अब तक आपने पढ़ा---
झीनी झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-1
तू तो रंगी फिरै बिहंगी:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-2
सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-4
पाहन पूजे हरि मिलै,तौ मैं पूंजूँ पहार:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-5
मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-6
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हरि का भजै सो हरि का होई:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-7
जाति-पांति पूछै न कोई।
हरि का भजै सो हरि का होई॥
हरि का भजै सो हरि का होई॥

छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ ने सर्वाधिक प्रभाव निचली या पिछड़ी जातियों पर ही डाला,लेकिन ऐसा नही है कि उच्च या सवर्णों पर कबीरपंथ का प्रभाव पड़ा ही नही। अब तक हुए वंशगद्दी आचार्यों में से एक-दो का विवाह ब्राम्हणी कन्या से होने का उल्लेख मिलता है। किसी ब्राम्हणी कन्या का विवाह किसी कबीरपंथी से होना तभी संभव प्रतीत होता है जब वह ब्राम्हण परिवार स्वयं भी कबीरपंथ का अनुयायी हो। दर-असल कबीरपंथ जब छत्तीसगढ़ में अपने पांव पसार रहा था तब की सामाजिक स्थिति ऐसी थी कि निचली जातियां सवर्णों से प्रताड़ित थीं और जाति-पांति का बंधन बहुत ज्यादा था। इसलिए कबीरपंथ के अनुयायी वही ज्यादा बने। जैसे कि सिदार,ढीमर, तेली,अहीर, लोधी, कुम्हार, रावत,पटवा, साहू,वैश्य,कुर्मी,कोष्टा और मानिकपुरी जिसे पनका या पनिका भी कहा जाता है। इनमें एक दोहा प्रचलित है।
पानी से पनिका भये,बूंदों रचा शरीर।
आगे-आगे पनका गये,पाछे दास कबीर।।
आगे-आगे पनका गये,पाछे दास कबीर।।
उनकी मान्यता है कि पनिका का उद्भव पानी से हुआ है - उनका शरीर पानी से बना है। पनिका मार्ग का नेतृत्व करते हैं और संत कबीर उनका अनुशरण। लगभग सभी पनिका कबीर पंथी हैं। पनिका शब्द की उत्पत्ति (पानी + का) से हुआ है। जैसा कि जाना जाता है जनमते ही मां ने कबीर को त्याग दिया था। मां ने एक पत्ते से कबीर को लपेटकर एक तालाब के पास छोड़ दिया था। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर किसी और मां ने उठा लिया और उसने अपनी संतान की तरह उन्हें पाला -पोसा। क्योंकि वह शिशु पानी की सतह पर मिला था, जो आगे चलकर कबीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ, इसलिए पनिका अपने को पनिका (पानी + का) कहने में गर्व का अनुभव करते हैं।

हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अनपे को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाज़ुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
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बैरागी बिरकत भला, गिरही चित्त उदार ।
दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार ॥1॥
`कबीर' हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार ।
तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार ॥2॥
ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ ॥3॥
कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥4॥
जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ ।
या आपा को डारिदे, दया करै सब कोइ ॥5॥
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह `कबीर' नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥6॥
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दुहुं चूका रीता पड़ैं , वाकूं वार न पार ॥1॥
`कबीर' हरि के नाव सूं, प्रीति रहै इकतार ।
तो मुख तैं मोती झड़ैं, हीरे अन्त न फार ॥2॥
ऐसी बाणी बोलिये, मन का आपा खोइ ।
अपना तन सीतल करै, औरन को सुख होइ ॥3॥
कोइ एक राखै सावधां, चेतनि पहरै जागि ।
बस्तर बासन सूं खिसै, चोर न सकई लागि ॥4॥
जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होइ ।
या आपा को डारिदे, दया करै सब कोइ ॥5॥
आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक ।
कह `कबीर' नहिं उलटिए, वही एक की एक ॥6॥
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अरे दिल,
प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्यों आया त्यों जावैगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्या क्या बीता।।
सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।
दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।
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प्रेम नगर का अंत न पाया, ज्यों आया त्यों जावैगा।।
सुन मेरे साजन सुन मेरे मीता, या जीवन में क्या क्या बीता।।
सिर पाहन का बोझा लीता, आगे कौन छुड़ावैगा।।
परली पार मेरा मीता खडि़या, उस मिलने का ध्यान न धरिया।।
टूटी नाव, उपर जो बैठा, गाफिल गोता खावैगा।।
दास कबीर कहैं समझाई, अंतकाल तेरा कौन सहाई।।
चला अकेला संग न कोई, किया अपना पावैगा।
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रहना नहीं देस बिराना है।
यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कॉंट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
यह संसार झाड़ और झॉंखर, आग लगे बरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।
यह संसार कागद की पुडि़या, बूँद पड़े घुल जाना है।
यह संसार कॉंट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है।
यह संसार झाड़ और झॉंखर, आग लगे बरि जाना है।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सतगुरू नाम ठिकाना है।
रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल
जैसा कि अजित वडनेरकर जी ने पिछली किश्त में कहा कि इसे कबीर या कबीरपंथी लेखन की अंतिम किश्त न कहें बल्कि यह कहें कि यह अस्थाई विराम है। अत: उनकी बात शिरोधार्य करते हुए फिलहाल कबीर या कबीरपंथ पर लेखन का यह अस्थाई विराम है,देखें दास कबीर फिर कब मन में चेतना जगाते हैं इस पर लेखन के लिए। इस पूरे लेखमाला के लेखन प्रेरणा के लिए अजित वडनेरकर जी की ही भूमिका रही। आभार उनका कि उनके कारण मैं खुद कबीरपंथ को इतना जान सका कि इस पर कुछ लिख पाया। इसके साथ ही वरिष्ठ साहित्यकार
जयप्रकाश मानस का भी मैं आभारी हूं जिन्होनें इस विषय पर मुझे अपना मार्गदर्शन दिया
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15 टिप्पणी:
कबीर और छत्तीसगढ़ पर जानकारी देने के लिए धन्यवाद.
बहुत बढ़िया जानकारी, संजीत ...कबीरपंथ पर तुम्हारी सभी पोस्ट बहुत बढ़िया रहीं...विराम के बाद की कड़ियों का भी इंतजार रहेगा...
संजीत आपके कबीर पर लेखन ने बहुत सारी नई-नई जानकारी दी। और उम्मीद करते है की ये अस्थाई विराम जल्द ही ख़त्म होगा।
और हाँ होली मुबारक हो।
रोचक ,तथ्यपरक ,सजीव ,चित्र सज्जित जानकारी के लिए धन्यवाद ,
अथ कबीरपुराणे प्रथमखंडे संजीतदीपक संवादे नाम्नः अन्तिमोअध्यायः "
कबीर ने "छोटी" जातियों पर तो प्रभाव डाला ही, सम्पूर्ण भारतीय मानस को गहरे से झिंझोड़ा है। जो कबीर को वह भाव नहीं देते, वे भी अपने अंतस में उनसे प्रभावित हैं जरूर।
संजीत भाई मै आपके इस बात से सहमत नही हु कि छ्त्तीसगढ के लोग सवर्ण जाति से प्रताडित थे. छ्त्तीसगढ के इतिहास देखे तो छ्त्तीस गढो मे आदिवासी राजाओ का संप्रभुत्व रहा है. बाद मे कुछ आदिवासी राजा क्षत्रीय गोड फ़िर क्षत्रीय राजा कहलाये. छ्त्तीसगढ के विभिन्न जनपदो मे कुर्मी जमीदार थे. उस स्थिति मे ये कहना कि छ.ग.के लोग सवर्ण जाति से प्रताडित थे हस्यपद हैं. आजकल ये चलन हो गया है कि किसी चार लोगो ने कह दिया वही सत्य है. उसी तरह ये भी है.
Sanjeet, is puri series se gyanvardhan ke liye bahut bahut saadhuvaad....puri series rochak rahi
अजित जी ने सही कहा ...अस्थाई विराम..... अगली बार आपकी आवाज़ में कबीर के दोहे सुनने का भी इंतज़ार रहेगा.
मीनाक्षी
होली की शुभकामनाएँ.
achchha kam hai.
संजीत जी बहुत दिनो से आपके चिट्ठे को पढ़ नही पाई हूँ क्योंकि होली पर ननद सपरिवार आई हुई है...व्यस्तता बहुत हो गई थी...
आपको व आपके पूरे परिवार को होली बहुत-बहुत मुबारक हो...
बधाई बंधु !
कबीर के रंगों की और
रंगों के त्यौहार की बधाई .
bahot achha laga aapko padhkar,kafi naya pan hai.
sath hi shukriya mujhe itna hosla dene ke liye...
bahut barhiya ..agli kadiyon ka intjaar rahega
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