आवारा बंजारा के पाठक वरिष्ठ पत्रकार और रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष अनिल पुसदकर की लेखनी से मोहरे नहीं जवान मर रहे हैं जनाब! के मार्फ़त परिचित हो ही चुके हैं। अनिल 19 सालों से पत्रकारिता में हैं। युगधर्म से शुरु हुआ उनका पत्रकारिता का सफर दैनिक भास्कर, अमृत संदेश, जनसत्ता (रायपुर), नेशनल लुक और जी टीवी में होते हुए जारी ही है, लेकिन हां अब उनके अपने शब्दों में वे अब "अखबार मालिकों के पास बंधक रखी कलम को छुड़वा चुके हैं"।
दिन ब दिन ब्लॉग की बढ़ती महत्ता से परिचित होकर प्रेस क्लब अध्यक्ष महोदय भी अब ब्लॉग जगत में कूद पड़े हैं। धीरे-धीरे कोशिश कर रहे हैं कि ब्लॉग जगत और उसकी तकनीकी जटिलताओं को समझ सकें पर मूल उद्देश्य तो लिखना और पढ़ना ही है तो आईए स्वागत करें अनिल पुसदकर के ब्लॉग
"अमीर धरती गरीब लोग" का।
पुसदकर जी के लिए हमारी शुभकामनाएं
12 May 2008
ब्लॉग बिरादरी में एक और ब्लॉग का स्वागत
Posted by Sanjeet Tripathi at Monday, May 12, 2008 9 टिप्पणी Links to this post
वर्गीकरण ब्लॉगर्स पार्क
11 May 2008
"जाणता राजा"
छत्रपति शिवाजी किसे आकर्षित नही करते। इतिहास पुरुष,महानायक, हिंदवी साम्राज्य के प्रणेता, कुशल प्रशासक गोरिल्ला युद्ध के जनक जैसे अनेक उपमाओं से विभूषित शिवाजी की समग्र जीवनी "जाणता राजा" को एपिक थिएटर फ़ार्म में देखने का मौका पहली बार मिला। रायपुर में राज्य के संस्कृति विभाग के प्रयास से 6 मई से 10 मई तक इसका मंचन हुआ। हर दिन देखने के बाद सबसे पहले जो बात मन में आती रही वह है "भव्य प्रस्तुति"।
आमतौर पर इसका मंचन दर्शकों के लिए सशुल्क होता है लेकिन छत्तीसगढ़ में संस्कृति विभाग के कारण दर्शकों के लिए यह निशुल्क रहा, ऐसा पहली बार हुआ है कि दर्शकों के लिए इसका मंचन निशुल्क हुआ हो।

खास बात यह रही कि "जाणता राजा" का यह 804वां प्रदर्शन था। इससे पहले इसके 803 प्रदर्शन हो चुके हैं। इसका पहला प्रदर्शन पुणे में 1985 में हुआ था। इसके लेखक व निर्देशक बाबा साहेब पुरंदरे हैं। हिंदी,मराठी व अंग्रेजी तीन भाषाओं में इसके मंचन हो चुके है, रायपुर में हिंदी मंचन हुआ। महाराष्ट्र के पोवाड़ा,गोंधळ,कोळी गीत, गवळण और लावणी जैसे अनेक लोकगीतों और नृत्यों का इसमे समावेश किया गया है।

हर दो-चार मिनट के एक दृश्य के बाद सूत्रधार और उनकी मंडली पोवाड़ा के माध्यम से कथा को आगे बढ़ाते हैं।
भव्य मंच जिसका सेट रिवाल्विंग है तैयार करने में दस दिन का समय लगता है और डिसमेंटल करने में पांच दिन,सीन की जरुरत के मुताबिक दर्शक के सामने कभी किले की दीवार और बुर्ज आता है तो कभी महल का झरोखा जिस पर पात्र खड़े हो कर संवाद बोलते हैं। लाईट इफेक्ट्स तो माशाअल्लाह। सबसे खास बात यह कि मंचन के दौरान शिवाजी आपको प्रतीकात्मक घोड़े पर नही बल्कि सचमुच के घोड़े पर दिखाई देते हैं साथ ही हाथी भी सच का ही होता है इस नाटक में। यह हाथी-घोड़ों की फ़ौज ही आपको सोचने के लिए मजबूर करती हैं कि आप एक कालखंड को स्टेज पर देख ही नही रहे बल्कि वाकई उसे जी रहे हैं।

भव्यता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस पूरे नाटक के कास्ट्यूम्स की कीमत करीब बीस लाख रूपए हैं। 200 से ज्यादा कलाकारों की इस टीम का एक-एक सदस्य अभिनय करता हुआ नही बल्कि उस पात्र विशेष को जीता हुआ सा प्रतीत होता है।
कलाकारों की टाईमिंग और सतर्कता को सलाम इसलिए क्योंकि यह पूरा नाटक रिकार्डेड है उधर आवाज़ आ रही होती है और आपको उस आवाज़ पर ही अपने अभिनय को साधना होता है और कलाकार इसमे खरे ही उतरते हैं।
पूरे नाटक में आप जिजामाता के यहां शिवा का जन्म,बचपन की अठखेलियां, शस्त्र शिक्षा,माता का स्वराज्य उपदेश,आदिलशाही के विरोध में मराठाओं का विद्रोह से लेकर शिवाजी की न्यायप्रियता और उनका राज्याभिषेक जैसे कई प्रसंग देख पाते हैं।

महाराजा छत्रपति शिवाजी महाराज संस्थान पुणे इस नाटक के मंचन आयोजित करता है।
जब कभी यह नाटक आपके शहर पहुंचे इसे देखना न भूलें, भले ही आप नाटक/थिएटर के शौकीन न हो लेकिन फ़िर भी आपको अफसोस नही होगा।
रायपुर में पांच दिन का शो कल खत्म हुआ और अब अगला शो 15 जून से जयपुर में है।
तस्वीरें मित्र रूपेश यादव के सौजन्य से जो कि रायपुर के अंग्रेजी अखबार दैनिक हितवाद में फोटोग्राफर हैं।
Posted by Sanjeet Tripathi at Sunday, May 11, 2008 18 टिप्पणी Links to this post
वर्गीकरण छत्तीसगढ़- "आज", देश-दुनिया
05 April 2008
देख भाई देख, ज़रा ज़बान संभाल के!
न जानें अक्सर क्यों वही होता है जिसकी उम्मीद किसी को नही होती,खासतौर से राज-नीतिज्ञों(?) की तरफ से।
तीन अप्रेल को रायपुर के एक बड़े होटल में 'स्कूल शिक्षा में पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप' के लिए
एक सेमीनार रखा गया था। अखबारों के मुताबिक इस सेमीनार में एक भी शिक्षाविद नही था लेकिन हां कुछ उद्योगपति और अफसर जरुर वक्ता के रूप में मौजूद थे। सेमीनार में राज्य के स्कूल शिक्षामंत्री अजय चंद्राकर ने अपनी बातों के दौरान कहा कि 'लोग कहते हैं कि शिक्षा सरकार का दायित्व है,तो क्या बच्चे सरकार ने ही पैदा किए हैं।'
अब इसके बाद रायपुर ही नही छत्तीसगढ़ भर में बवाल मचा हुआ है,शिक्षामंत्री के इस बयान के विरोध में प्रदर्शन-पुतला दहन आदि का दौर चला हुआ है।
इस बीच शिक्षामंत्री के एक खांटी समर्थक जो कि पिछले दो साल से उनके खांटी समर्थक हैं से चर्चा हुई तो उनका कहना था कि ये सब फलां संपादक का खेल है बस और कुछ नही।
हम यह कह सकते हैं कि खैर! समर्थक तो समर्थक है और फ़िर खांटी है तो ऐसा कहेगा ही अपने नेता के समर्थन में। लेकिन एक सम्मानित-प्रतिष्ठित अखबार में इस पूरे मुद्दे को एकदम छोटी सी खबर में निपटा दिया गया तो आश्चर्य हुआ और उस अखबार के चीफ सिटी रिपोर्टर से फोन पर चर्चा हुई,उनका कहना था कि वे खुद इस सेमीनार को कवर करने गए थे,आगे कहा कि अगर आप वहां खुद सुनते कि शिक्षामंत्री ने क्या कहा था तो आप भी ऐसी ही खबर बनाकर निपटा देते,मुद्दा ही नही बनाते।
इन चीफ सिटी रिपोर्टर साहब की बात सुनकर आश्चर्य हुआ क्योंकि संभव है जल्द ही वह उस अखबार के (अघोषित) स्थानीय संपादक बनाए जा सकते हैं। शुक्ला जी अगर आप इसे पढ़ रहें हो तो हां मुझे आपकी बात सुनकर आश्चर्य ही हुआ कि आप चीफ सिटी रिपोर्टर हैं। सबसे पहले जिन साहब ने इस खबर को अपने अखबार में जगह दी वह आपके अखबार के सालों संपादक रहे हैं,और जितनी आपकी उम्र है शायद उतने साल उन्हें पत्रकारिता में हो गए होंगे। कम अज़ कम सिर्फ़ मुद्दा बनाने की पत्रकारिता करते मैनें उन्हें नही देखा।
खैर!
जिन राजनीतिज्ञ के ऐसे विचार हों उन्हें शिक्षा तो नही लेकिन हां अशिक्षा विभाग का या असंस्कृति मंत्री ही बस बनाया जा सकता है,नया विभाग बनाकर! कोई आश्चर्य नही अगर सत्ता लोलुप राजनीति कल को ऐसा कर भी दे।
यह पता करना होगा कि शिक्षामंत्री क्या भाजपा की छत्तीसगढ़ मे सरकार दुबारा नही चाहते,वैसे ही हालत खराब है।
Posted by Sanjeet Tripathi at Saturday, April 05, 2008 19 टिप्पणी Links to this post
वर्गीकरण छत्तीसगढ़- "आज"
04 April 2008
प्रभु कितनों को कितनी बार माफ करेंगे!
जैसा कि हर शहर सिर्फ़ अपने निवासियों की नज़र में होता है अब तक रायपुर बेशर्म था सिर्फ़ रायपुर वालों के लिए। लेकिन इस घटना ने इसे अब राष्ट्रीय स्तर का बेशर्म बना दिया या कहें कि न केवल राष्ट्रीय स्तर बल्कि मानवता के स्तर पर भी। घटना इस तरह की पहले गुवाहाटी में भी हो चुकी है। गुवाहाटी की घटना का संदर्भ मुझे याद नही/मालूम नही। पर रायपुर की घटना का संदर्भ मुझे मालूम है।
शहर के एक मोहल्ले के एक अपार्टमेंट में एक स्त्री अपने दुधमुंहे बच्चे और अपनी रिश्तेदार लड़कियों के साथ रहती है। स्त्री पहले पीटा एक्ट के तहत गिरफ्तार हो चुकी है पीटा एक्ट अर्थात ज़िस्मफरोशी का कारोबार। स्त्री का कथन है कि वह अब यह सब छोड़ चुकी है, मोहल्ले वालों का कहना है कि स्त्री के कारण मोहल्ले की आबो-हवा खराब होती जा रही है। वो ऐसे कि यह स्त्री अपने घर मे मौजूद अन्य दोनो लड़कियों/स्त्रियों के साथ बालकनी पर बैठकर आते-जाते लड़कों/पुरुषों को इशारेबाज़ी करती रहती हैं। मोहल्ले वालों के अनुसार उन लोगों ने इस बाबत कई बार पुलिस को खबर की लेकिन कोई कारवाई नही हुई।
बताया जाता है कि एक अप्रैल की रात को भी ये महिलाएं अपनी बालकनी पर बैठकर नीचे सड़क पर आते-जाते लोगों को इशारेबाज़ी कर रही थीं। ऐसे ही एक युवक को इशारेबाज़ी कर उपर बुलाया गया। जब वह युवक उपर पहुंचा तो महिलाओंम और उनके साथी एक लड़के ने डरा-धमका कर उसे लूटना शुरु कर दिया गया। लड़के ने विरोध स्वरूप शोर मचाया और तब मोहल्ले वाले वहां पहुंचे।
मोहल्ले वाले वहां पहुचें और उन्होने अपना खेल शुरु किया। मोहल्ले वालों का आक्रोश इतना ज्यादा था कि उन्होने इस महिला और उसके साथी पुरुष के साथ साथी महिलाओं को मारा-पीटा। इसके बाद अति यह हुई कि बचते हुए वह महिला नीचे सड़क पर आ गई, मोहल्ले के पुरुषों की आदिम प्रवृति ने उसका कुर्ता और अंदरूनी वस्त्र फाड़ डाले, महिला टॉपलेस हो कर अपने को बचाने रोती हुई सड़क पर भागती रही।
मीडिया को खबर मिल चुकी थी,न्यूज़ फ्लैश होने लगा था,टीवी चैनल के कैमरे लग गए थे,लड़की टॉपलेस सड़क पर दौड़ती दिख रही थी, और दिख रही थी हम पुरुषों की आदिम प्रवृति टॉपलेस की गई सड़क पर दौड़ती एक ऐसी महिला के रूप में जो पहले कभी वेश्यावृति में संलग्न रही थी!!
भीड़ का कोई तंत्र नही होता। नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ का क्या असर होता है?
ऐसे मौके पर किसी ने कपड़े फाड़े जाने का विरोध किया भी हो तो क्या किसी ने सुना होगा?
पता नही मेरे पड़ोस में ऐसी महिलाएं रहने आए और उनकी ऐसी हरकतें जारी रहे बालकनी पर बैठकर इशारेबाज़ी करने वाली,तो मेरी क्या प्रतिक्रिया होगी तब। आप अपनी कहें………
चोखेरबाली पर पढ़ें "घोस्ट बस्टर जी ,क्या अब भी कहेंगे यह इक्कीसवी शताब्दी है .....?"
Posted by Sanjeet Tripathi at Friday, April 04, 2008 24 टिप्पणी Links to this post
वर्गीकरण छत्तीसगढ़- "आज"
20 March 2008
हरि का भजै सो हरि का होई:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-7
अब तक आपने पढ़ा---
झीनी झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-1
तू तो रंगी फिरै बिहंगी:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-2
सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-4
पाहन पूजे हरि मिलै,तौ मैं पूंजूँ पहार:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-5
मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-6
अब आगे पढ़ें--
हरि का भजै सो हरि का होई॥

छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ ने सर्वाधिक प्रभाव निचली या पिछड़ी जातियों पर ही डाला,लेकिन ऐसा नही है कि उच्च या सवर्णों पर कबीरपंथ का प्रभाव पड़ा ही नही। अब तक हुए वंशगद्दी आचार्यों में से एक-दो का विवाह ब्राम्हणी कन्या से होने का उल्लेख मिलता है। किसी ब्राम्हणी कन्या का विवाह किसी कबीरपंथी से होना तभी संभव प्रतीत होता है जब वह ब्राम्हण परिवार स्वयं भी कबीरपंथ का अनुयायी हो। दर-असल कबीरपंथ जब छत्तीसगढ़ में अपने पांव पसार रहा था तब की सामाजिक स्थिति ऐसी थी कि निचली जातियां सवर्णों से प्रताड़ित थीं और जाति-पांति का बंधन बहुत ज्यादा था। इसलिए कबीरपंथ के अनुयायी वही ज्यादा बने। जैसे कि सिदार,ढीमर, तेली,अहीर, लोधी, कुम्हार, रावत,पटवा, साहू,वैश्य,कुर्मी,कोष्टा और मानिकपुरी जिसे पनका या पनिका भी कहा जाता है। इनमें एक दोहा प्रचलित है।
आगे-आगे पनका गये,पाछे दास कबीर।।
उनकी मान्यता है कि पनिका का उद्भव पानी से हुआ है - उनका शरीर पानी से बना है। पनिका मार्ग का नेतृत्व करते हैं और संत कबीर उनका अनुशरण। लगभग सभी पनिका कबीर पंथी हैं। पनिका शब्द की उत्पत्ति (पानी + का) से हुआ है। जैसा कि जाना जाता है जनमते ही मां ने कबीर को त्याग दिया था। मां ने एक पत्ते से कबीर को लपेटकर एक तालाब के पास छोड़ दिया था। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर किसी और मां ने उठा लिया और उसने अपनी संतान की तरह उन्हें पाला -पोसा। क्योंकि वह शिशु पानी की सतह पर मिला था, जो आगे चलकर कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, इसलिए पनिका अपने को पनिका (पानी + का) कहने में गर्व का अनुभव करते हैं।

रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार ॥1॥
`कबीर' हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार ।
तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार ॥2॥
ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ ॥3॥
कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥4॥
जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ ।
या आपा को डारिदे, दया करै सब कोइ ॥5॥
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह `कबीर' नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥6॥
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प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्यों आया त्यों जावैगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्या क्या बीता।।
सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।
दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।
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यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कॉंट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
यह संसार झाड़ और झॉंखर, आग लगे बरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।
रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल
जैसा कि अजित वडनेरकर जी ने पिछली किश्त में कहा कि इसे कबीर या कबीरपंथी लेखन की अंतिम किश्त न कहें बल्कि यह कहें कि यह अस्थाई विराम है। अत: उनकी बात शिरोधार्य करते हुए फिलहाल कबीर या कबीरपंथ पर लेखन का यह अस्थाई विराम है,देखें दास कबीर फिर कब मन में चेतना जगाते हैं इस पर लेखन के लिए। इस पूरे लेखमाला के लेखन प्रेरणा के लिए अजित वडनेरकर जी की ही भूमिका रही। आभार उनका कि उनके कारण मैं खुद कबीरपंथ को इतना जान सका कि इस पर कुछ लिख पाया। इसके साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार
जयप्रकाश मानस का भी मैं आभारी हूं जिन्होनें इस विषय पर मुझे अपना मार्गदर्शन दिया
Posted by Sanjeet Tripathi at Thursday, March 20, 2008 15 टिप्पणी Links to this post
वर्गीकरण छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ

