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13 May 2010

बापीयॉटिक तो नहीं पर बापी के बहाने-4

गतांक बापीयॉटिक तो नहीं पर बापी के बहाने-3 से आगे

 बापी के गांव वाले घर में जाना कई मायनों में सुखद रहता है। घर के बड़े से आंगन में कबूतरों का निवास, इतने सारे कबूतर गूंटरगूं करते व दाना चुगते दिखते हैं कि पूछो ही मत। घर में गोबर गैस प्लांट। बापी से पूछा, क्यों लगातार गांव में रहना कैसा लग रहा है। उसने छूटते ही कहा "रायपुर तो एकदम कचरा हो गया है (उसके इस कथन ने निश्चित ही राजधानी का एहसास लिए  मुझ जैसे कई रायपुरवासियों को तमाचा जड़ा), लं* साला पूरे शहर की मां-बहन एक हो गई है राजनीति के कारण। इससे तो गांव में रहना वाकई बढ़िया है। "

कुछ हद तक बापी का कहना सही भी लगता है, रायपुर राजधानी है, ट्रैफिक से लेकर सफाई सब व्यवस्थाएं, अव्यवस्था का रुप ले चुकी है हावी है तो बस राजनीति ही। वहीं इसके आसपास के गांव पूरे तौर पर आधुनिक सुविधाओं से लैस होते जा रहे हैं। मोबाइल का तो यह आलम रहा कि बापी के गांव और फिर नवापारा राजिम तक जिस भी गांव से गुजरे तपती दुपहरिया में भी गांव के कई लड़के-लड़कियां दरवाजे के बाहर मोबाइल पर लगे नजर आए। कई घरों के खपरैल(छानही) के उपर डिश टीवी का एंटिना भी नजर आया।

सड़के आसपास के गांवों तक पहुंचती जा रही हैं। बापी के गांव कुछ साल बाद जाना हुआ था। जाते-जाते देखा बढ़िया चौड़ी सड़कें एक दूसरे को काट रही हैं। ख्याल आया कि यह नई राजधानी परिक्षेत्र में आता है इसलिए बन रही हैं यह फोरलेन सड़कें। बापी के गांव तक मुरुम रोड तैयार हो चुकी है, संभवत: बरसात आने से पूर्व डामरीकरण भी हो जाएगा। लेकिन नहीं दिखा तो बस इन नई सड़कों के आसपास वृक्षारोपण। बस मुरुम रोड पर कुछ दूर तक हुआ वृक्षारोपण दिखा बाकी कहीं नहीं। संभव है अगले चरण में हो बरसात आने से पहले।

हालांकि इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बीते कुछ सालों में राजनीति का भी एक ग्रामीणीकरण हुआ है। आधुनिकता के अन्य साधनों के साथ ही राजनीति भी गांवों की माटी में रच-बस गई है। इसका उदाहरण बीते दिनों पंचायत स्तरीय चुनावों के दौरान देखने मिला, जब पंच का चुनाव लड़ने वालों ने भी खूब पैसे बहाए, जनपद व जिला पंचायत वालों ने तो लुटाए। शराब तो जैसे बहा हो तब गांवों में। इस मुद्दे पर शहर और गांव में अंतर नहीं दिखा।



(कबूतरों का चित्र बीबीसी से साभार, मै जब बापी के गांव पहुंचा तो मेरा कैमरा वाला मोबाइल साथ नहीं था और न ही मेरे पास उस दिन इतना समय था कि तस्वीरें ले पाता भले ही मौके बहुत थे, अफसोस)


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आजाद चौक के ठिये के साथी मित्र सूर्यकांत सोनी उर्फ सूर्या ने पहली किश्त पर ईमेल के माध्यम से कमेंट किया था
 " hi sanju,
bhut khubh mere yaar,  chalo der se hi sahi aapke kalam se atit ke khubsurat yaaden ubhr kar aa hi gayi. tum is atit ke panne par kisi bhi prakar ki koi syahi girne mat dena, mujhe tumhare is lekh ki agli kadi ka intjaar rahega, shayd main tumhen nahi samjha sakta ki mere liye doston ke saath bitaye ek ek pal ki kya importent hai.main hamesh tum logo ke saath har pal ko jiya hun.our mujhe ye bhi yakin hai ki tum kya har koi is pal ko hamesha miss karoge."
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उनके आग्रह पर जारी रहेगा कथा क्रम।

6 टिप्पणी:

हिमान्शु मोहन said...

जारी रहेंगे, ये अच्छा करेंगे।

नरेश सोनी said...

बढ़िया है भाई।
एक बार फिर मजा आ गया।

Sarita Thakore said...

Hi, Sanjeet

Hope readers are taking note of issues being covered in this day to day affair.
It started with
Migration
Then Reverse Migration
Now it is Consumerism, Mobile is more easily accessible then electricity or water; widening of road and disappearance of tress; issues of development and Politics of Election which can't be ruled out.

Reason to point out is one should be really sensitive to all such things happening around oneself. Being sensitive really helps to understand things in larger perspective and guide oneself.

Keep Writing.

Sarita

सतीश पंचम said...

बापी ने मार्के की बात कही है कि पूरे शहर की मां बहन एक हो गई है। सात आठ साल पहले अपने ननिहाल रायपुर आया था तब एक तालाब को पटते देखा था....सुना है ( कुछ देखा भी है) कि रायपुर में बहुत तालाब होते थे।

अब क्या स्थिति है पता नहीं।

बापी की अगली कड़ी चालू ठेवा....

डॉ महेश सिन्हा said...

कोई बात कहीं खो गयी

Sanjeet Tripathi said...

सतीश जी, राजस्व रिकार्ड के मुताबिक रायपुर शहर में 184 तालाब। अस्तित्व में 134, 50 पट गए। पटने की कगार पर 30 हैं। तो यह हाल है बंधु। वैसे यह जानकर खुशी हुई कि आपका रिश्ता है रायपुर से।

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सरिता, चलिए देखते हैं कि आपके नजरिए से कितने लोग देखते हैं इस पोस्ट को
:)

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