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12 March 2008

सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3

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झीनी झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-1
तू तो रंगी फिरै बिहंगी:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-2

सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3

ब्रम्हलीन मुनि, कबीर चरितम में कहते हैं कि धर्मदास साहेब के बड़े लड़के नारायण दास ने अपनी वंश गद्दी की स्थापना बांधवगढ़ में ही की जो कि नौ पीढ़ियों के बाद प्रभावशाली नही रही जबकि छोटे लड़के चूरामणि ने मुक्तामणि के नाम से अपनी वंशगद्दी की स्थापना छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के ग्राम कुदुरमाल में की जिसे वंशगद्दी परंपरा का मुख्य केंद्र माना गया है।

भारत में भिन्न-भिन्न स्थानों में स्थित इस शाखा के प्रसिद्ध मठों के नाम इस तरह हैं।
कुदुरमाल,रतनपुर,मण्डला, धमधा, कवर्धा, दामाखेड़ा,बमनी,हरदी,धनौरा,कबीर मन्दिर मऊ,सहनिया(छतरपुर),सिंघोड़ी,छोटी बड़ैनी(दतिया) कबीर मन्दिर(नानापेट पूना),गरौठा(बुन्देलखण्ड),कबीर आश्रम जामनगर,दार्गिया मुहल्ला सूरत,लाल दरवाजा (सूरत), कबीर मन्दिर सीनाबाग बड़ौदा,अहमदाबाद,खैरा(बिहार),खांपा(नागपुर),बंगलौर,जालौन व खरसिया जहां कि विक्रम संवत 1990 में नादवंश स्थापित हुआ।



कुदुरमाल से कवर्धा और फिर दामाखेड़ा का सफर
कुदुरमाल के बाद गद्दियां रतनपुर, मंडला, धमधा, सिगोढ़ी, कवर्धा आदि में स्थापित हुई। अंतत: बारहवें महंत उग्रमुनि नाम साहेब ने विक्रम संवत् १९५३ में रायपुर जिले के दामाखेड़ा में मठ स्थापित किया।
तथ्य यह भी है कि कबीरपंथ के आठवें वंशाचार्य श्री हक्कनाम साहेब ने कवर्धा में वंशगद्दी स्थापित की। कवर्धा गद्दी पर उनके बाद उनके बेटे पाकनाम साहेब ने गद्दी संभाली फिर प्रगटनाम साहेब और धीरजनाम साहेब ने संभाली। इसी दौरान कवर्धा वंशगद्दी के लिए दादी साहेब उर्फ धीरजनाम साहेब(प्रगटनाम साहेब के भतीजे) और उग्रनाम साहेब के बीच बम्बई हाई कोर्ट में मुकदमा चला जिसमें जीत धीरजनाम साहेब की हुई। अर्थात कवर्धा गद्दी के उत्तराधिकारी धीरजनाम साहेब हुए। मुकदमा हार जाने के बाद उग्रनाम साहेब ने कवर्धा छोड़ दिया और रायपुर जिले के दामाखेड़ा में धर्मगद्दी का स्थानांतरण कर दिया। उग्रनाम साहेब के समय से ही छत्तीसगढ़ मे कबीरपंथ के अनुयायियों की संख्या कवर्धा आदि गद्दी की बजाय दामाखेड़ा गद्दी की ओर झुकती गई और अब यह सबसे प्रमुख केंद्र है।

दामाखेड़ा में कबीरपंथ वंशगद्दी की स्थापना के लिए ग्राम दामाखेड़ा को तब 14000 रूपए में बेमेतरा के कुर्मी भक्तों ने खरीदा था। यहां हर साल माघ शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक विशाल संत समागम व मेला का आयोजन होता है जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु-भक्त-व कबीर प्रेमी पहुंचते हैं।

दामाखेड़ा में वंशगद्दी की स्थापना बारहवें गुरु उग्रनाम साहेब ने की जिसमें आगे चलकर चौदहवें गुरु गृन्धमुनि साहेब भी हुए जिन्होने 18 फरवरी 1992 तक गद्दी संभाली। कहते हैं कि गृन्धमुनि साहेब के समय में छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ ने जितनी प्रगति की उतनी अन्य किसी आचार्य के समय में नही हुई। वर्तमान में पंद्रहवें वंशाचार्य श्री प्रकाशमुनि साहेब हैं।

1982-85 के एक सर्वेक्षण के अनुसार विभिन्न शाखाओं के कबीरपंथ के अनुयायियों की संख्या देश भर में 96 लाख थी जिसका सबसे बड़ा हिस्सा दामाखेड़ा वंशगद्दी का 33.5 फीसदी था। अर्थात कबीरपंथ की सभी शाखाओं में छत्तीसगढ़ी शाखा दामाखेड़ा गद्दी का प्रचार क्षेत्र सबसे बड़ा है और पंथ प्रचार में इसे सर्वाधिक सफलता मिली है।

.............जारी............

रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल





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15 टिप्पणी:

anuradha srivastav said...

संजीत कबीर -पंथ को अलग परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने के लिये साधुवाद। जानकारियां और तथ्य को जुटाने में जो मेहनत करी है वो सार्थक रही है।

Mired Mirage said...

रोचक जानकारी ।
घुघूती बासूती

Gyandutt Pandey said...

बन्धु, कबीर पर लिख रहे हो। इससे आपके व्यक्तित्व का बहुत प्रिय पक्ष परिलक्षित होता है।

मीनाक्षी said...

नई और रोचक जानकारी उपलब्ध कराने के लिए आभार... अब आपकी आवाज़ में कबीर के दोहे सुनने का इंतज़ार है..

रंजू said...

रोचक जानाकरी दे रहे हैं आप इस श्रंखला में .पढ़ना और जानना अच्छा लगा रहा है शुक्रिया संजीत जी !!

प्रशांत तिवारी said...

ऎसी वाणी बोलिये मन का आपा खोए ,औरो को शीतल करै आपो शीतल होए ............. बहुत बढिया भाई जी आपने तो मन को कबीर मय कर दिया

Shiv Kumar Mishra said...

संजीत, बहुत बढ़िया जानकारी है भाई. इतनी जानकारी जुटाने के लिए की गई मेहनत के लिए साधुवाद.

आभा said...

शुक्रिया भले मानुस संजीत को।

आभा said...

शुक्रिया भले मानुस संजीत को।

अजित वडनेरकर said...

मैं जब भूला रे भाई
मेरे सतगुरू जुगत लखाई

वाह संजीत, कबीरपंथ की छत्तीसगढ़ कथा भली लग रही है। अच्छा शोध किया है और सलीके से लिखा जा रहा है। चलते रहिए, हम पढ़ रहे हैं और सहेज भी रहे हैं।

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

पढ रहा हूँ लगातार।

Anonymous said...

Thanks. very very good information. i have been reading these comments continously. ---- jaspreet

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

धन्यवाद, आगे की कडियों का इंतजार है ।

दीपक said...

इस जानकारी के लिए निशित ही आपका श्रम सराहनीय है
"छत्तीसगढ़ में पंथ की स्थापना के मुख्य उद्देश्य पर भी प्रकाश डाले ??

Dr. Chandra Kumar Jain said...

SUKHIYA SAB SANSAAR,
KHAAVE AUR SOVE.
DUKHIYA DAS KABIR,
JAAGE AUR ROVE.
sajeet ji,
isi tarah jaagne-jagaane vali
post jaree rakhiye.KABIR KI DEEVAANGI PAR TO KOI DIVAANA HI KUCH KAH SAKTA HAI. BADHAI...

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