मेरे ब्लॉग पर आने के लिये शुक्रिया! कृपया कमेंट्स दे कर अपनी राय से अवगत कराएं!! आवारा बंजारा: मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-6

18 March 2008

मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-6

अब तक आपने पढ़ा---
झीनी झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-1
तू तो रंगी फिरै बिहंगी:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-2
सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-4
पाहन पूजे हरि मिलै,तौ मैं पूंजूँ पहार:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-5
अब आगे पढ़ें---

मोको कहां ढूढें तू बंदे मैं तो तेरे पास मे:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-6


लंबा मारग, दूरि घर, विकट पंथ, बहु मार।
कहौ संतो, क्यूं पाइये, दुर्लभ हरि-दीदार॥


कबीर और धनी धर्मदास की स्मृति में दामाखेड़ा में हर साल आयोजित होने वाला 'संत समागम समारोह' खासा महत्व रखता है। इसमें हिस्सा लेने के लिए देश विदेश से कबीरपंथ के अनुयायी पहुंचते हैं।
इस समारोह के दौरान कार्यक्रम को इस तरह बांटा गया है।
1-बसंत पंचमी (गुलाल-उत्सव)
2-संत समागम

3-भेंट बंदगी
4-सत्संग सभा
5-पंथश्री का प्रवचन
6-पूनों महात्म्य पाठ
7-आनंदी चौका आरती(सात्विक यज्ञ)
8-सामूहिक चलावा चौका
9-सामूहिक दीक्षांत समारोह व पंजा वितरण

आईए देखें दामाखेड़ा के कुछ चित्र



`कबीर सब जग हंडिया, मांदल कंधि चढ़ाइ।
हरि बिन अपना कोउ नहीं, देखे ठोकि बजाइ॥


`कबीर' कलिजुग आइ करि, कीये बहुत जो मीत ।
जिन दिलबाँध्या एक सूं, ते सुखु सोवै निचींत ॥

कामी लज्या ना करै, मन माहें अहिलाद ।
नींद न मांगै सांथरा, भूख न मांगै स्वाद ॥


माषी गुड़ मैं गड़ि रही, पंख रही लपटाइ ।
ताली पीटै सिरि धुनैं, मीठैं बोई माइ ॥


घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे।
घट-घट मे वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥
धन जोबन का गरब न कीजै, झूठा पचरंग चोल रे।
सुन्न महल मे दियना बारिले, आसन सों मत डोल रे।।
जागू जुगुत सों रंगमहल में, पिय पायो अनमोल रे।
कह कबीर आनंद भयो है, बाजत अनहद ढोल रे॥

जारी………कल अंतिम किश्त……



रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल

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12 टिप्पणी:

Vaishali said...

Waah Sanjeet ji...bahut khub likh rahe hai aap....maine zyada padha to nahi Kabir ji ko....lekin jitna aapke blog mein padha vaakai kaafi informative hai...

दीपक said...

लाली मेरे लाल की जित देखु तित लाल |
लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल |
हमारा भी कुछ इसी तरह हाल है ,हर बार अति उत्तम कहा था ,इस बार सर्वोतम ...

swati said...

bahut dino ke baad kabir ke baare me fir padha .purani yaadein taazan ho gayi.shukriya

Home Theater said...

Hello. This post is likeable, and your blog is very interesting, congratulations :-). I will add in my blogroll =). If possible gives a last there on my blog, it is about the Home Theater, I hope you enjoy. The address is http://home-theater-brasil.blogspot.com. A hug.

रंजू said...

घूँघट का पट खोल रे, तोको पीव मिलेंगे।
घट-घट मे वह सांई रमता, कटुक वचन मत बोल रे॥

बहुत ही अच्छी जानकारी यह पंक्तियाँ तो हमेशा दिल में ही रहती है :) शुक्रिया

Gyandutt Pandey said...

इतना लिख रहे हैं कबीरपर कि आपका ब्लॉग ही कबीरपन्थी हो गया है। सही में, ब्लॉग में एक धुन से काम करना चाहिये।

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

सुन्दर प्रस्तुति ।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

भाई सन्जीत जी,
अंतिम किस्त की भी प्रतीक्षा रहेगी .
ब्लॉग -जगत के सुन्न महल में दियना बारने जैसी
मनोहारी-मुग्धकारी है आपकी यह प्रस्तुति !
चित्र -सूक्ति -सन्दर्भ का ऐसा सुंदर संगम !
आपका यह श्रम साध्य उद्यम सचमुच यादगार है.
बधाई.

आभा said...

अच्छे बच्चे की तरह ऐसे ही जानकारी देते रहिए -अनुज संजीत।

हर्षवर्धन said...

संजीत, आप बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। मुझे पूरा भरोसा है कि आगे इंटरनेट पर कबीर का संदर्भ खोजने के लिए लोग आपके ब्लॉग पर आएंगे।

anuradha srivastav said...

कबीर पंथ के बारें में जानकारियां जुटाने और उनसे अवगत कराने के लिये शुक्रिया।

अजित वडनेरकर said...

कबीरधाम के चित्र भी समेट लिए इस श्रंखला में , ये बहुत अच्छा किया। अंतिम किस्त क्यों कहते हैं ? अभी तो कई आयाम सामने आएंगे और आप फिर फिर लिखने पर विवश होंगे। अंतिम नहीं , ...इस श्रंखला को अस्थाई विराम देता हूं...ऐसा कहिए।