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02 August 2007

अज्ञेय के विचार-1

अज्ञेय ने "तारसप्तक(1943) " में अपने वक्तव्य में जो लिखा वह आज भी कितना प्रासंगिक है उसका एक अंश आप खुद पढ़िए और तय कीजिए।


"मैं 'स्वान्त:सुखाय' नही लिखता। कोई भी कवि केवल स्वान्त:सुखाय लिखता है या लिख सकता है, यह स्वीकार करने में मैंने अपने को सदा असमर्थ पाया है। अन्य मानवों की भांति अहं मुझमें भी मुखर है, और आत्माभिव्यक्ति का महत्व मेरे लिये भी किसी से कम नही है, पर क्या आत्माभिव्यक्ति अपने-आप मे सम्पूर्ण है? अपनी अभिव्यक्ति-किन्तु किस पर अभिव्यक्ति? इसीलिए 'अभिव्यक्ति' में एक ग्राहक या पाठक या श्रोता मै अनिवार्य मानता हूं, और इसके परिणामस्वरुप जो दायित्व लेखक या कवि या कलाकार पर आता है उससे कोई निस्तार मुझे नही दीखा। अभिव्यक्ति भी सामाजिक या असामाजिक वृत्तियों की हो सकती है, और आलोचक उस का मूल्यांकन करते समय ये सब बातें सोच सकता है, किन्तु वे बाद की बातें हैं। ऐसा प्रयोग अनुज्ञेय नहीं है जो 'किसी की किसी पर अभिव्यक्ति' के धर्म को भूल कर चलता है। जिन्हें बाल की खाल निकालने में रुचि हो, वे कह सकते हैं कि यह ग्राहक या पाठक कवि के बाहर क्यों हो-क्यों न उसी के व्यक्तित्व का एक अंश दूसरे अंश के लिए लिखे? अहं का ऐसा विभागीकरण अनर्थहेतुक हो सकता है; किन्तु यदि इस तर्क को मान भी लिया जाये तो भी यह स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति किसी के प्रति है और किसी की ग्राहक (या आलोचक) बुद्धि के आगे उत्तरदायी है। जो (व्यक्ति या व्यक्ति-खण्ड) लिख रहा है, और जो (व्यक्ति या व्यक्ति-खण्ड) सुख पा रहा है, वे हैं फ़िर भी पृथक्। भाषा उन के व्यवहार का माध्यम है, और उस की माध्यमिकता इसी में है कि एक से अधिक को बोधगम्य हो, अन्यथा वह भाषा नहीं है। जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने वाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ़, 'अलौकिक' अथवा दीक्षा द्वारा गम्य हो जाना अनिवार्य है, किन्तु वह उस की शक्ति नही, विवशता है; धर्म नही; आपद्धर्म है।"



7 टिप्पणी:

रंजू said...

अज्ञेय ज़ी को पढ़ना और समझना हमेशा ही एक रोचक विषय रहा है ..... 'स्वान्त:सुखाय'पर लिखे उनके यह विचार आज भी उतने ही महतव रखते हैं
जितना उनके इसको लिखते समय थे

जीवन की जटिलता को अभिव्यक्त करने वाले कवि की भाषा का किसी हद तक गूढ़, 'अलौकिक' अथवा दीक्षा द्वारा गम्य हो जाना अनिवार्य है, किन्तु वह उस की शक्ति नही, विवशता है; धर्म नही; आपद्धर्म है।.....

भाषा के बारे में कही यह पंक्तियाँ आज भी सच हैं!!

ग़रिमा said...

अज्ञेय जी के यह विचार पहली बार पढ़ रही हूँ, पर ऐसा लग रहा है कि इसे कई बार महसुस किया है।

इन विचारो को यहा प्रस्तुत करने का शुक्रिया :)

Sanjeeva Tiwari said...

बहुत बहुत धन्‍यवाद संजीत जी, भूली बिसरी यादों को सामने लाने के लिए । अज्ञेय को मैं आपके पोस्‍ट में पढ रहा हूं यही मेरे लिए बहुत है उनकी कृति पर टिप्‍पणी मेरे बस की बात नहीं । पुन: आभार ।

“आरंभ”

परमजीत बाली said...

अज्ञेय जी के विचारो को यहाँ दे कर \आप बहुत अच्छा कार्य कर रहे है।आप का बहुत-बहुत धन्यवाद।

Isht Deo Sankrityaayan said...

दुर्भाग्य की बात यह है कि बाद में अज्ञेय के नाम पर ही साहित्य, खास तौर से कविता के स्वान्तः सुखायीकरण की प्रक्रिया बढ़ी. जिन रुढियों से मुक्ति के लिए उन्होने नई कविता का शिल्प अपनाया, बाद में वही रूढियां गुटबाजी के फेर में पूरे हिंदी जगत पर हावी हो गईं.

Gyandutt Pandey said...

अज्ञेय> ...भाषा उन के व्यवहार का माध्यम है, और उस की माध्यमिकता इसी में है कि एक से अधिक को बोधगम्य हो, अन्यथा वह भाषा नहीं है।

अज्ञेये सही कह रहे हैं, 100%. समस्या यह है कि अज्ञेय स्वयम बोधगम्य नहीं हैं - हमारे जैसे सामान्य पाठक को अपने अधिकांश लेखन में.

भाषा सम्प्रेषण का माध्यम हो तो ठीक. पर अगले को सामान्य स्तर का मान कर चलें, तो ही सम्प्रेषण कारगर होता है.

मीनाक्षी said...

अज्ञेय जी के विचारों को प्रस्तुत करने का बहुत बहुत धन्यवाद.

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