शराब और अंकुरित चना-मूंग का रिश्ता?
कल शाम हमारी माताजी ने बताते हुए कहा कि हमारे बड़े भाई साहब डॉक्टर अखिलेश अपनी किसी सरकारी
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ट्रेनिंग के सिलसिले में शहर में ही हैं तो उनका रात्रि विश्राम यहीं होगा,तो उनके रात्रि भोजन की व्यवस्था की जाए। अब उनके इस रात्रि भोजन का क्या किस्सा है आइए बताते हैं।बड़े भाई साहब डॉक्टर हैं, उमर 53 साल, 26 बरसों से शासकीय सेवा में हैं। दो हार्ट अटैक झेल चुके हैं,दूसरे अटैक के समय एंजियोप्लास्टी हो चुकी है। पहले अटैक के बाद से धूम्रपान,मांसाहार,तैलीय भोजनादि बिलकुल बंद,परहेजी जीवन। दूसरे अटैक के बाद तो परहेज और ऐसा कि दिन के भोजन में सिर्फ़ तीन रोटी और रात्रि भोजन के रूप में थोड़ा अंकुरित चना-मूंग बस।
तो जब भी भाई साहब रायपुर प्रवास पर होते हैं उनके रात्रि भोजन के लिए अंकुरित चना-मूंग हमारी पड़ोस की कॉलोनी में ही स्थित प्राकृतिक तरीके से उगाई गई एक साग-सब्जियों की दुकान पर नम हालत में फ़्रिज में रखा हुआ मिल जाता है। माता जी ने तो शाम को हमें कह दिया। हम रात मे आठ बजे पड़ोसी कॉलोनी की इस दुकान पर गए तो जवाब मिला अंकुरित चना-मूंग नही आ रहा है इसलिए उपलब्ध नही है। हमने कहा भाई साहब अभी शनिवार को तो ले गए थे। उधर से जवाब आया उसके बाद से आया ही नहीं तो कहां से दें।
अब हम सोच में कि रात के आठ बजे कहां नम हालत वाला अंकुरित चना-मूंग तलाशा जाए। एक दोस्त को फोन
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लगाया तो मालूम हुआ कि गुरूनानक चौक पर स्थित शराब दुकान के सामने एक ठेला लगता है अंकुरित चना-मूंग का। वहां पहुंचे, शराब दुकान बंद और ठेला भी नही। वहीं पर खड़े एक हरे मटर का भेल बनाने वाले ठेले वाले से पूछा तो उन्होनें कहा कि आगे एक और खड़ा होगा देख लीजिए। आगे होते-होते स्टेशन रोड होते हुए पहुंच गए रेल्वे स्टेशन के पास। फ़िर किसी से पूछा अबकी बार बताया गया कि इधर वाला ठेला तो आज नही है, आप देख लो के के रोड
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पर मिल जाएगा। वापस आए, के के रोड और उससे लगा एम जी रोड छान मारा पर नही ही मिला ऐसा कोई ठेला जो अंकुरित चना-मूंग रखे हुए हो। फिर एक ठेले वाले से पूछा तो बताया गया कि राज टॉकीज़ के सामने एक शराब दुकान है वहां आसपास जरुर होगा। पहुंचे राज टॉकीज़, देखा कि शराब दुकान बंद और ठेला भी नदारद। याद आया कि आज तो सतनाम पंथ के प्रवर्तक गुरु घासीदास की जयंती है तो शराब दुकाने तो बंद रहेंगी ही और दुकाने बंद होंगी तो उसके कारण चलने वाले ठेले भी गायब होंगे।
अब तक हमारे दिमाग में सवाल घूमने शुरु हो गए थे कि अंकुरित चना-मूंग का ठेला शराब दुकानों के पास ही क्यों है, अन्य जगहों पर क्यों नही। और शराब दुकान बंद तो ठेले नदारद ही क्यों, किसी अन्य जगह पर क्यों नही लगे। शराब और अंकुरित चना-मूंग का ऐसा क्या रिश्ता। क्या शराबी बंधु शराब के साथ ऑइल फ्री व पौष्टिक चबैना ही ज्यादा पसंद करने लगे हैं।
खैर! सोचते हुए अपन ने अपनी बाइक राज टॉकीज़ से आगे बढ़ाई। नेशनल हाईवे, शहर का मेन रोड, दोनो तरफ़ ठेले और दुकानें। दो कदम चलने पर ही दाएं तरफ कॉफी हाऊस और बाएं तरफ शहीद स्मारक भवन। शहीद
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स्मारक भवन के पीछे ही प्रेस कॉम्प्लेक्स की जगह जहां नवभारत,सेंट्रल क्रॉनिकल व दैनिक भास्कर अखबार हैं। इसी गली में बहुत से खाद्य पदार्थों के ठेले लगते हैं क्योंकि नज़दीक ही देशी शराब भट्ठी है। यहा भी एक ठेले वाले से हमने पूछा। उसने कहा शहीद स्मारक के नीचे ही कॉफी हाऊस के सामने एक ठेला लगा होगा। हम गए, देखा तो सच में एक अंकुरित चना-मूंग का ही ठेला लगा था। एक प्लेट अपन ने मसालेदार बनवा के खाया, तबियत से मिर्च डली हुई थी। करीब-करीब रोने की हालत में अपन ने ठेले वाले से कहा सादा अंकुरित चना-मूंग बस बिना मसाले के पैक कर देना।
इतना सब होने के बाद अपन ने ठेले वाले से बातचीत की। नाम, राजु गुप्ता, अविवाहित, मूलत: इलाहाबाद से।
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पिछले सात साल से रायपुर में,यहां अकेले रहता हैं। मां-बाप और छोटी बहन इलाहाबाद मे ही जहां नाम मात्र की खेती है। राजु यहां दोपहर एक बजे से अपना काम शुरु करता है, एक बजे से शाम के पांच बजे तक ठेला लगता है तहसील ऑफ़िस में फ़िर पांच-छह बजे से रात के दस बजे तक वही ठेला शहीद स्मारक परिसर में। खर्चे पानी की बात पूछने पर राजु ने शर्माते हुए बताया अपना खर्च और लागत निकाल कर किसी महीने दस हजार बच जाते है तो किसी महीने बारह हजार लेकिन मिनीमम दस हजार तो बचते ही हैं। साल में अस्सी हजार के आसपास रुपए इलाहाबाद अपने घर भेज लेता है। अगले महीने अपने पुराने ठेले को बदल के नया लेने की योजना भी है।
तो एक ठेला जो शराब दुकान के आसपास नही है वह इतना कमा लेता है। शराब दुकान के आसपास लगने वाला ठेला कितना कमा रहा होगा। दूसरी बात यह कि रायपुर में तकरीबन हर ठेले या फेरी लगाने वाला किसी अन्य प्रदेश का दिखता है या होता ही है। जबकि छत्तीसगढ़ के लोग दूसरे प्रदेशों में खासतौर से महानगरों के घरों में नौकर हैं या फ़िर उत्तरप्रदेश या असम के ईंट भट्ठों या अन्य कहीं बंधक मजदूर के रूप में हैं जिन्हें छुड़ाए जाने की खबर आए दिन अखबारों से मिलती है।
रात में जब भाई साहब घर लौटे तो हमने उनसे पूछा कि शराब और अंकुरित चना-मूंग का क्या रिश्ता। भाई साहब ने फरमान दे दिया कि सड़क के ठेले से तो मत ही लाया करो अंकुरित चना-मूंग। क्योंकि धूल-धक्कड़ का आलम रहता है।
19 टिप्पणी:
बहुत खूब ... मानना पड़ेगा कि आपने माताजी का कहना मानकर भाई साहब के लिए अंकुरित चने ढूँढ ही लिए... भाई साहब ने खाए या नहीँ... ? ठेले से अंकुरित चना खाकर आप तो ठीक हैं न.... :)
एम् जी रोड पर अंकुरित चना-मूंग मत खोजा करो संजीत....क्योंकि बात अंकुरित चना-मूंग की नहीं है, बात है उससे जुड़े द्रव की, जिसकी वजह से ये बेचारे अंकुरित चना-मूंग शहीद हो जाते हैं.......:-)
पढ़ते पढ़्ते हमें भी अंकुरित चना-मूँग खाने की इच्छा हुई।
चलो आज ही पत्नी से कहकर एक मोटा सा थैला मँगवा लेता हूँ।
ब्लोग पढ़ते समय काम आएगा।
बेंगळूरु में bar में beer पीने वाले साथ में करारी पापड़ खाना पसन्द करते हैं।
अंग्रेज़ी फ़िल्में देखते समय, अगर हाथ में pop corn न हो और मुम्बई में, beach पर सैर करते समय, अगर हाथ में भेल पूरी न हो, बस में सफ़र करते समय हाथ में मूँगफ़ली न हो, सुबह सुबह अखबार पढ़ते समय हाथ में चाय का प्याला न हो, तो अनुभव अधूरा रह जाता है।
लिखते जाइए।
शुभकामनाएं
G विश्वनाथ, जे पी नगर, बेंगळूरु
@मीनाक्षी जी, अपन तो लक्कड़ पत्थर हजम वाले हैं। ;)
@क्या कहूं शिव भाई साहब
@शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया विश्वनाथ जी, आशा है स्नेह बना रहेगा
एक साथ कई नुस्खे दे गई आपकी स्वयं बीती। बधाई।
खाली अंकुरित मूंग चने बेच कर दस बारह हजार कमाई हो जाती है..? लगता है साईबर कॉफे की बजाय मूंग चने का ठेला ही खोलना पड़ेगा।
:)
सागर के बगल में मैं भी ठेला लगा लूंगा. इससे दोनों को बहुत फायदा होगा. ग्राहक जब कम होंगे तो चिट्ठाकारी कर लेंगे एवं एक संगणक से दोनों का काम चल जायगा.
दस हजार तो कुछ भी नहीं है।
मेरे घर के सामने एक नारियल बेचने वाला इस भी ज्यादा कमाता होगा।
एक दिन खिडकी के बाहर झाँककर उसे कुछ देर के लिए घूर रहा था।
देखा कि हर पाँच मिनट कोई न कोई नुक्कड़ पर रुककर Tender Coconut खरीदकर, वहीं पीकर चला जाता था। कभी कभार, कोई ग्राहक दो या तीन साथ ले जाता था।
एक नारियल का बेंगळूरु में दाम है दस रुपया।
अपने पास वाले गाँव से थोक में खरीद कर लाता होगा शायद ५ रुपये में।
हर नारियल पर ५ रुपये का मुनाफ़ा होता होगा
दिन में सुबह ९ बजे से शाम को ६ बजे तक वह अपनी जगह से हिलता भी नहीं।
मेरा अनुमान है कि कम से कम एक दिन में १००० रुपये का नारियल बेचता होगा जिससे ५०० रुपये का मुनाफ़ा होता होगा। इस हिसाब से महीने में पन्द्रह हज़ार रुपये हो गये । गर्मी के दिन और भी ज्यादा बेचता होगा। पता नहीं पीने के बाद, फ़ेंके हुए नारियलों का क्या करता है। अवश्य इन को बटोर कर उससे भी कुछ कमाता होगा।
पूंजी केवल एक साइकल। जगह के लिए किराया भी नहीं देना पढ़ता होगा। एक पेड़ के नीचे अपना अड्डा बना लिया है। Income tax का मतलब भी नहीं जानता होगा।
कभी कभी सोचता हूँ हमने जरूरत से ज्यादा पढाई की। येह ब्लोग लिखने वाले कितने कमाते होंगे?
G विश्वनाथ
पहले तो आप को साधुवाद कि आप ने इतनी मेहनत की अंकुरित मूंग ढूढ्ने में। भई शराब की दुकान के बाहर मूंग मिलना तो समझ आता है ये प्रेस कॉमपलेक्स के बाहर इतने मूंग वाले क्युं। प्रेस वाले खबरें लिखते समय मूंग ज्यादा खाते हैं क्या? चलिए इसी बहाने हम रायपुर घूम लिए आप की फ़ट्फ़टिया पर अब कभी आये तो शहर अन्जाना नहीं लगेगा। यूं ही रायपुर घुमाते रहिए
संजीत आपने तो भाईसाहब के लिए अंकुरित चना-मूंग के बहाने स्वास्थ्य चर्चा और शराब के साथ उसका रिश्ता बताने की कोशिश की। यहां तो भाई लोगों ने नया धंधा ही तलाश लिया। धन्य हो ब्लॉगर्स
यह भी खूब है पहले पीकर सेहत की बाट लगाऒ। फिर अंकुरित खा कर हेल्थकांशस हो जाऔ।
खूब रही आपकी चना-मूंग की खोज । वैसे आपके भाई साहब ने सही कहा कि सड़क के ठेले से लेकर नही खाना चाहिऐ क्यूंकि वो जितना फायदा नही करेगा उससे कहीं ज्यादा नुकसान करेगा।
संजीव तिवारी जी, ईमेल पर:-
Badhiya Dhandha Hai, Ankur vala bhai, Etani Kamai Ho jati hai, Phir Bhi ye Garibi rekha ki suchi me avashya Honge.
संजीत,
गरीबी रेखा की सूची में महात्मा गाँधी के पोते, बंगाल के राज्यपाल भी थे!
यह समाचार अखबार में छ्पा था।
राज्यापाल इस गलती से बहुत प्रसन्न नज़र आ रहे थे।
उन्होंने मज़ाक में कह दिया के उनके दादा जी इससे अवश्य खुश हुए होंगे।
कई लोगों को हम गलती से गरीबी रेखा की सूची में शामिल करते हैं।
हम white collar वालों को इन "गरीब" लेकिन उद्यमशील और साहसी लोगों से सबक सीखना चाहिए।
जरूरत से ज्यादा पढ़ाइ-लिखाई भोज बन सकता है।
नारियल वाले के बारे में बताया था।
अब सुनिए एक और किस्सा।
मैंने बीस साल पहले अपना घर बनवाया था।
मेरा राजगीर उस समय एक second- hand moped पर घूमा करता था।
इससे पहले कई साल किसी वरिष्ठ रजगीर के अधीन काम करता था और साईकल पर घूमा करता था। उसने कैरियर की शुरुआत की थी कई निर्माण स्थलों पर पहरेदार के रूप में।
आज उसकी उम्र है पैंतालीस साल और हमारे इलाके का एक जाना माना ठेकेदार है और एक मारुती Esteem में घूमा करता है। उसने मैट्रिक भी पास नहीं की। टूटी फ़ूटी अंग्रेज़ी बोलना सीख गया है। वही जो बीस साल पहले मुझसे समय पूछता था आज एक महँगी घड़ी पहनता है और जेब में एक शानदार और महँगा मोबाइल फ़ोन रखता है। मुझसे ज्यादा संपन्न है।
पढ़ाइ लिखाई से मुझे एक लाभ जरूर हुआ। आज भी, जब भी मुझे देखता है, सलाम करता है और विनम्र स्वर में मेरा और परिवार का हाल पूछता है!
G विश्वनाथ
आपकी बात से मै सहमत हूं विश्वनाथ जी, मैने भी कुछेक ऐसे ही लोगों को देखा है। हमारा मकान जब बन रहा था तो उसके ठेकेदार थे एक खान साहब। पढ़े लिखे कुछ नही, लेकिन नमाज़ी और ईमानदार। सायकल पे घूमने वाले, जबकि चाहते तो कार पर घूम सकते थे लेकिन अपने शुरुआती दिनो को न भूलने की चाह में सायकल पर ही घूमते थे। शुरुआत उन्होने भी एक मजदूर के रूप में ही की थी।
ओह, यह तो बड़ी सशक्त पोस्ट है - मेहनत और आमदनी में सार्थक रिश्ता बताने वाली। कोई मजदूर आन्दोलन नहीं - प्योर मेहनत और उससे कमाई। इससे मेरा विश्वास जमा कि जो रोजगार योग्य है - उसके लिये रोजगार की कमी नहीं है।
बहुत बढ़िया!
बार बार समाचार पत्र बताते रहते हैं कि रोज एक पैग लेने से स्वास्थ्य बढ़िया रहता है । फिर उस पैग को यदि अंकुरित मूँग चने के साथ लिया जाए तो दुगुना फायदा होता होगा ।
सागर जी बस आप अपने साइबर कैफे के अंदर ही ये बेचने लगिये । लोग काम करते करते जुगाली भी कर लेंगे ।
घुघूती बासूती
चना-मूंग का शराब के साथ रिश्ता तलाशने के बहाने जिस अनुभव और विचार-प्रक्रिया से आप गुजरे, उसके कारण बहुत सुन्दर पोस्ट बन पड़ी है यह।
isi tarah scientific attitude banaye rakhiye.
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