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08 June 2007

जब मित्र ने बांची हमारी जन्म कुंडली

जब मित्र ने बांची हमारी जन्म कुंडली


हमारे मित्र चंद्रशेखर पाठक एक मल्टीनेशनल दवा कंपनी में ऊंचे ओहदे पर हैं। चार राज्य संभालते हैं तो ज्यादातर दौरे पर ही रहते हैं। जब भी शहर में होते हैं तो हमारी शामें अक्सर साथ ही गुजरती हैं। पाठक जी फ़लित ज्योतिष-कुंडली के अच्छे जानकार हैं।
एक दिन उन्होंने हमारी कुंडली देखी और खुश हो कर कहा -"वाह! तुम्हारी कुंडली जैसी कुंडली तो बहुत कम ही देखने मिलती है।"
इतना सुनना था कि हमारे मन में लड्डू फ़ूटने लगे कि बॉस! जरुर हमारी कुंडली में इस सूखे के जमाने में भी धन वर्षा का योग होगा,राजपाट का जमाना तो है नहीं लेकिन जरुर किसी बड़े उद्योग या फ़ुरसतिया टाईम्स जैसे किसी अखबार का मालिक बनना लिखा होगा।
मित्र ने आगे कहा- "सुनो! तुम्हारी कुंडली में गुरु-शुक्र का ऐसा योग है जिससे पता चलता है कि यह तुम्हारा अंतिम जन्म है इसके बाद सीधे मोक्ष,मुक्ति।"यह सुनते ही हमारे मन के लड्डू कड़वे होने लगे और हमने कहा-" यार! मुमुक्षु मैं जरुर हूं क्योंकि………
अंत्ययुग में जन्मा मैं,
थी अभिलाषा पितृजनों की,
पाकर ज्ञान "वेद" का बनुं मैं "संजय" !
बीता काल हुआ मैं अखर्त,हुआ अखर्त बना वागीश,
ना बना मैं वाहक,पुर्वीण गुणों का!
ना ही बना मैं निर्वाहक,प्रतन संस्कृति का!
प्रतीक्षारत हुं नवाधार के,सृष्टि के नव-सृजन हेतु!
बना वसु को प्रतिसंगी,संक्षय की बेला में,
मोक्ष-संजन की प्रतीक्षा में,संजीनत होने को आतुर!
…………........मुमुक्षु मैं संजीत...........
पर अंतिम जनम हो या ना हो क्या फ़रक पड़ता है। मजा तो तब आए जब यही जनम सुख-चैन की बंशी बजाते हुए गुजरे। अगला जनम किसने देखा है।"

मित्र ने फ़िर कहा-" बॉस! तुम्हारी कुंडली बता रही है कि बहुत जल्द ही तुम निपट जाओगे अर्थात शादी हो जाएगी तुम्हारी।"
हमने कहा-"लो एक और लोचा,यहां हम पिछले तीन-चार सालों से सफ़लतापूर्वक अपनी शादी का मुद्दा टालते आ रहे हैं और इंशाअल्लाह ऐसे ही टालते जाएंगे। अमां यार शेखर तुम दोस्त हो या दुश्मन जो हमे निपटवाने की सोच रहे हो।"

पाठक जी ने फ़िर मुंह खोला- "ये देखो गुरु जो है वह स्वग्रही होकर व्ययेश के रुप में बैठा है।"
हमने कहा-"यह तो अच्छी बात है कि गुरु अपने ही घर में बैठा है,भला पराए घर में बैठ कर आसपड़ोस में नज़र मारना गुरु को शोभा देगा क्या। खैर मित्र! आप यह बताओ कि इसका फ़ल क्या होगा।"
पाठक जी उवाच- "देखो इसका मतलब है कि तुम्हारे पास लक्ष्मी टिकेगी नहीं,बस आएगी और जाएगी।"
हमने कहा- "प्रभु! किसी चीज के जाने के लिए पहले उसे आना भी पड़ता है ना,हमारे पास जब लक्ष्मी आती ही नहीं है तो जाएगी कहां से। फ़िर अपन ठहरे सरस्वतीपुत्र और सरस्वतीपुत्रों पर तो लक्ष्मी वैसे भी कभी कृपा नहीं करती।"

मित्र ने फ़िर कुंडली पर नज़र मारी और कहा- " अरे! तुम कहां धंधे-पानी में लगे हुए हो यार,तुम तो अखबार लाईन के लिए ही बने हो। जाओ फ़िर से कोई अखबार ज्वाईन करो।"
हमने जवाब दिया- "मान लिया कि हम अखबार के लिए बने हैं पर कौन सा अखबार हमारे लिए बना है या हम आखिर किस अखबार के लिए बने हैं यह कैसे मालूम चले। चलो बैठकर सभी अखबार की जनम-कुंडली बनाकर अपनी कुंडली से मिलाते हैं,जहां जिस अखबार से कुंडली मैच हो जाएगी अपन वहीं खटने चले जाएंगे।"

अब हमारे मित्र के चेहरे पर झुंझलाहट के हल्के चिन्ह दिखाई देने लगे थे। इसी हालत में उन्होनें कहा -" तुम्हारी कुंडली के योग बताते हैं कि तुम इश्क के चक्कर में तो नहीं पड़े हो पर तुम पे मरने वाली,तुम्हारे आगे-पीछे घुमने वाली कन्याएं बहुत हैं।"
इतना कहकर हमारे मित्र पंडित वाला चोला उतार कर सिर्फ़ मित्र वाली भूमिका में आ गए और हमसे कहने लगे-"बॉस! कौन हैं यह लड़कियां, यार हमारी भी दोस्ती करवाओ ना उनसे।"
हमने माथे पे हाथ धरते हुए कहा-" अबे ढक्कन! इतनी कन्याएं अगर हमारी दोस्त होतीं तो हमें किस कीड़े ने काटा था कि हम अपनी शामें तुम्हारे साथ बिताते। उन कन्याओं के साथ कैफ़े काफ़ी डे, शापिंग मॉल में न बिताते या उन कन्याओं के साथ लांग ड्राईव पर न जाते?"

मित्र को यकीन ही ना हुआ क्योंकि उन्हें अपने ज्योतिष ज्ञान पर पूरा भरोसा था, खैर उनके इस ज्ञान पर विश्वास तो हमें भी पूरा था। हमारे मित्र इस मामले को लेकर अब रूठने वाले अंदाज़ में आ गए थे और इसी अंदाज़ में उन्होंने कहा-" ठीक है,ठीक है तुम लड़कियों के लिए अपने दोस्त से झूठ बोल रहे हो ना। दोस्त-दोस्त ना रहा………………"

स्थिति बिगड़ने जा रही थी तो हमने उन्हें समझाने की कोशिश की -" भैया मेरे! तुमने आज तक किसी कन्या के साथ मुझे शहर में घुमते देखा या किसी से सुना है क्या?"
तब जाकर मित्र ने कहा-" हां! यह बात तो है ना देखा ना सुना पर मुझे अब यह समझ में आ गया कि तुम्हारा मोबाईल तुम्हारे कानों से इतना ज्यादा क्यों चिपका हुआ रहता है।"
हड़बड़ाते हुए हमने कहा-" गज़ब करते हो यार! अब काम-धाम के फोन आएं तो उठाएं ही नहीं का भला। फ़ुनवा आया इसका यह मतलब तो नहीं कि किसी कन्या का ही है।"
मित्र फ़िर भड़के-" रहने दो,रहने दो। तुम्हारी कुंडली और अंक-ज्योतिष के आधार पर तुम्हारा मूलांक दोनो ही बता रहें हैं कि तुम संपर्क के सभी साधनों का भरपूर दोहन करते हो खासतौर से दूरभाष का।"

आखिरकार हमने उनके हाथ जोड़े और कहा कि सरकार हमारे कपड़े हमारे तन पे ही रहने दो कपड़ों के बावजूद हमें नंगा ना करो यार! चलो बाहर कुछ खा पी कर आते हैं।

तब से अपन ने अपनी कुंडली को आलमारी में ताले के अंदर यह सोचकर रख दिया है कि अब से किसी को नही दिखाना है। अब अगर हमारे मित्र पाठक साहब ने हमारी यह पोस्ट पढ़ ली तो अपन तो समझ लो कि गए काम से। दर-असल बातचीत के दौरान मस्ती में हमने अपने मित्र की हर बात काटी जरुर पर हम जानते हैं कि उनका ज्योतिष ज्ञान खासतौर से कुंडली विवेचन ज्ञान बहुत अच्छा है। 90 फ़ीसदी सही ही रहता है उनका कुंडली विवेचन।


कुंडली और इन्हीं मित्र से जुड़ा एक और किस्सा फ़िर कभी।

7 टिप्पणी:

Maulik's Blog said...

Yani aab aapke blog mein bhi ladkiyan....Awara sahi mein banzara ban gaya hai....aur na ho jyotish ki ek baat toh sach hone wali lagti hai ki jaldi hi shaadi ki kundli mein padne wale ho

Sanjeeva Tiwari said...

धनिया बों दिये भईया . . . .
पाठक पंडित बिचारा तो नई पढ सकिस हमी मन फदक गेन …..
वैदिक ज्‍योतषि ल सरोए ला लागिही तईसे लागत हे .
फेर ये बात पता चलिस “तुम पे मरने वाली,तुम्हारे आगे-पीछे घुमने वाली कन्याएं बहुत हैं।“
आपके सरसती के लईका वाले बात ले हम सहमत नई अन हिन्‍दी चिटठाकारी म तो सरसती के लईका मन हर चिटठाकारी करत हे अउ लक्षमी दाई उखर मन बर परसन्‍न हे तभे त चिटठाकार मन नवां नवां कार लेवत हें, अउ तोरेच जईसे निगेटिब सोंचईया ला बताये खातिर ओखर बिबरन घलोक देवत हें . चिंता झिन कर
अउ “मुमुक्षु संजीत” हर काबर “प्रतीक्षारत हुं नवाधार के,सृष्टि के नव-सृजन हेतु !”
लाडू खये बर तोर “गुरू” हर आते हे नवम्‍बर म, त बजा ले बाजा .

Udan Tashtari said...

अच्छा किया गुरु की साख बचा ली.
बाकी तो जब मिलेंगे, हम कुंडली बांच ही देंगे… :)

एक बार सारे चिट्ठों का भविष्यफल तो बता ही चुके हैं:

http://udantashtari.blogspot.com/2006/10/blog-post_24.html

Kumar Rahul said...

Excellent writing. Dil khush ho gayaa. You have proved that clean, entertaining writing is possible which can make us laugh. Newspapers should publish such healthy entertainment instead of films and glamorous articles.

अरविन्द चतुर्वेदी said...

ई का पंडित जी ?
आपहू ?
यानी आपहू इन पौंगा पंडितन के चक्कर मेँ आइ गये ?झाडे रहो कलेक्टरगंज .
वैसे तो पांचों उंगलियां घी मंइया हैं ( और ...कढाई मां? )

अरविन्द चतुर्वेदी
भारतीयम्

KK said...

Sahi hai! lage raho..... :)

anitakumar said...

matlab yeh ki pathak ji ne jo kahaa woh 90% such toh fir kaahe inkaar kerte ho...nipatna likha hi hai yog mein toh nipat lo, ab niyati se thode hi jhujha ja sakta hai...itte saare chukku se toh ek talwaar bhali ..kyun ji..aur yeh funwa ka kya chakkar hai ..itte call suchchi dhandhe paani ke aate hain ..woh anil ambaani toh bol riya tha usko ek do hi aate hain..tumara dhanda toh khoob chamk riya hai babu...hehehehehehe

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