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10 June 2007

नक्सली हिंसा और हमारे कुछ पत्रकार बंधु

छत्तीसगढ़ के नक्सली समस्या के संदर्भ में जितने भी पत्रकार बंधुओं से ऑनलाइन या ई-मेल के माध्यम से बात हुई उनमें से अधिकांश ढंके छुपे शब्दों मे नक्सलियों के कृत्य का समर्थन करते प्रतीत होते हैं ( मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी यह बात सभी पत्रकारों पर लागू नहीं होती)। हां एक दो पत्रकार बंधु ने अपनी टिप्पणी और ई-मेल में नक्सली व पुलिसिया हिंसा का विरोध जरुर किया है। संभव है यह मेरी भूल या कम समझदारी हो जो मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा हो पर ज्यादातर का कहना है कि नक्सली से ज्यादा आमजन तो पुलिस और सलवा जुडुम वाले मार रहे हैं।

शायद हमारे ये पत्रकार बंधु ऐसा कहकर नक्सलियों के कृत्य को कमतर आंकने की कोशिश कर रहे हैं। अपनी बात के समर्थन में ये बंधुगण सरकारी अंदाज़ में आंकड़ों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि नक्सलियों ने कम लोग मारें है और दूसरे पक्ष ने ज्यादा पर भाई आप लोग शायद यह तो भूल जा रहे हैं है कि बीच में मारा तो आमजन ही जा रहा है। बस मेरा विरोध इसी आधार पर है।नक्सलियों को क्या अधिकार है कि वह अपनी बातें मनवाने के लिए आम-जनता की हत्याएं करते फ़िरे,क्या यही वह नक्सल आंदोलन है जो नक्सल-बाड़ी से शुरु हुआ था। नक्सल आंदोलन जिस विचारधारा के तहत शुरु हुआ था कहां है आज वह विचारधारा।इसी तरह पुलिस और सलवा जुडुम के एस पी ओ को भी कोई अधिकार नही कि वह आम जनता में अपनी दहशत फ़ैलाए बजाय उनकी मदद और रक्षा करने के।
खबरों के आधार पर मैं इस बात से सहमत हूं कि बस्तर में पुलिस और सलवा जुडुम वालो का भी नक्सलियों की तरह आतंक है और वहां के ग्रामीण दो पाटों में पिस रहे हैं। मैं यह नहीं कहुंगा कि ऐसा कुछ भी नहीं है कि पुलिस और सलवा जुडुम के स्पेशल पुलिस ऑफ़िसर के द्वारा लोग नही मारे जा रहे पर आप आखिर किस आधार पर और क्यों नक्सलियों के समर्थन वाले अंदाज़ में अपनी बात कहते हैं। यदि आपकी नज़र में हिंसा का माध्यम ज़ायज़ है फ़िर तो राजस्थान में आरक्षण की मांग को लेकर जो हिंसा हुई उसे भी आप सही ठहरायेंगे। बस्तर के चारों जिले में बिज़ली टॉवर गिराकर,बिज़ली सप्लाई को एक हफ़्ते से रोक कर बस्तर को कितने साल पीछे धकेल दिया गया। नक्सली सरकारी संपत्ति को नुकसान क्या पहुंचा रहें बल्कि सीधे नष्ट कर रहे हैं,बिज़ली के टॉवर पे टॉवर गिराए गिराए जा रहे हैं। सरकारी नुकसान हो रहा है लेकिन भैय्या,सरकार के पास आखिर आप से, मुझ से,हम सब से ही तो पैसा पहुंचता है ना,जितना सरकारी नुकसान होगा टैक्स के माध्यम से फ़िर उसकी भरपाई की जाएगी,आपकी मेरी और हम सबकी जेब से ही तो जाएगा ना।

एक पत्रकार बंधु का कहना है कि नक्सलियों के सफ़ाए अभियान के पीछे दर-असल बहुराष्ट्रीय और देश की ही बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए जमीन खाली करवाने की कवायद है,तो भाई आप केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनवाईये ना कि वह आदिवासी इलाकों मे उद्योग लगाने की अनुमति ही ना दे। एक तरफ़ हम औद्योगिकीकरण और आर्थिक उदारीकरण का समर्थन करते हैं और दूसरी तरफ़………… यह तो वही बात हो गई ना कि "मीठा-मीठा गप-गप और कड़वा-कड़वा थू-थू"! आधुनिक समय में विकास की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है यह हम सभी जानते हैं।

बंधुगणों एक खबरची या एक बाईट कलेक्टर के नज़रिए से हटकर सिर्फ़ एक भारतीय और सिर्फ़ इंसानियत(अगर बाकी हो तो) के नज़रिए से भी सोच कर देखियेगा।

एक छोटा सा सवाल हमारे पत्रकार बंधुओं से कि क्या यह संभव है कि रायपुर या नई दिल्ली में बैठकर वर्तमान बस्तर की नक्सल समस्या की सही रिपोर्टिंग हो सकती है।

नक्सली अहिंसक आंदोलन क्यों नहीं चला सकते। हम नक्सलियों की हिंसा को किस आधार पर सही ठहरा सकते हैं क्या हम यह चाहते हैं कि भारत में भी नेपाल की तरह नक्सली और भी आक्रामक हो जाएं,क्या हम चाहते हैं कि भारत में भी श्रीलंका के कुछ खास हिस्सों की तरह लिट्टे की समानांतर सरकार वाले हालात पैदा हो जाएं।


नक्सली हिंसा के विरोध में यह दूसरी बार लिखते हुए मेरी हवा भी हो रही है क्योंकि खबरें बताती हैं कि राजधानी रायपुर में भी बहुत से नक्सली समर्थक बैठे हुए हैं। कहीं ऐसा ना हो कल हो जाए अपना राम-नाम सत्य। (स्माईली लगाना नहीं आता बावजूद इसके कि ई-पंडित की पाठशाला का छात्र हूं)

5 टिप्पणी:

राजीव रंजन प्रसाद said...

संजीत भाई।

बस्तरिया होनें के नाते अपना दर्द बयां कर रहा हूँ। नक्सली बस्तर में आवाज की तरह पनपे और नासूर बन कर रह गये। दिशाहीन पत्रकारों की नक्सलियों के समर्थन में बहुत सी लफ्फाजियाँ निरंतर पढीं है। लेकिन मेरे छत्तिसगढी पत्रकार बंधुवों जब मेरे प्यारे बस्तर को असाम-मणिपुर बना दोगे तब चैन मिलेगा क्या? सच लिखा जाना चाहिये लेकिन केवल जिम्मेदार कलम ही सच को परख सकती है। केवल छपास बुझाने के लिये झोला ले कर लाल सलाम लाल सलाम करते रहने वाले कम फोडा नहीं है मेरे बस्तर के वदन पर...अफसोस..

मेरे निजी विचार इस कविता में आप पढ सकते है:
http://merekavimitra.blogspot.com/2007/03/blog-post_6203.html

इस रचना को यदि आप सुनना चाहें:
http://hindyugm.mypodcast.com/2007/05/post-18999.html

*** राजीव रंजन प्रसाद

संजय बेंगाणी said...

पत्रकार बन्धू नक्सलियों को कमतर नहीं आंक रहे है, न ही आंक सकते है. क्योंकि वे तो खुद नक्सली है. आयी बात समझमें.

Manish said...

नक्सलवाद जिस विचारधारा को लेकर आगे बढ़ा था वो पीछे छूट गई लगती है। पहले ग्रामीण सामाजिक ढांचे को बदलने की उनकी परिकल्पना पर सहानुभूति रखते थे और उनका समर्थन करते थे। आज मुख्यतः दहशत की वजह से करते हैं ।सही कहा आपने कि इस युद्ध में आखिरकार पिसना आम आदमी को ही पड़ता है।

Kumar Rahul said...

I totally agree with you. There is a tendency of the learned people these days to think against the flow of thinking in the society. They try to oppose what a common man supports and they support what a common man opposes. For example, the learned and so called intellectual people will support MF Hussain for the right to expression. They will oppose Bush even when he does some thing good. Similarly they will support the terrorists citing the pathetic failure of the governments. What they forget is that the democracy is for the common man. And the age old saying: “Bade hue to kyaa huaa, jaise ped khajoor; panthi ko chhaya nahi, fal laage ati door”. Don’t grow that big that you forget the roots. Another example to prove this is Sashi Tharoor calling MF Hussai, the Picasso of India.

Sanjeeva Tiwari said...

कर्तव्‍य होता है जनता के लिए लिखना, चाहे वह पत्रकार हो या ब्‍लागर्स आपने सही लिखा कि पूरी लेखक बिरादरी नक्‍सलवाद के पक्षधर नजर आते हैं पर आपके विचारों का अब सम्‍मान हो रहा है आपने स्‍थानीय अखबारों में भी देखा होगा पत्रकार अब नक्‍सलवाद के विरोध में भी लिखने लगे हैं । रही बात गोलियों की तो यही बात पहले सडवा जूलूम के विरोधी कहते थे आज परिस्थितियां हमारे अनुकूल है जो सच है उसे सबके सामने लाना हमारा प्रथम कर्तव्‍य है । देखें आज मेरा एक पोस्‍ट इसी संबंध में आरंभ में है ।

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