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23 August 2007

"India's War in the Woods" By Neil Katz

2005 में James A. Wechsler Memorial Award पा चुके अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार Neil Katz (नील कैट्ज़) जो कि अपने आप को मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट कहलाना पसंद करते हैं, न्यूयार्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क डेली न्यूज़, डेली टेलिग्राफ़(आस्ट्रेलिया), न्यूजर्सी स्टार लेजर जैसे अखबारों के साथ साथ भारतीय अखबार इंडियन एक्स्प्रेस के लिए भी काम कर चुके हैं। कई देशों मे जाकर स्पेशल रपट बना चुके हैं जिनमें से भारत भी है। भारत से इन्होनें मुख्यत: दो स्टोरी की है फ़िलहाल जिसमें से एक हम यहां पर अपने पाठकों के लिए अनुवाद कर पेश कर रहें है। यह स्पेशल रपट उनकी भारत यात्रा के बाद न्यूजर्सी में अप्रेल 2006 में छपी थी। लंबी होने के बाद भी हम इसे किश्तों मे नही दे रहें इस क्षमा याचना के साथ। रपट का सार संलग्न वीडियो में मौज़ूद है।



छत्तीसगढ़, भारत-- मध्यभारत में सुकमा और कोण्टा के बीच 78किलोमीटर लंबी एक सड़क जाती है बिलकुल हरे नारंगी वन प्रदेश के पास। किसी जमाने में इसके आस-पास सैकड़ों गांव बसते थे, आदिवासी जन-जीवन से परिपूर्ण, पर आज यह गांव उजड़े पड़े हैं, परित्यक्त और सुनसान, हजारों आदिवासी जो सदियों से यहां बसते आये थे वे आज यहां से पलायन कर चुके हैं।


यह इलाका युद्ध की त्रासदी से जूझते अफ़गानिस्तान या सूडान का नही, मध्यभारत का ही एक हिस्सा है, जहां कई कॉल-सेंटर और सॉफ़्टवेयर फ़ैक्टरियों नें कई गरीबों की किस्मत बदल दी और उन्हें मिडिल क्लास में ला खड़ा किया है।


यह देखकर कोई भी सोचे कि भारत का भविष्य उज्वल है, लेकिन आर्थिक जगत के संसार में अव्वल नंबर पर आने की लालसा ने कई विसंगतियां पैदा कर दी हैं, इस विशाल भारत के कई कमज़ोर वर्गों की आर्थिक प्रगति पर अंकुश लग गया है और वो पतन के गर्त में जा डूबी हैं। सबसे ज्यादा खतरे की बात यह है कि यहां के दूर-दराज़ वन प्रदेशीय इलाकों में 40साल पुरानी विद्रोही ज्वाला ने अब हिंसात्मक दमन, कत्ल और युवा पीढ़ी के शोषण का रुप ले लिया है।


अलग अलग लोगों का अलग-अलग नज़रिया है इस हिंसा को देखने का…कुछ लोग इसे नए जमाने का रॉबिन हुड मानते हैं जो किंवदंती के अनुसार अमीरों से छीन कर गरीबों मे बांट देता था और इस प्रकार गरीबों का मसीहा था, पर कुछ लोग यह मानते हैं कि यह विद्रोही अब उन्ही गरीब ग्रामीण वर्ग का शोषण और दमन कर रहे हैं जिनकी रक्षा हेतु उन्होनें सरकार के खिलाफ़ जंग छेड़ी थी। एक शिक्षक, सोयम मुका जिनके भाई का इन्होनें कत्ल कर दिया, कहते हैं " इन लोगों ने भोले-भाले ग्रामवासियों को बेवकूफ़ बनाया, यह कहकर कि हम तुम्हारे लिए काम करेंगे…लेकिन यह उन्ही कों यातना दे रहे हैं और मार रहे हैं"।


नेपाली विद्रोहियों की तरह भारतीय विद्रोही जो नक्सल कहलाते हैं, भी लोगों से एक ही बात कहते हैं कि हमारी जंग गरीबों को आर्थिक न्याय दिलाने के लिए है और इसके आड़े जो भी आएगा, वो चाहे फ़िर सरकार हो या कोई और , मिट्टी में मिल जाएगा यानी कि हिंसात्मक रुप से उस से निपटा जाएगा। हालांकि नेपाल और भारत दोनो जगह के विद्रोह एक दूसरे से जुड़े हुए नही पर दोनों के प्रेरणास्रोत चीन के क्रांतिकारी माओत्से तुंग हैं।


पिछले 38सालों में नक्सलवादियों ने भारत की दक्षिणी सीमा से लगती श्रीलंका से लेकर उत्तरी सीमा में नेपाल तक के वन प्रदेशों में छुट-पुट जगह जैसे आज़ाद प्रदेशों की श्रृंखला बना ली है। वो आशा कर रहे हैं कि इन आज़ाद क्षेत्रों पर वे कम्यूनिस्ट राज्य खड़े कर लेंगे और कई सरकारी सुरक्षा एजेंसीज़ का मानना है कि वो अपने इरादों मे सफ़ल भी हो रहे हैं। देश के 602 इलाके, कम-ज्यादा, नक्सल हिंसा की चपेट में आए और गृहमंत्रालय का मानना है कि नक्सली सेना में कम से कम 10,000सिपाही हैं। ये सभी नाना-प्रकार के आधुनिक शस्त्रों से लैस हैं जो ढीली-ढाली सुरक्षा के चलते सरकारी शस्त्रागारों से ही चुराए गए हैं या फ़िर जंगलों में ही कारखाने लगाकर बनाए गए हैं।


पिछले ही हफ़्ते प्रधानपंत्री मनमोहन सिंह जी ने नक्सलवाद को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बताया था। ओ पी राठौर जी ( जो कि नक्सलवाद की त्रासदी से जूझते छत्तीसगढ़ के उंचे पुलिस कमांडर हैं) ने कहा " यह लोग मानव अधिकारों के सबसे बड़े हननकर्ता हैं, ये पुलिस की गाड़ियों, ड्यूटी पर तैनात पुलिस वाले हो या सैन्य दल के लोग सबको अपने आक्रमण का निशाना बनाते हैं। यहां तक कि निर्दोष आम जनता को भी नही बख्शते।


2004 में जबसे नक्सल और माओवादियों ने मिलकर अपना गुट बना लिया है जिसका नाम है " कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया-माओवादी" तब से इनके हमले और ज्यादा तेज़, निडर और खूंख्वार भी हो गए हैं। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इन्होनें अपना निशाना भोले-भाले आदिवासियों को बनाना शुरु कर दिया है। नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट के आंकड़ों के अनुसार पिछले साल करीब 10,000 लोग इनके हाथों मारे गए थे और इस साल अब तक 282 लोग मारे जा चुके हैं जिसमें आधे से ज्यादा लोग छत्तीसगढ़ के आदिवासी हैं। राठौर जी कहते हैं कि यह एकदम निरुद्देश्य मारधाड़ है जिसका निशाना गरीब और आम जनता है। इसमें कम्यूनिज़्म कहां हैं।


वहां के स्थानीय मीडिया ने भी इसके कई समाचार दिए हैं जैसे कि पिछले नवंबर में कई सौ नक्सलवादी बिहार की जेल में घुस गए और 300 कैदियों को छुड़ा जंगलों में लुप्त हो गए। पिछली मार्च में विद्रोहियों ने अपने नेता की मौत का बदला लेने के लिए एक ट्रेन को अगवा कर लिया और उसमें सफ़र कर रहे हजारों सुरक्षा कर्मियों की हत्या कर दी। पिछले ही हफ़्ते नक्सलवादियों ने एक पुलिस स्टेशन उड़ा दिया और 14 में से 11 की हत्या कर दी।


अक्सर इस प्रदेश के पिछड़ेपन के लिए इस हिंसा को ठहराया जाता है। छत्तीसगढ़ के मुख्य मंत्री रमन सिंह जी का कहना है कि नक्सलवाद के कारण आम जनता हमेशा डर के साए में जीती है। अगर सरकार सड़कें बनाती है तो यह नक्सली उन पर चलनेवाली गाड़ियों को उड़ा देते हैं, अगर किसी जगह का उत्थान करो तो वहां से लोगों को पलायन करने पर मजबूर कर देते हैं। बच्चों के लिए आश्रम, स्कूल, हॉस्पिटल यह लोग कुछ भी नही बनाने देते।


कुछ सुरक्षा एजेंसियों से जुड़े लोगों का माना है कि सरकार की उपेक्षा के कारण नक्सलवाद को हवा मिलती है और वो अपनी जड़े फ़ैलाने में और उन्हे मजबूत करने में सफ़ल हो पाते हैं।


ईंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉन्फ़्लिक्ट मैनेजमेंट के एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर अजय साहनी कहते हैं कि इन इलाकों मे सरकार की उपस्थिति सिर्फ़ नाम मात्र को है, सरकार के लिए यह आदिवासी मुसीबत से ज्यादा कुछ भी नहीं।





सुकमा से लेकर कोण्टा तक प्रगति के निशान कहीं कहीं पर इक्का-दुक्का ही दिखेंगे। नक्सलवादियों ने लैंडमाईंस बिछा कर सड़क को इस तरह से उड़ाया है कि यह सड़क चंद्रमा की धरती लगती है। पिछले महीने दोरनापाल के शरणार्थी शिविर के पास एक बड़ा सा छेद सड़क के बीचों बीच, टूटे हुए कांच के टुकड़ों के मैदान में एक अकेली पड़ी चप्पल माईन ब्लास्ट में मरे 30लोगों का अकेला चिन्ह बचा था।


वहां से कुछ ही किलोमीटर आगे एक स्कूल खंडहर बना दिया गया था, अंग्रेजी की प्राथमिक किताबें उन ईंटों के नीचे दबी पड़ी थी जो कभी उस स्कूल की छत हुआ करती थी। एक स्थानीय पत्रकार के अनुसार नक्सलवादियों ने इस स्कूल को उड़ा दिया था क्योंकि स्कूल ने सुरक्षा कर्मियों को रहने की जगह दी थी।


जन शिक्षा नही, कोई इन्फ़्रास्ट्रक्चर नही तो आदिवासियों के लिए वन के उपर निर्भर रहने के सिवा और कोई चारा नही। वे साल के बीच एकत्र करतें हैं या तेंदू/महुआ की पत्तियां जिनका उपयोग बीड़ी बनाने के लिए होता है।


यहां भी नक्सलवादियों की त्रासदी से छुटकारा नही, जो ठेकेदार आदिवासियों से यह सब खरीदते हैं नक्सलवादी उनसे हफ़्ता वसूलते हैं उन्हें अभयदान देने के एवज में, और जो नही देता उसकी मार-पिटाइ या कत्ल कर दिया जाता है।


ऐसे ही एक त्रस्त आदिवासी नेता सोया मुका जो अपने गांव से अपनी जान बचाकर भागा, का कहना है कि यह नक्सलवादी गांव में कुछ भी नही बनाने देते, ना कुएं खोदने देते हैं ना ही खेती करने देते हैं, अब कोई गांव में जिए तो कैसे जिए?


इनकी आज़ादी से तंग आकर पिछली जून में गांव वालों ने नक्सलवाद के खिलाफ़ एक मुहिम शुरु की जिसे नाम दिया गया सलवा जुडूम। सलवा जुडूम का अर्थ है शांति पदयात्रा। सरकार ने भी साथ दिया और सुरक्षा, प्रशिक्षण और हथियार मुहैया कराने का वादा किया। शरणार्थी कैंप खोले गए उन आदिवासियों को शरण देने के लिए को नक्सलियों से त्रस्त थे। साहने जी कहते हैं कि जो आदिवासी उन कैंपों मे जाकर नही रहना चाहते थे उन्हें सलवा जुडुम के नेताओं ने मजबूर किया वहां जाने के लिए ताकि उनकी संख्या बढ़ाई जा सके।


चाहे डर की वजह से या मजबूर किये जाने की वजह से पर जल्दी ही यह कैंप जरुरत से ज्यादा भर गए। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर और दंतेवाड़ा इलाके में 26 ऐसे कैंप हैं जहां 50,000 के लगभग आदिवासी रहने को मजबूर हैं कोण्टा जिले में जहां 8000 आदिवासी कैंप में आने के इच्छुक हैं, सलवा जुडुम नेताओं का कहना है कि उनके पास कैंप बनाने के लिए सामान नही हैं। कुछ शरणार्थी स्थानीय ग्रामीणों घरों मे शरण लिए हुए हैं और कुछ जो वो भी नही कर पाते धूल-धूसरित खेतों में बांस और तालपत्री की झुग्गियाँ बना कर रहने को मजबूर हैं। ऐसे ही एक बड़े से तंबू में, बसंती सोमारो जिसका पति कुछ हफ़्ते पहले के माईन ब्लॉस्ट में मारा गया था, गोंडी जुबान में विलाप कर रही थी कि मेरा पति नही रहा, मेरी तो ज़िंदगी ही खत्म हो गई, अब मैं क्या करूंगी?


सोडी सोमारो, बसंती का पति 28 फ़रवरी को निकले सलवा जुडूम के हिमायतियों के जुलूस का हिस्सा था जो नक्सलवादियों के खिलाफ़ आवाज़ उठा रहे थे, माईन ब्लॉस्ट ने उनके ट्रक को उड़ा दिया और जब ट्रक उड़ गया तो सड़क किनारे छुपे नक्सलवादी बाहर निकल आए और जो लोग ब्लॉस्ट से नही मरे थे उनका कत्ल कर दिया। सब मिला कर 30 लोग मरे।



मुसाकी गंगा, एक भाग्यशाली को उस हमले में बच गया, बताता है कि वो लोग लोगों को मारने के लिए चाकू, तलवार, बंदूक जैसे हथियारों का प्रयोग कर रहे थे, बंदूक के चलने की आवाज़ और लोगों की चीखें साथ-साथ सुनाई दे रही थी।


आदिवासी अब जानते हैं कि सड़क से दूर रहना है पर यह अब तक साफ़ नही हो पाया कि कोण्टा शरणार्थी कैंप के लिए जिस सुरक्षा का सरकार ने वादा किया था वो कितनी कारगर है। हाल ही मेंजब वहां गए तो पाया कि एक कंटीली तार लगाकर कैंप की परिधि सुनिश्चित की हुई है पर दिन के वक्त दरवाजे पर कोई चौकीदार नही। स्थानीय पुलिस अफ़सर अपने घर के बाहर मशीनगन अपनी गोद में लेकर बैठा था पर डर के मारे कुछ भी कहने से इनकार कर रहा था। दूसरे कैंपों की स्थिति भी ऐसी ही दयनीय थी। दोरनापाल में शरणार्थी कैंप फ़िर भी ज्यादा व्यवस्थित लगा, आदिवासी सामूहिक रुप से रह रहे थे और उनके अनुसार खाने पीने की भी कोई कमी नही थी, सिर पर टीन की छतें भी थी। सामने ही रोड के उस पार एक और कैंप था जहां कई तथाकथित नक्सलवादियों के समर्थक थे, जिन विद्रोहियों ने समर्पण कर दिया वो थे। वहां सैन्य बल तैनात था और राईफ़ल लिए पुलिस वाले गश्त लगा रहे थे, उनके साथ तीर-कमान लिए आदिवासी भी गश्त लगा रहे थे।


सरकार हजारों आदिवासी नवयुवकों को प्रशिक्षण दे रही है और 35 डॉलर की पगार भी देती है जो भारत के हिसाब से काफ़ी अच्छी तनख्वाह है, पर इन नौसिखियों को लड़ाई के समय आगे कर दिया जाता है और अनुभवी पुलिस पीछे वाले पीछे हो जाते हैं।


आदिवासी खुशी से इस जंग में हिस्सा लेने को तैयार हैं। हर सलवा जुडूम कैंप में नेताओं की एक ही मांग थी कि हमें हथियार दो हम लड़ेंगे। दोरनापाल में ऐसे कई खास अफ़सर बने मिले जिन्हे ना कोई तजुर्बा है ना ही प्रशिक्षण, ना ही तनख्वाह, रातों को सिर्फ़ तीर-कमान के साथ और कंधे पर एक कंधे पर एक कपड़े का टुकड़ा जो दर्शाता है कि वे अफ़सर हैं। उन्हें कैंप के दरवाज़े पर चैकीदारी के लिए खड़ा कर दिया जाता है । वो पूरी रात भगवान से मनाते रहते हैं कि कहीं सशस्त्र विद्रोही न आ जाएं।


आर पी कुशवा, एक सलवा जुडूम के नेता ने कहा " वो हमें दूर से मार सकते हैं और हम कुछ नही कर सकते"।


नई दिल्ली स्थित मानवाधिकार संस्थान ने अपनी मार्च की रिपोर्ट में बताया "ऐसे प्रमाण मिले हैं कि सलवा जुडूम और नक्सली दोनो ही छोटे बच्चों को सैन्य प्रशिक्षण दे रहे हैं"।


सरकार बच्चों को सैनिक प्रशिक्षण दिए जाने के बारे मे बात करना पसंद नही करती और सलवा जुडूम को शांतिप्रिय मुहिम बताती है जो गांधीवाद के नियमों पर चलती है। महेंद्रा कर्मा एक वज़नदार आदिवासी राजनीतिज्ञ जो सलवा जुडूम मुहिम से शुरु से जुड़े हुए हैं, उनका कहना है कि यह संसार में अपने प्रकार की अनोखी, आतंकवाद के खिलाफ़ शांतिप्रिय मुहिम है जो अगर सफ़ल हो गई तो सारे संसार के लिए एक उदाहरण बन कर सामने आएगी। कर्मा, जिन्होने इस लड़ाई में अपना भाई खोया है कहते हैं कि कल तक यह नक्सलवाद की जंग सामंतवादियों, साहूकारों और उद्योगपतियों के खिलाफ़ थी लेकिन आज यह लोग अपने ही उद्देश्यों के खिलाफ़ हो गए हैं और उन लोगों के को मार रहे हैं जो सलवा जुडूम से जुड़े हैं।


अब सलवा जुडूम गांधीवाद पर चल पाएगा कि नही वो नही कहा जा सकता लेकिन नक्सलवादियों के लिए राजनीतिक रुप से एक विषम स्थिति पैदा हो गई है। अगर वो सलवा जुडूम पर हमला जारी रखते हैं तो इसका मतलब है उन्हें उनसे ही लड़ना होगा जिन पर वो अन्न, शरण और समर्थन के लिए निर्भर हैं।


दोरनापाल में आदिवासी अपने भविष्य को लेकर इतने दार्शनिक नही हैं, सोईमर्रा, एक कैंप का नेता जो सिर्फ़ अपना पहला नाम ही इस्तेमाल करना चाहता है और पूरा नाम नही बताना चाहता कहता है " अब हमें डर नही लगता, अब जब हम उनके खिलाफ़ खड़े हो गए हैं तो उनको पूरी तरह से नष्ट कर के ही दम लेंगे क्योंकि अगर हम बीच में ही रुक गए तो वो हमें नष्ट कर देंगे"।






आवारा बंजारा आभारी है पत्रकार नील कैट्ज़ का जिन्होनें अपनी यह रपट और विडियो यहां देने की अनुमति हमें दी, साथ ही हम आभारी है अपनी मितानिन
श्रीमती अनीताकुमार जी के जिन्होने सहर्ष इस रपट का अनुवाद किया। अनुवाद के बाद भी इस रपट को अंग्रेजी शैली में ही रखा गया है ताकि मौलिकता नष्ट ना हो!!






8 टिप्पणी:

ALOK PURANIK said...

बढ़िया है जी।
अनिताजी को भी बधाई।

mamta said...

ये साथ मे संगीत जो बज रहा है वो बहुत ही मधुर है। संगीत के साथ पोस्ट पढने मे अच्छा लगा।

rajesh advani said...

May be to some extent, I feel government is also responsible for these activities. For some predetermined time, government may appoint large number of military troops and get rid of "naxals"..Sounds easy! but I am sure there must be some way out! its not difficult.

Congrats for good post!

Gyandutt Pandey said...

संजीत, नक्सलवाद अपने वर्तमान रूप में पूर्वांचल के माफिया/डकैत से अलग नहीं है. उसे केवल विचारधारा का जामा पहनाया गया है जबकी यहां वह सामंतवाद और अराजक समाज की देन है.
क्या कहेंगे - सांपनाथ और नागनाथ.

रंजू said...

बहुत सही है कई विचार उठे इसको पढते हुए
अनिता जी का बहुत बहुत धन्यवाद
लेख की रोचकता बनी रही है आख़िर तक बधाई।

anuradha srivastav said...

संजीत रिपोर्ताज पढ कर वस्तुस्थिति पता चली । प्रयासों की कमी साफ झलकती है ।आजादी के बाद भी ये हालात
सोचने को मजबूर करते हैं।अनिता जी ने अनुवाद के साथ पूरा-पूरा न्याय किया है । नेपथ्य के संगीत में मातमी धुन
डालिये और आवाज मद्धम ताकि पढने में व्यवधान ना आये साथ ही जो कमेंट्री है स्पष्ट सुनायी दे ।

संजय तिवारी said...

यहां नहीं पढ़ रहा हूं. कापी करके प्रिंट कर लिया है. इत्मीनान से पढ़ेगे और विचारेंगे. टिप्पणी उसके बाद.

Ankit said...

बहुत अच्छी साईट बनाई है आपने, क्रप्या ये बता दिजीये कि मै भी अपनी ब्लाग साईट पर धुन कैसे डाल सकता हूँ?, मेरा पता हैः ankit4help@yahoo.co.in

धन्यावाद

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आपकी राय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।