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25 June 2009

छत्तीसगढ़ में खत्म हुई दो बच्चों वाली बाधा

एक ओर जहां अब यह मांग होने लगी है कि संसद से लेकर विधानसभा तक भी दो से ज्यादा बच्चों वालों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए वहीं छत्तीसगढ़ सरकार नगरीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो बच्चों से ज्यादा न होने की अनिवार्यता के अधिनियम को वापस लेगी। आज देर शाम हुई केबिनेट की बैठक में लिए गए निर्णयों की जानकारी देते हुए कृषिमंत्री चंद्रशेखर साहू ने बताया कि केबिनेट ने एक अहम फैसला लेते हुए नगरीय निकाय अधिनियम में नगरीय चुनाव अर्थात नगर निगम, नगर पालिका व नगर पंचायत चुनाव में चुनाव लड़ने के लिए दो से ज्यादा बच्चे न होने के अनिवार्य प्रावधान को वापस लिया जाएगा। इससे अब दो से ज्यादा बच्चे वाले भी इन चुनावों में हिस्सेदारी कर सकेंगे। ग्राम पंचायतों के लिए यह प्रावधान पहले ही हटाया जा चुका है।






निश्चित ही इस तरह के कानून/अधिनियमों में सुधार की आशा रखने वालों को इससे निराशा हाथ लगेगी। बात अब यह होती है कि राजनीति में सुधार की आशा उनसे ही कैसे की जाए जो अक्सर अपने या अपनों के लिए ही ऐसी बातों का समर्थन करते हैं। कानून बनाने वाले वही होते हैं जिनके खिलाफ हम कानून बनाना चाहते हैं। बताइए भला ऐसे में कैसे हो सुधार……

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21 June 2009

खदबदाहट के बीच जैसे पकना

भीतर की खदबदाहट जैसे उकसाती है………वही खदबदाहट जो चूल्हे पर चढ़े भात के बर्तन में होती है………………पर जब इसमें उफान आता है तो फिर क्या होता है………कारण मालूम नहीं इस खदबदाहट का……लेकिन इक बेचैनी सी तारी रहती है……… हावी नहीं होता खुमार किसी चीज का……………लेकिन भरी रहती है वह बेचैनी जो अक्सर असंतुलित सा कर देती है मन को……मन की क्या बात करें……इसे तो खुद ही नहीं मालूम कि आखिर इसे चाहिए क्या……क्या अंत है इसकी चाहतों का……लेकिन यह चाहत भी क्या है……बस इक भूलभूलैया ही न……फिर भी मन क्यों उलझता ही रहता है इस भूलभूलैया में……कहीं कुछ बीता सा…कहीं कुछ छूटा सा………पल-पल सरकता है जैसे हाथों से छूटा जा रहा हो ……उसके बाद भी लगता है जैसे समय बीता भी नहीं और लेकिन दिन जरूर बीत गया………कैसे……यह पता नहीं चलता……कैसी है यह छटपटाहट……क्यों है यह बेचैनी…… अंतस की बेचैनी………आंखे जैसे उस सूरज को देखना चाहती है जिसे निकलते हुए कभी देखा नहीं………दिखता है चांद छुटपन से बुजुर्गियत से लेकिन उसकी शीतलता भी नहीं कर पाती यह छटपटाहट……यह खदबदाहट …धीमी आंच का चूल्हा और उस पर चढ़ा हुआ भात का बरतन जिसमें जारी ही रहती है खदबदाहट……लिखता तो रोज हूं पर दिल कहता है कि अपने लिए लिख……लिख……और लिख………अखबारी कागज पर लिखना और उन लिखे शब्दों का कल बासी हो जाना……लेकिन दिल का लिखना कब………लिखने बैठूं तो सोचता हूं क्या लिखूं……दिखते जमाने को लिखूं या उसे लिखूं जो इस दिखते जमाने के बीच नहीं दिखता……अपने को लिखूं तो उस अपने को लिखूं जिसे सब जानते हैं या उस अपने को लिखूं जिसे सिर्फ मैं जानता हूं…………लेकिन लिखूं क्या………यूं ही जब तैरते पानी में डाली आंखे……तो दिखी कुछ झांकती-उभरती परछाईयां उन पर लिखूं या न लिखूं……तैरता पानी तो आंखों में भी होता है, परछाईयां उसमें भी उभरती है……क्या इस दर्द को लिखूं……दर्द तो उनका है जो रोजाना अपने अपनों को खो रहे हैं और सरकारें खामोश बैठी देखती रहती हैं क्योंकि न्याय की आंखों पर काली पट्टी बंधी है, उनमें न तैरता पानी है न ही उसमें परछाईयां झांकती-उभरती हैं क्योंकि काली पट्टी बंधी है……पट्टी तो सिर्फ आंखों पर ही बंधी है कान खुले हैं लेकिन उन कानों तक वह आर्तनाद क्यों नहीं पहुंचता जो सड़क पर चलते हुए सुनते शोर के उपर से भी हमें सुनाई देता है……लगता है मुझे किसी की पुकार नहीं सुनाई देती सड़क पर लेकिन वह आर्तनाद हर पल मुझे भेदते रहता है……अंतस को………छलनी किए रहता है……इस भरी गर्मी में शाम को राहत भरे एक झोंके की तलाश में सड़कों पर भटकना चाहते हुए भी नहीं भटक पाता…राहत है कहां………शिखर से पाताल तक राहत कहीं और ही है………लेकिन कहां………यही तो खदबदाहट है……ठीक उस भात के बरतन की खदबदाहट की तरह……इस खदबदाहट के बीच खोए हुए जब कलम हाथ में आती है तो समझ में नहीं आता कि क्या लिखूं………और कैसे लिखूं…………चूल्हे की धीमी आंच में………खदबदाहट और……पकता हुआ भात………क्या यह पकने की ही प्रक्रिया है जो अंतस में खदबदाहट चलाए हुए है……

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24 May 2009

किनारे कर दिए गए गांधी जी…

गांधी जी को तो हम किनारे कई सालों से करते आ रहे हैं फिलहाल यहां बात गांधी की उस प्रतिमा की है जो रायपुर शहर का पिछले पचास-पचपन सालों से साक्षी रहा है और आगे भी रहेगा।शहर अब राजधानी है, तरक्की कर रहा है लेकिन उसकी पुरानी पहचान खोती जा रही है। हर वह चीज जो रायपुर के रायपुर होने का एहसास दिलाती थी अब बदलती जा रही हैं।




आवारा बंजारा का बचपन जिस मोहल्ले में बीता है उसका नाम है ब्राम्हणपारा। नेशनल हाईवे क्रमांक छह पर बसे इस मोहल्ले का मुख्य चौराहा कहलाता है आजाद चौक। इसी आजाद चौक पर स्थापित गांधी प्रतिमा आखिरकार आज अपनी जगह से कुछ पीछे गार्डन में प्रतिस्थापित कर दी गई। क्रेन के सहारे नगर निगम के अमले ने प्रतिमा को उठाया और फिर उसे नई जगह पर स्थापित कर दिया गया। नई जगह पहले से ही तैयार कर रखी गई थी। नेशनल हाईवे क्रमांक छह पर यातायात बढ़ने के चलते यह प्रतिमा पीछे शिफ्ट की गई है।सड़क चौड़ीकरण होने के बाद से ही यह प्रतिमा ट्रैफिक में बाधक बन रही थी।

यह प्रतिमा शहर की कई बातों, स्थितियों की साक्षी रही है। स्वतंत्रता संघर्ष के दिनों में यहां एक 14 वर्षीय बालक बलीराम आजाद ने वानर सेना बनाई थी। उन्हीं की स्मृति में इस चौक का नाम आजाद चौक रखा गया। 1956 में बनी इस गांधी प्रतिमा को बनवाने का श्रेय स्वर्गीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कमलनारायण शर्मा को है। जब यह मूर्ति बनकर तैयार हुई तब यह बात उठी कि इसका उद्घाटन कौन करे। उन दिनों पं.रविशंकर शुक्ल प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन प्रशासन चाहता था कि उद्घाटन मुख्यमंत्री करें, लेकिन कमलनारायण शर्मा इसके लिए तैयार नहीं हुए क्योंकि वे श्री शुक्ल के विरोधी थे। इसी दौरान राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद रायपुर प्रवास पर आने वाले थे। श्री शर्मा ने प्रस्ताव रखा कि उद्घाटन राष्ट्रपति के हाथों करवाया जाए। इससे पहले मुख्यमंत्री प्रतिमा को देखने भी आए थे। बाद में सरकार एवं राष्ट्रपति को खबर दे दी गई कि प्रतिमा गांधीजी जैसी नहीं दिखती है और इस संबंध में विवाद कायम हो गया। 14 सितंबर 1956 को राष्ट्रपति यहां आने वाले थे। इससे पहले 13 तारीख की शाम कमलनारायण शर्मा और रामसहाय तिवारी ने मिलकर एक हरिजन की बेटी से गांधीजी की प्रतिमा का उद्घाटन करवा दिया। दूसरे दिन जब राष्ट्रपति आए और आजाद चौक से उनका काफिला गुजरा तो उनकी गाड़ी रोककर उन्हें बताया गया कि गांधीजी की प्रतिमा का उद्घाटन हरिजन की बेटी से करवा दिया गया है। तब उस लड़की ने राष्ट्रपति को माला भी पहनाई थी।



एक बार की बात है कि शरारती बच्चे ने प्रतिमा का चश्मा ही गायब कर दिया, नगर निगम को सूचना देने के बाद भी जब प्रतिमा को नया चश्मा नहीं पहनाया गया तो स्वर्गीय सेनानी कमलनारायण शर्मा ने तब फ़ौरन नया चश्मा खरीदकर मंगवाया और प्रतिमा को पहनाया था।

इस प्रतिमा को लेकर स्वतंत्रता सेनानियों में काफी मोह रहा है। हर साल स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस,2 अक्टूबर और 30 जनवरी की सुबह स्वतंत्रता सेनानी यथा रामसहाय तिवारी, कमलनारायण शर्मा, मोतीलाल त्रिपाठी, नारायण राव अंबिलकर, केयूर भूषण आदि एकजुट होकर यहां गांधी प्रतिमा पर मार्ल्यापण करने के बाद गांधी भजनों का सस्वर पाठ करते थे। आवारा बंजारा को याद है अपने पिता स्वर्गीय मोतीलाल त्रिपाठी के साथ वह किस तरह अपने बचपन के दिनों में सुबह-सुबह ही प्रतिमा स्थल पहुंचकर झाड़ू लगाने से लेकर दरी बिछाने में सहयोग करने की कोशिश किया करता था। भजन तब न याद थे न ही अब लेकिन सामने चल रहे सस्वर गायन से अपने आपको जोड़ने की कोशिश जरुर करता था।
उपरोक्त गिनाए गए सेनानियों के नामों में से अधिकांश अब स्वर्गीय हैं। जैसे-जैसे हमारी स्वतंत्रता पुरानी होती जा रही है वैसे-वैसे न केवल ये स्वतंत्रता सेनानी कम होते जा रहे हैं बल्कि हम गांधी को खुद ही किनारे करते जा रहे हैं तो प्रतिमा ही किनारे क्यों न हो। पता नहीं आज अगर सेनानी कमलनारायण शर्मा या रामसहाय तिवारी जिंदा होते तो वे विरोध करते या नहीं लेकिन आज अगर गांधी जी खुद होते तो नि:संदेह जनता के लिए यह प्रतिमा किनारे ही होती। इसलिए इस प्रतिमा के किनारे होने का अफसोस नहीं है।अफसोस तो बस इस बात का है कि रायपुर अपने रायपुर होने का एहसास खोता जा रहा है, अपनी पहचान खोता जा रहा है। संभवत: कुछ साल बाद जिस रायपुर को हम देखें वो वह रायपुर हो ही न जिसे हमने अपने बचपन में देखा था,जिया था।ऐसा हर शहर, जगह के साथ होता है कि विकास के साथ वह अपनी पुरानी कड़ियां खोता जाता है।



आवारा बंजारा जब भी उस चौराहे से गुजरेगा तो याद आयेगा कि जो प्रतिमा वहां दिख रही है वह पहले यहां थी जिसके नीचे कभी भजन गाने की कोशिश होती थी तो कभी दोस्तों के साथ क्रिकेट खेला करते थे।

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15 May 2009

ऐसे कैसे ब्लॉग लिखोगे भई

ब्लॉग की चर्चा-परिचर्चा इतनी होने लगी है कि एक तरह से लोगों को ब्लॉग की अवधारणा को समझे बिना ही
ब्लॉग "लिखने" का फैसिनेशन होने लगा हैं। खासतौर से बड़े अफसरान और वरिष्ठ पत्रकार, साथ ही साहित्यकार भी। चाहते हैं कि उनका भी ब्लॉग हो, लोग पढ़ें, वाह-वाह करें और टिप्प्णियों की लाईन लगा दें। ;)

लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसे अफसरान, पत्रकार और साहित्यकार न खुद ब्लॉग बनाना चाहते न ही खुद मैटर टाइप करना चाहते। बस ब्लॉग किसी जानकार से बनवा लेंगे, चाहे आदेश देकर या चिरौरी कर के। मैटर किसी कंप्यूटर ऑपरेटर से टाइप करवा लेंगे। फिर किसी न किसी तरह जुगाड़ बिठाकर उस मैटर को मंगल फोंट में कन्वर्ट करवा लेंगे। और फिर किसी जुगाड़ से उस कन्वर्ट किए हुए मैटर को ब्लॉग में पोस्ट करवा लेंगे। हो गया, अब बैठकर इंतजार करेंगे कि कब लोग(पाठक) आएं और वाह-वाह करें। उपर से तुर्रा यह कि अगर उन्हें सलाह दें कि भाई साहब ब्लॉग खुद ही बनाइए और लिखिए तभी असल बात है, तो तर्क यह होता हैकि लो न यार फिलहाल बना दो, बाद में लिखना और पोस्ट करना सीख लेंगे। पर यह बाद में कभी आता हुआ दिखता नहीं।


बताइए यह भी कोई ब्लॉग लिखना हुआ?
नहीं न , पर ये लोग तो ऐसे ही लिखेंगे, आखिर ब्लॉग का हल्ला जो मचा हुआ है और इनसे बड़ा कोई लिक्खाड़ तो है ही नहीं। ये लिखते थोड़े ही हैं, सीधे गज़ब ढा देते हैं न। ;)


इस मामले में तारीफ करनी होगी वरिष्ठ पत्रकार अनिल पुसदकर की,जिन्होनें अपने कैरियर में कभी कंप्यूटर पर काम नहीं किया। लेकिन जब ब्लॉग लिखने की ललक जागी तो न केवल लैपटाप खरीद लाए बल्कि नेट कनेक्शन भी लिया। शुरु में कुछ दिन भले ही मैटर कंप्यूटर ऑपरेटर से टाइप करवाया लेकिन अब महीनों से खुद ही अपना मैटर टाइप कर रहे है और खुद ही टिपिया रहे हैं। जब कहीं पर अटक जातें हैं तो भले ही सीधे फोन लगाकर दिक्कत सुलझाने सलाह ले लेते हैं।

सेलिब्रिटी होना और उसकी तरह बनने की कोशिश करना दोनों में कितना अंतर है, यह बात हमारे अफसरान और बहुत से वरिष्ठ पत्रकार/साहित्यकार कब समझेंगे।

ब्लॉग लिखने का असल मजा तब ही है जब आप खुद ही मैटर टाइप करें, खुद ही पोस्ट करें और खुद ही टिपियाएं।
तो हमारे अफसरान,पत्रकार और साहित्यकार साहिबान, ऐसे कैसे ब्लॉग लिखोगे भई?
कोशिश तो करो खुद लिखने की।

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09 May 2009

आखिरकार बहस शुरु तो हुई

पहल चाहे देर हो या सबेर हो, पहल ही होती है। एक लंबे अरसे से कम से कम छत्तीसगढ़ में तो इस बहस के शुरु होने की प्रतीक्षा की जा रही थी कि मानवाधिकार कार्यकर्ता व संगठन नक्सली हिंसा होने पर तो खामोशी ओढ़े रहते हैं लेकिन जहां सरकार के या उसके पुर्जों के हाथों कोई प्रताड़ित हुआ नहीं कि राशन-पानी लेकर चढ़ दौड़ते हैं। ऐसा क्यों?


खुशी हुई यह देखकर कि राज्य के  प्रतिष्ठित  सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़  ने इस मुद्दे पर पहल करते हुए गुरुवार के अपने अंक से ठीक इसी मुद्दे पर एक बहस की शुरुआत की है।



आशा है मानवाधिकार कार्यकर्ता व संगठन इस बहस के माध्यम से आमजन के दिलो-दिमाग में चलने वाले इस झंझावात को दूर कर सकेंगे।




गौरतलब है आवारा बंजारा एक लंबे समय से यही सवाल अपने विभिन्न लेखों के माध्यम से उठाता रहा है। 
वे लेख नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक कर पढ़े जा सकते हैं।










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