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12 June 2007

छत्तीसगढ़ी लोककथा-2


तिलमति-चांउरमति

बाम्हन-बम्हनिन एक सहर म रहत रहिन। दोखहा पेट के कारन उनला भीख मांगे बर एती-उती जाय ल परय।। एक दिन भीख म उनला दू ठो बेल मिलिस। बेल कच्चा रहिस तौ ओला पकोए बर ओमन
एक ठो ल तील म अउ दूसर ल चांउर म गड़िया देइन। दिन उपर दिन बीतत गइस अउ ओमन गड़ियाए बेल के सुरता अइसे बिसरा दिन जानौ-मानौ बेल उनला मिलेच नइं रहिस।

एक दिन राजा के घोड़सार ले घोड़ा ढिला के जो छूटिस के हड़बड़ी मचगे अउ दीवान संग सिपाही मन हदबिद-हदबिद भागिन। घोड़ा हर बाम्हन-बम्हनिन के घर के रांचर के उप्पर कूद के अंगना म सुखोये
बर बगरे गरीबहा धान ल खाए लगिस। घोड़ा के पाछू करत सहिस ह अंगना हबरिस तौ देखत हे-अपछरा सांही गदराए आमा कस सुघ्घर दू ठो जवान टूरी। तुरते सहिस ह जाके राजा ल आंखी देखी सबो बात बताइस।
संझाकुन चिरई चिंव-चिंव करत अपन खोंधरा डहार लउटिन अउ अपन लइका ल अपन मुंह ले चारा खबाए लगिन ओतके बेरा बाम्हन-बम्हनिन मन भीख मांग के आये तुरते खा-पी के तियार होय रहिन के राजा के सिपाही आके कहिस-" बाम्हन! तोला राजा ह अभीच्चे बलाइस हे।" अतका सुनके बाम्हन डर्रा गे अउ सोंचे लगिस-" बिन जाने समझे कोन गलती होगे भगवान! मोर सो राजा के काय काम।"
बाम्हन हा अइसने गुनत-गुनत राजा मेर हबर गइस। राजा ह ओला मया ले बइठारिस अउ भभर के कहिस-" बाम्हन! तोर इहां दू झन सुघ्घर-सुघ्घर जवान कुंवारी बेटी हे। एक ल मोर अउ
दूसर ल दीवान बर बिहा देते।"
बाम्हन हा अकबका के कहिस-" मोर इहां बेटीच नइंए महाराज।" बाम्हन अतके कहिस के राजा ओला लबारी बोलत हे, अपन बेटी ल लुकावत हे जान के धमकावत-डेरावत कहिस-"कौंहो अइसे नइं करबे तौ तोला ए राज ले बाहिर निकार देबो।"

डेर्राए हिरदे ले बाम्हन अपन ओसारी म अमाइस अउ दसे खटिया म गोड़ लगा के सोय लगिस। …………फ़ेर नींद कहां ले आवय। अइसनहे गुनत-गुनत बड़ बेर म सोइस। बड़ दुख वाले सुपना सपनाइस ओहर अउ भिनसारे उठके सब बात बम्हनिन ल बताइस। जउन डर बाम्हन ल रहिस तउने डर बम्हनिन ल घला होगे। ओ दिन भीख मांगे बर घलो नइं गइन।

मंझनिया सुरुज देवता तपत रहै। बाम्हन-बम्हनिन ओसारी म रहैं तभो ले उहां घाम हर पेल दे रहिस हे। उपर के छानी दोखहा घलाव ह सुरुज के घाम बर आये के दुवारी खोल दे रहिस हे। भूख लागिस
दूनों ल त सुरता आइस गड़ियाये बेल के। बेल ल निकार के जइसे बम्हनिन फ़ोड़े बर ठक-ठक करिस के बेल ह बोले लगिस-

"धीरे-धीरे फोड़बे दीदी;
झन हाथ टूटय झन गोड़।"

…………बेल ल हलुर-हलुर फोड़िन तौ दूनों ले राजा के बरनन करे अस दू झन सुघ्घर-मुघ्घर अपछरा निकरिस। दूनों के दुख तुरते अइसे भाग गे जइसे उनला कभु आयेच नइं रहिस हे।

राजा सो छोटे अपछरा तिलमति अउ दीवान सो बड़े अपछरा चांउरमति के बिहाव होगे। दूनों बहिनी म रानी तिलमति घात सुघ्घर रहिस हे। अउ अब तो राजा इहां हबर के सोन म महमई अस सुघ्घर
दिखत फभत रहिस। एक दिन दूनों बहिनी के कुआं तीर भेंट होगे। तिलमति गहना-गुरिया म लदे दुगुना चमकत रहिस। ओला देख के मने-मन म चांउरमति कलबलागे। अउ बाहिर ले हांसत मन म कपट
धरे ओहर कहिस-"तयं ह अपन गहना दे दे तो महूं ह पहिर के कुआं के पानी मा अपन परछाई देख के जीव ल जुड़ा लेतेंव,साध ल बुता लेतेंव। साफ़ हिरदे के तिलमति तुरते अपन गहना-गुरिया,ओढ़ना-उढ़ना निकार के चांउरमति ल दे दिस अउ चांउरमति के ल अपन पहिर लिस्। चांउरमति ल कुआं के पानी म अपन परछाई देख के तिलमति घलौक देखे बर बलाइस। ………अउ जइसे तिलमति झांकिस ओला चांउरमति हा ढकेल दिस। चांउरमति ह रानी तिलमति बनके राजा इहां चल दिस अउ चांउरमति के कुआं म गिर के मरे के बात सबो ल बताइस।

फेर सत हा सत रइथे और झूठ ह झूठ। झूठ के आधार लेके कोनो जादा दिन तक नईं टिक सकय। तिलमति कुआं म कमल फूल बनगे, दीवान ह ओला निकारे बर करय तौ ओहर तरीयवत जावय,
गहि-लियावत जावय। राजा ह जब ओला निकारे बर करिस तो ओहर चिरई बनके उड़ागे।
एक दिन संझा सुरुज के बूड़ती बेरा म सहिस के अंगना म लगे रुख के उप्पर ले चिरैया बोले लगिस-(सहिस ह भाखा ल चिन डरिस)
"अरे सहिस; अरे सहिस!
काय महारानी,
घोड़ा दाना खाइस!
हौ महारानी खाइस।
अरे सहिस; अरे सहिस!
काय महारानी!!
राज बियारी करिस!
हौ महारानी करिस!!
अरे सहिस; अरे सहिस!
काय महारानी!!
बाल गोरस पीइस!
हौ महारानी पीइस!!"

तिलमति डार-डार; चाउंरमति कोरा!
कइसे राजा भोरा भइस, डेढ़सास ल लेगे कोरा!!"

रोज्जे एही बेरा म एही किसम चिरैया अइसनहे बोलय्। दू-चार दिन अइसनहे सुने के पाछू सहिस राजा ल सबो बतादिस। राजा अपन दू-तीन सिपाही लेके चिरैया ल फंसाय के निच्चट तैयारी कर के,
जाली-उली लेके सहिस के घर आइस अउ जउन बेरा म चिरैया बोले के सुरुवात करिस ओला तुरते जाली म फंसा लिए गइस। चिरैया बोलिस-"राजा तंय मोला झन छू,झन हाथ लगा। तय ह मोर बड़े
बहिनी ल नइं चिन सके, तोर मती कहां चल दे रहिस। तंय मोला तभे छूबे जब दगा देवैया, कपट हिरदे रखैया मोर बहिनी ल कुआं पाट देबे। ……अउ तभे मंय अपन निचट रुप म तोर आघू आहूं।"
राजा राते-रात म अपन घर के कोला बारी डहर नवां कुआं खनवां डरिस अउ भिनसारे-भिनसारे जब चांउरमति उठिस तौ ओला नवा कुआं देखाये के ओढ़र कर के कुआं म ढकेल दिस अउ लउहा कुआं ले
निकरे माटी म कुआं ल पटवा देइस। कुआं ले निकरे माटी थोरके बेर नेक सुख भोग के तुरते फ़ेर कुआं म अइसनहे मिलगे जइसे चांउरमति ह थोरके बेर तक सुख कर पाइस।

राजा अउ तिलमति मिलगे;मोर कहानी पूरगे॥


3 टिप्पणी:

Sanjeeva Tiwari said...

वा भाई बने सुनायेस मोर छत्‍तीसगढ के लोककथा ल, बूढी दाई के कोरा हा सुरता आ गे, बहुत खजाना धरे हर गा । महीना मे एको ठन छत्‍तीसगढी कहनी पोस्‍ट कर दे कर हमार भाषा के कहानी चिटठाकार भाई मन ल धलोक सुनायेबर ।

Udan Tashtari said...

थोड़ी समझ आ गई. :)

Kumar Rahul said...

Your series on this topic is very good and appreciable. I lived in CG for two years, but couldn’t build the language to understand your whole story. But keep it up and continue. We need to give our present generation the ideas and stories our grandmothers told us in our times.

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अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।