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14 March 2008

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-4

अब तक आपने पढ़ा,
"झीनी-झीनी बीनी चदरिया:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-1"
"तू तो रंगी फिरै बिहंगी:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-2"
"सुखिया सब संसार है,खाये और सोये:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-3"

अब आगे पढ़ें चौथी किश्त-


मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में:छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ-4

वेद पुराण सब झूठ है,हमने इसमें पोल देखा।
अनुभव की बात कहे कबीरा,घट का परदा खोल देखा॥


छत्तीसगढ़ में धनी धर्मदास द्वारा स्थापित कबीरपंथ की वंशगद्दी में अब तक चौदह गुरु हो चुके हैं तथा वर्तमान में पंद्रहवें आचार्य गद्दी पर विराजमान हैं जिनका ब्यौरा इस तरह है-

1- मुक्तामणि नाम साहेब विक्रम संवत 1538 से 1630
2- सुदर्शन नाम साहेब विक्रम संवत 1595 से 1630
3- कुलपत नाम साहेब विक्रम संवत 1652 से 1690
4- प्रमोद गुरु बालापीर साहेब विक्रम संवत 1728 से 1750
5- केवल नाम साहेब विक्रम संवत 1760 से 1775
6- अमोल नाम साहेब विक्रम संवत 1782 से 1825
7- सुरत सनेही नाम साहेब विक्रम संवत 1802 से 1853
8- हक्क नाम साहेब विक्रम संवत 1835 से 1890
9- पाक नाम साहेब विक्रम संवत 1855 से 1912
10- प्रकट नाम साहेब विक्रम संवत 1875 से 1939
11-धीरज नाम साहेब विक्रम संवत 1899 से 1937
(धीरज नाम साहेब गद्दीनशीन नही हुए क्योंकि इनका सतलोक गमन प्रकटनाम साहेब से पहले ही हो गया था)
12- उग्रनाम साहेब विक्रम संवत 1929 से संवत 1971
13- दया नाम साहेब विक्रम संवत 1956 से 1984
14- गृन्धमुनि नाम साहेब विक्रम संवत 1922( सन 1935 ) से सन 1992 तक
15- प्रकाश मुनि नाम साहेब जिनका जन्म हुआ सन 1967 में, 1990 में गद्दीनशीन हुए व वर्तमान में यही दामाखेड़ा के पंद्रहवें वंशगद्दी आचार्य हैं।



मै कहता सुरझावन हारी,तू राख्यो अरुझाई रे।
मै कहता तू जागत रहियो, तू जाता है सोई रे।।

वह बातें जो छत्तीसगढ़ के कबीरपंथ की पहचान हैं
1- छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ के अंतर्गत यहां एक विशिष्ठ प्रकार की मठ व्यवस्था प्रचलित है।
2- गुरु की संतान गद्दी की उत्तराधिकारी होती है।
3- अधिकांश कबीरपंथी श्वेत वस्त्र धारण करते हैं क्योंकि उनन्के अनुसार यह आभ्यांतरिक शुद्धि और ज्ञान का प्रतीक है।
4- कबीरपंथी धोती व अचला धारण करना त्यागी और निरक्त जीवन का चिन्ह मानते हैं। ये गले में तुलसी की माला धारण करते हैं, औरतें भी कण्ठी धारण करती हैं।
5- कबीरपंथी द्वादश तिलक लगाते हैं। यह तिलक न्यायपूर्ण जीवन का प्रतीक माना जाता है।
6- कबीरपंथी अपने महात्मा या गुरुओं को तीन बार बंदगी करते है।
7- छत्तीसगढ़ी कबीरपंथी शाखा में पूर्णिमा का विशेष महत्व है। उनका यह विश्वास है कि जो व्यक्ति पूर्णिमा के दिन यह व्रत रखते है उन्हें ॠद्धि-सिद्धि, भक्ति व मुक्ति प्राप्त होती है।
8- चौका आरती को कबीरपंथ में महत्वपूर्ण विधान माना जाता है।
9- कबीरपंथ के अनुसार शव को पृथ्वी में गाड़ देने का विधान है व इसके लिए विशेष विधि प्रचलित है।


…………………जारी……………


रचना स्त्रोत
1-छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ का ऐतिहासिक अनुशीलन-डॉ चंद्रकिशोर तिवारी
2-कबीर धर्मनगर दामाखेड़ा वंशगद्दी का इतिहास-डॉ कमलनयन पटेल



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8 टिप्पणी:

anuradha srivastav said...

जितना पढते जा रहें हैं ,उतनी ही जिज्ञासा बढती जा रही है। अभी से अगली कडी का इन्तजार शुरु हो गया है।

दीपक said...

चलिए आज हमें पहली टिपण्णी देने का सौभाग्य मिल गया | कबीर के दोहे से आपने विषय को ने सरसता दी है |आवश्यक बाते एक पंक्ति में ख़तम कर आपने विषय को बोझिल नहीं होने दिया |" धन्यवाद "

Anonymous said...

bahut acchi jankari di hai aaj, pehli bat to ye hai ki jin logo ne gaddi sambhali un sabka overview ek sath mila. i think ek cheez aur jodi ja sakti hai, jo kabeer vachan likhte ho doha ya anya kisi roop mein tumhe uska arth bhi mention karna chahiye. kyunki mujhe lagta hai agar 50 log tumhari batein padte hain to keval 35 to 40% hi logo ko vani ka arth samajh mein aata hai. this is only my suggestion. baki sab to top class ka hai. usmein koi do rai nahin hai. thanks. - Jaspreet

Anonymous said...

bahut acchi jankari di hai aaj, pehli bat to ye hai ki jin logo ne gaddi sambhali un sabka overview ek sath mila. i think ek cheez aur jodi ja sakti hai, jo kabeer vachan likhte ho doha ya anya kisi roop mein tumhe uska arth bhi mention karna chahiye. kyunki mujhe lagta hai agar 50 log tumhari batein padte hain to keval 35 to 40% hi logo ko vani ka arth samajh mein aata hai. this is only my suggestion. baki sab to top class ka hai. usmein koi do rai nahin hai. thanks. - Jaspreet

रंजू said...

एक और रोचक जानकरी देती है यह श्रृंखला ..बहुत ही सरल और रोचक ढंग से पेश कर रहे हैं आप संजीत जी इसको शुक्रिया

छत्तीसगढिया .. Sanjeeva Tiwari said...

सराहनीय कार्य बंधु, इसका दस्तावेजीकरण भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण होगा ।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

भाई सन्जीत जी .
सचमुच अब मन लग गया आपके ब्लॉग में !
आप शब्द -संसार के साथ अपनी माटी की अनुकरणीय सेवा कर रहे हैं .
बधाई ------बधाई -----बधाई !

Vikas said...

टहलते टहलते आप के ब्लॉग पर पहुच गये. पढ़ कर अच्छा लगा, अगली कड़ी का इन्तेज़ार रहेगा.

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आपकी राय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।