहासकारों का मानना है कि इसके पहले इस क्षेत्र को दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। इसके बाद रतनपुर राज्य के हैहयवंशी राजाओं के (950-1750) काल में राज-काज की दृष्टि से जो 36 परगना-जनपद थे, इन्हें ही 'गढ़' मानकर छत्तीसगढ़ नाम व्यवहार में आया होगा। स्पष्टत: मराठा काल में छत्तीसगढ़ शब्द का खुलकर प्रयोग होने लगा। रतनपुर राज्य के 36 जनपदों में शिवनाथ के उत्तर में 18 जनपद थे- रतनपुर, मारो, विजयपुर, खरौद, कोटगढ़, नवागढ़, सोंठी, ओहर, पंडरभटा, सेमरिया, मंदनपुर (चांपा) और कारकट्टी। शिवनाथ के दक्षिण 18 जनपद थे- रायपुर, पाटन, सिमगा, सिंगापुर, लवन, अमोरा, दुर्ग, सारधा, सिरसा, मोहेंदी, खल्लारी, सिरपुर, फिंगेश्वर, राजिम, सिंगारगढ़, सुअरमाल, टेगनागढ़ और अकलबाड़ा। इन 36 जनपदों (जिन्हें गढ़ मान लिया गया) में सिर्फ तीन-चार नाम ही ऐसे हैं जिनमें गढ़ शब्द प्रयुक्त हुआ है, शेष में नहीं।

अब सवाल यह उठता है कि हैहयवंशी राज्य के जनपदों को 'गढ' क्यों कहा गया जबकि इस अंचल में दर्जनों ऐसे स्थान हैं जिनके नाम के साथ गढ़ शब्द आज भी जुड़े हुए हैं। जैसे- रायगढ़ (सरगुजा), पामगढ़ (बिलासपुर), सारगंढ़, धर्मजयगढ़, अंतागढ़ (कांकेर), भैरमगढ़ (बस्तर), खैरागढ़, डोंगरगढ़ आदि। ये गढ़ के नाम सारे क्षेत्र रतनपुर राज्य से अलग रहे हैं। रामगढ़ सरगुजा में है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम वनवास काल में दण्डाकरण्य आए थे। उस दौरान सरगुजा क्षेत्र की पहाडिय़ों में आश्रय लिया था, इसलिए उस पहाड़ी क्षेत्र का नाम 'रामगढ़' पड़ा। रायगढ़ अलग रियासत थी। छत्तीसगढ़ में 12 रियासतों का उल्लेख मिलता है जिनमें बस्तर, कांकेर, राजनांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान, कवर्धा, सक्ती, रायगढ़, सारंगढ़, सरगुजा, उदयपुर-धर्मजयगढ़ और चांगमखार। इन रियासतों में कई ऐसे स्थान थे जिनमें गढ़ शब्द शामिल हैं। बस्तर में भैरमगढ़, कांकेर में अंतागढ़ ऐसे ही नाम हैं। डोंगरगढ़, जहां बम्बलेश्वरी देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। कहने का तात्पर्य यह कि रतनपुर राज्य के 36 जनपदों (गढ़ों) के आधार पर छत्तीसगढ़ नाम पड़ा, यह तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। दरअसल, गढ़ शब्द को सीमित अर्थों में मान लिया गया, मालूम होता है। गढ़ शब्द के प्रचलित अर्थों में और भी मायने प्रयुक्त होते रहे हैं। 'गढ़' शब्द का इस्तेमाल सामान्यत:उस रूप में भी होता है जहां खास चीज की बहुलता होती है या फिर वह स्थान जहां व्यक्ति विशेष या विशेष गुणों की छाप जीवंत होती है। यह अलग बात है कि समय के साथ नाम के कारणों को जानने की महत्ता या जिज्ञासा कम हो जाती है अथवा काल के प्रवाह में मूल शब्द अपभ्रंश होकर अपनी पहचान खो बैठते हैं।

घूम-फिरकर बात वहीं पहुंचती है, आखिर इस अंचल का नाम छत्तीसगढ़ कब और कैसे पड़ा? रामायणकाल में इसे दंडाकारण्य और बौद्धकाल में महाकांतार, के अलावा दक्षिण कोसल नाम से भी यह क्षेत्र उल्लेखित होते रहा है। हैहयवंशी राजा सन् 950 के आसपास यहां आए थे। ऐसा इतिहासकारों का मत है। जब हैहयवंशी यहां आए तब भी इस क्षेत्र का कोई-न-कोई तो अवश्य रहा होगा? क्या नाम हो सकता है? इस सवाल का सहजता से उत्तर देना या अनुमान लगाना कठिन है।

इस कठिनाई के बावजूद कुछेक बिन्दुओं पर इतिहासकारों को अवश्य गौर करना चाहिए। छत्तीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र महाकोशल है। महाकोशल की अघोषित राजधानी जबलपुर है। जनश्रुति हैं- जबलपुर का नाम वैदिक काल के ऋषि की याद में है। ऋषि जब्बाल का आशय नर्मदा क्षेत्र में ही था। जब्बाल से धीरे-धीरे वह पौराणिक नाम जबल बना और फिर जबलपुर। नर्मदा घाटी का यह क्षेत्र अति प्राचीन है। पुरावेत्ताओं के अनुसार नर्मदा घाटी के आसपास प्राचीन प्राचीन सभ्यता थी। छत्तीसगढ़ क्षेत्र वस्तुत: नर्मदाघाटी क्षेत्र का ही विस्तार है। इस क्षेत्र में घनघोर जंगल थे। और यह वैदिक काल में ऋषि-मुनियों की तपोभूमि थी। पौराणिक काल के कुछेक ऋषियों के यहां होने का उल्लेख मिलता है। जैसे यह माना जाता है कि सिंहावा क्षेत्र में ऋंगी ऋषि का आश्रम था। (उन्होंने ही राजा दशरथ के निवेदन पर पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराया था।) राजिम में त्रिवेणी संगम के समीप लोमस ऋषि का आश्रम है। जनश्रुतियों के अनुसार तुरतुरिया के वन क्षेत्र में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। यहां पर इन बातों के उल्लेख का अर्थ यह है कि इस अंचल में ऋषि-मुनि रहा करते थे और तपस्या करते थे।

भगवान श्रीराम वनवास काल में दंडकारण्य आए थे और भक्तों-तपस्वियों से मिले थे। शिवरी नारायण को शबरी-नारायण के रूप में भी माना जाता है। बहुत संभव है वैदिक काल में किसी प्रज्ञावान (कवि) व्यक्ति ने इस अंचल को सप्तर्षि भूमि (सात ऋषियों की तपोभूमि) कहा हो।  कालान्तर में अपभ्रंश होते-होते सप्त-ऋषि से छप्तश्रृषि, फिर छत-ऋषि, छतरीषि, छतरिष भूमि हुआ जो राजाओं-श्रीमंतों (सामंतों) के काल में कवियों-विद्वानों की कलम से होते हुए छतरिष-भूमि, छत्तीस-गढ़ में तब्दील हो गया हो। हालांकि इस बात को पुष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता। कइयों को यह बेतुकी धारणा भी लग सकती है लेकिन विचार किया जाना चाहिए कि जब्बाल नाम जब- जबलपुर हो सकता है तब सप्त-ऋषियों की भूमि का नाम बदलते-बदलते छतरिष और फिर छत्तीसगढ़ भी हो सकता है। छत्तीसगढ़ी में स को छ जैसा आज भी उच्चारित करते हैं। वस्तुत: यह विषय इतिहासकारों से ज्यादा भाषाविदों के विचार करने योग्य मालूम होता है। काल विशेष के विद्वान ही धारणाओं को खारिज या पुष्ट करते हैं। बहरहाल, विद्वानों से विनम्र आग्रह है, छत्तीसगढ़ के नाम के साथ सप्त-ऋषि-गढ़ नाम पर भी चिंतन-मनन किया जाए।
(लेखक छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार व रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक जनदखल के संपादक हैं)

आज एक नवंबर छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस है। सर्वजन को बधाई और शुभकामनाएं

01 October 2012

मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के नाम एक खुला पत्र

इस राजनीति या विसंगति पर क्या कहा जाए कि एक ओर भाजपा रिटेल में एफडीआई का विरोध करते हुए संसद ठप करने से लेकर देश बंद करवा चुकी है। वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार राज्य में विदेशी निवेश के लिए लालायित है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए नई दिल्ली में दो दिन रहकर रोड शो कर आए हैं और राज्य स्थापना दिवस के मौके पर नवंबर के पहले सप्ताह में  ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट का भी आयोजन किया जा रहा है। भाजपा की इस राजनीति या विसंगति पर छत्तीसगढ़ के किसी अखबार, संपादक या संपादक स्तर के पत्रकार का लिखा हुआ आवारा बंजारा को नहीं दिखा। अगर विदेशी निवेशक यहां निवेश करते हैं तो यहां की प्राकृतिक-खनिज-वन संपदा का क्या होगा, घनघोर औद्योगिकरण का क्या नतीजा होगा,  इस पर चिंता होनी चाहिए। यही चिंता नजर आई स्थानीय सांध्य दैनिक जनदखल के 29 सितंबर के अंक में, जिसमें अखबार के संपादक सनत चतुर्वेदीजी ने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के नाम इन्हीं चिंताओं को जताते हुए एक खुला पत्र लिखा। आवारा बंजारा उस खुले पत्र को यहां साझा कर रहा है। 

मुख्यमंत्री के नाम खुली चिट्ठी
फिरंगियों के लिए आप क्यों बिछाना चाहते हैं लाल कालीन? 
                                           रमन सिंह जी,
लोग कहते हैं अब, आप बदल गए हैं। आपकी सोच बदल गईहै।आपका चेहरा बदल गया है। आपकी रीति-नीति चाल ढाल सब बदल गया है। 2003 जैसा (भोला-भाला) नहीं रहे ‘चांऊर वाले बाबा’ की जो इमेज आपने गढ़ी थी वह भी नहीं रही। गाँव-गरीब के लिए जो दर्द और तड़प आप में थी वह अब दिखाई नहीं दे रही है। बेदाग चेहरे पर कई दाग-धब्बे उभर आए हंै। नि:संदेह, राजनीति काजल की कोठरी है। कैसे भी सयाने हों, कालिख लग ही जाती है। आप पर अगर कालिख लग गई तो अचरज नहीं। अचरज तो इस बात का है कि छत्तीसगढ़ में विकास की नई इबारत लिखने के फेर में आप फिरंगियों का दरवाजा खटखटा रहे हैं। उनके लिए लाल कालीन बिछा रहे हैं। क्यों? उन्हें छत्तीसगढ़ जैसे गरीब राज्य में न्योता देने के लिए आप इतने लालायित क्यों है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं आपके इस उतावलेपन का कारण क्या है? राज क्या है?
आप और आपकी पार्टी रिटेल में एफडीआई का विरोध कर रही है। प्रधानमंत्री से इस्तीफा माँगा जा रहा है। आशंका जताई जा रही है कि विदेशी निवेश से खुदरा व्यपार चौपट हो जाएगा। छोटे व्यापारी-कारोबारी तबाह हो जाएंगे। देशभर के व्यापारी संघ रिटेल में एफडीआई के खिलाफ हैं। विदेशी निवेश के खतरों को लेकर लोग उद्वेलित हैं। दूसरी ओर राज्य के मुखिया के बतौर आप विदेशी निवेशकों को न्योता दे रहे हंै। आखिर आप विदेशी निवेशकों को छत्तीसगढ़ का भाग्यनिर्माता क्यों बनाना चाहते हैं? कुछ ही दिन पहले एफडीआई के विरोध पर सफाई देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा- पैसे पेड़ पर नहीं उगते, उनके इस कथन पर तीखी-मीठी प्रतिक्रियाएं हुईं लेकिन आप और छत्तीसगढ़ के लोग कह सकते हैं, हां, पैसे पेड़ उगते हैं। छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने भरपूर वन संपदा दी है। यहां 44 प्रतिशत वन है। देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहां बेहतर स्थिति है। यह संपदा कई मायने में बहुमूल्य है। इसकी रक्षा-सुरक्षा की जिम्मेदारी अंतत: राज्य की है। तेजी से विकास और नई इबारत के लिए क्या इस बहुमूल्य संपदा को नष्ट कर दिया जाए? उदारीकरण और औद्योगिकीकरण के लिए क्या छत्तीसगढ़ को देशी-विदेशी निजी हाथों में सौंप दिया जाए? क्या इस मुद्दे पर चिंतन जरूरी नहीं है? छत्तीसगढ़ के लोग व्यापारी संगठनों की तरह संगठित नहीं है जो खुलकर अपना विरोध करा दर्ज करा सकें। जंगल, पहाड़ और गाँवो में रहने वाली राज्य की आधी आबादी गरीबी रेखा के नीचे या उसके आसपास का जीवन जी रही है। और आप इससे अनजान भी नही हैं। फिरंगियों को यहां न्योता देने के पहले अपने राज्य की जनता को विश्वास में लेना आपने जरूरी क्यों नहीं समझा? आज नहीं तो कल इन सवालों के जवाब आपको देने होंगे।
छत्तीसगढ़ के लोग तब शायद ज्यादा खुश होते जब उन्हें पता चलता कि दो गज जमीन के लिए फिरंगी आपके दरवाजे पर आपके सामने अपनी नाक रगड़ रहे हैं। मुख्यमंत्री होने के नाते आप छत्तीसगढ़ की नाक हैं। और आप ही उन्हें बुलाने चले गए। क्या कमी है, छत्तीसगढ़ में? सारी दुनिया जानती हैं, यहां अकूत संपदा हेै। जल है, जंगल है, जमीन है और मेहनतकश लोग हैं। इस संपदा पर पहला हक यहां के बाशिदों का है। यह राष्ट्र की, राज्य की संपति है। यह किसी राजनीतिक दल की सरकार की संपदा नहीं है जिसे मनमर्जी से कोई लुटा दे। जब सब कुछ छत्तीसगढ़ के पास हैं, तो उन्हें आने दीजिए जो यहां का विकास चाहते हैं। उदारीकरण ने बंद दरवाजे खोल दिए हैं। इसका अर्थ यह तो नहीं कि विकास के नाम पर संपदा की चाबी फिरंगियों को बुलाकर सौंप दे? उदारीकरण ने विकास के परिभाषा बदल दी है। विकास भी अब मुनाफे का व्यवसाय है। देशी-विदेशी कंपनियां केवल मुनाफे के लिए उद्योग व्यापार का ढाँचा खड़ा करती हैं। ‘वेल फेयर स्टेट’ की अवधारणा हमारी है। संविधान में इसकी व्यवस्था है। इस अवधारणा की रक्षा का दायित्व सरकार का है। आप छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया हैं। इसलिए आपसे उम्मीदें हैं। आप माने या ना मानें, वेल फेयर स्टेट के लिए फिरंगी कंपनियों की जरूरत नहीं है। और फिर सोचना यह भी है, कि क्या छत्तीसढ़ आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से इतना सबल हुआ है कि विदेशियों के लिए संपदा के द्वार खोल दें। हम उन्हें अतिथि या महेमान कैसे मान पाएंगे, जब यह जानते हैं कि वे सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाने के लिए यहां आना चाहेंगे। उदारीकरण अर्थव्यस्था की जरूरत हो सकती है, लेकिन इसके दुष्परिणामों को भी देश भोग रहा है।  घपले-घोटाले की बाढ़ आ गई है। तेजी से विकास की आकांक्षा बुरी नहीं है पर इसकी आड़ में लूट का व्यापार ना हो। छत्तीसगढ़ छोटा और नया राज्य है। यहां की मूलभूत समस्यों से पहले निपटा जाए। आपसे विनम्र अपेक्षा है, तेजी से विकास की आपाधापी में कहीं छत्तीसगढ़ आधुनिक विकास का ‘कूड़ाघर’ ना बन जाए।  यह न हो। अगर ऐसा हुआ तो लोग तबाह हो जाएंगे। इतिहास आपको माफ नहीं करेगा। अतएव, फिलहाल फिरंगियों से आंखमिचौली ना करें तो ही ठीक रहेगा।
-सनत चतुर्वेदी
30 सितंबर 2012