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07 April 2010

अब क्या करे सरकार?..........दिवाकर मुक्तिबोध




नहीं, हरगिज नहीं। कोई किंतु-परंतु नहीं। चिंतलनार सामूहिक नरसंहार पर किसी को माफी नहीं दी जा सकती। न छत्तीसगढ़ सरकार को और न केंद्र सरकार को। करीब 6 माह पूर्व जब आपरेशन ग्रीन हंट की योजना बनी और राज्य सरकार के सहयोग से इस पर अमल शुरू हुआ तब क्या यह नहीं सोचा गया कि सुरक्षा कर्मियों की जान बेशकीमती है अत: उनकी सुरक्षा के भी माकूल प्रबंध किए जाने चाहिए? क्या यह नहीं सोचा गया कि नक्सली ईंट का जवाब पत्थर से दे सकते हैं। क्या इस बात पर विचार नहीं किया गया कि बस्तर और सरगुजा की भौगोलिक स्थिति मैदानी इलाकों के मुकाबले बहुत भिन्न है लिहाजा रणनीति इसी हिसाब से बननी चाहिए? क्या किसी ने ख्याल किया कि नक्सली बस्तर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं अत: वे बहुत आसानी से वारदात करके गायब हो सकते हैं? क्या इसमे शक की कोई गुंजाइश थी कि बारुदी सुरंग बिछाने में नक्सली दक्ष हैं तथा उन्होंने दंतेवाड़ा-बीजापुर और सुकमा के जंगली रास्तों में पहले से ही बारुदी सुरंगे बिछा रखी हैं। बीते 5 वर्षों में नक्सलियों ने बारुदी विस्फोट करके अनेक वाहन उड़ाए और सैकड़ों को खत्म किया, इसके बावजूद ग्रीन हंट आपरेशन के कर्ताधर्ताओं ने कोई सबक लिया? क्या छत्तीसगढ़ सरकार यह नहीं जानती कि नक्सली गुरिल्ला युद्ध निपुण हैं और घात लगाकर वह पहले भी अनेकों पुलिस जवानों को मार चुके हैं। सरकार की बहुत उम्मीदों के साथ पुलिस महानिदेशक की कुर्सी पर बैठे विश्वरंजन क्या इससे इंकार कर सकते हैं कि नक्सलियों का सूचना तंत्र और उनका स्थानीय नेतृत्व पुलिस के मुकाबले ज्यादा मजबूत है। क्या वे नहीं जानते कि दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा एवं बस्तर के अन्य गांवों के आदिवासियों के बीच नक्सली इस कदर रच बस गए हैं कि उसकी पहचान मुश्किल है। क्या डीजीपी यह दावा कर सकते हैं कि केन्द्रीय अद्र्घसैनिक बलों एवं स्थानीय पुलिस के बीच रणनीतिक तालमेल है? एक और सवाल- सलवा जुडूम जो क्रांतिकारी परिवर्तन का संकेत दे रहा था, को बीच मंझधार में क्यों छोड़ दिया गया। क्या इस बात से कोई इनकार कर सकता है कि सलवा जुडूम से बस्तर के नक्सली खौफजदा थे? अब आखिरी बात- आपरेशन ग्रीन हंट के कारण दबाव बढ़ा और नक्सली पीछे हटने लगे तो घावों पर मरहम लगाने की तर्ज पर नक्सली कमांडरों को बातचीत के लिए तैयार करने की कोशिशें क्यों नहीं की गई? क्या विशालकाय पुलिस तंत्र के पास एक भी ऐसा बंदा नहीं है जो शांति वार्ता के लिए माकूल वातावरण बना सके?


ये ढेर सारे सवाल नए नहीं हैं। बस्तर में माओवादियों ने जब-जब खून की होली खेली है और निरपराध आदिवासियों को मारा-काटा है, ये सवाल उठते रहे पर पुलिस अनसुनी बनी रही। आज सुबह इन सवालों ने पुन: फुफकार मारी जब सीआरपीएफ की लगभग एक समूची टुकड़ी को नक्सलियों ने अपनी परम्परागत रणनीति के तहत बारुदी सुरंग में फंसाकर उड़ा दिया। पूरे देश में नक्सली हमले की यह सबसे बड़ी घटना है। जो जवान विस्फोट में बच गए वे घने जंगल के बीच पहाडिय़ों पर छिपे नक्सलियों की गोली के शिकार हो गए। करीब 76 जवानों के मारे जाने एवं डेढ़ सौ के लापता होने की घटना ने छत्तीसगढ़ सरकार के साथ-साथ केन्द्र को भी हिलाकर रख दिया है। नक्सलियों द्वारा आपरेशन ग्रीन हंट का यह सबसे बड़ा जवाब है जबकि वे पिछले कुछ दिनों से लगातार घटनाएं करके अपने निर्मम लेकिन बुलंद इरादे जताते रहे हैं। पश्चिम बंगाल में लालगढ़ और उड़ीसा में मलकानगिरी इसके ताजा उदाहरण हैं।


आपरेशन ग्रीन हंट के जारी रहने एवं रेड अलर्ट के बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस जिस कदर गाफिल है, उसकी मिसाल चिंतलनार बारूदी विस्फोट में 76 जवानों की शहादत से मिलती है। यह आश्चर्यजनक है कि जिस मार्ग से केन्द्रीय रिजर्व पुलिस के जवान वाहनों पर सवार होकर 4 दिवसीय सर्च आपरेशन से लौट रहे थे, वहां बारुदी सुरंगें बिछा दी गई थी और किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई। करीब एक हजार नक्सली रातभर पहाडिय़ों पर मोर्चा लिए बैठे रहे पर पुलिस तक कोई सूचना नहीं पहुंची। इससे पता चलता है कि पुलिस का सूचना तंत्र कितना लचर है। या दूसरे अर्थों में कहें पुलिस उन आदिवासियों का विश्वास नहीं जीत पाई है जो हिंसा के खिलाफ हैं, नक्सलियों से आक्रांत हैं किंतु पुलिस से भी डरे हुए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई एक आदिवासी तो मिलता जो पुलिस के पास जरूरी सूचनाएं पहुंचाता।

चिंतलनार सुकमा की घटना इस बात का भी संकेत है कि जवान खुद अपनी सुरक्षा के प्रति सजग नहीं हैं अन्यथा बारुदी सुरंग के जाल में वे नहीं फंसते। मानपुर के जंगलों में पुलिस अधीक्षक वीके चौबे सहित दो दर्जन जवानों के मारे जाने की घटना ज्यादा पुरानी नहीं है। वह घटना भी लगभग इसी तर्ज पर घटित हुई थी और नक्सलियों ने उन्हें घेरकर मारा था। सडक़ें काटकर, बारुद बिछाकर शिकार करने की नक्सलियों की तकनीक इतनी जानी पहचानी है कि इसके जाल में फंसने की गुंजाइश रहनी ही नहीं चाहिए फिर भी इन घटनाओं का जारी रहना इस बात का संकेत है कि लापरवाही पर कोई लगाम नहीं कसी गई है।

माओवादियों के खिलाफ घोषित युद्घ ‘‘आपरेशन ग्रीन हंट’’ को जारी रखने पर कोई सवालिया निशान नहीं है। देश में नक्सलवाद जिस तेजी से अपने पांव पसार रहा है, उसे देखते हुए उसका जड़ से खात्मा जरूरी है क्योंकि कोई भी सभ्य समाज हिंसा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। छत्तीसगढ़ ने सबसे ज्यादा हिंसा देखी है और बर्दाश्त किया है किंतु अब और नहीं। नक्सलियों को उनके घर में घुसकर मारने की डीजीपी विश्वरंजन की दंभोक्ति की पोल खुल चुकी है। आपरेशन ग्रीन हंट छत्तीसगढ़ में कितना सफल है यह सुकमा घटना से ही जाहिर है। यदि आपरेशन में दमखम होता और युद्घचातुर्य होता तो 76 जवानों की जानें नहीं जाती। जाहिर है छत्तीसगढ़ पुलिस को आपरेशन पर नए सिरे से विचार करना होगा। आपरेशन और एरिया डेवलपमेंट दोनों साथ-साथ तो चल सकते हैं और यह आपरेशन की थीम भी हैपर इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि क्षेत्र का विकास होने पर नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। दरअसल इसका सफाया तब तक नहीं होगा जब तक कि आदिवासियों के मन से संशय और भय दूर नहीं होगा जो पुलिस, शासकीय अधिकारियों एवं उन जनप्रतिनिधियों को लेकर है जिन्होंने अतीत में उनके साथ बड़ा बुरा सलूक किया है, जुल्म ढाया है, शोषण किया है। नई पीढ़ी इसीलिए विद्रोही है और नक्सलियों को संरक्षण देती है।


दैनिक आज की जनधारा में 7 अप्रैल को प्रकाशित त्वरित टिप्पणी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार व रायपुर से प्रकाशित हिंदी दैनिक आज की जनधारा के संपादक हैं।

9 टिप्पणी:

Sonal Rastogi said...

विचारो का ये तूफ़ान शांत नहीं होना चाहिए, विचारोतेजक लेख

Anil Pusadkar said...

आभार संजीत. दिवाकर भैया को बहुत दिनों बाद पढने का मौका दिया आपने.दिवाकर भैया के कलम की ताकत तो सभी जानते हैं और इस समय तो उनकी बहुत ज्यादा ज़रुरत है.दिवाकर भैया को मैने ब्लाग लिखने के लिये तैयार कर लिया था लेकिन उस पर आगे कोई बात नही हुई.अब तुम उनके साथ हो तो उन्हे तैयार करने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है.ये ब्लाग जगत के लिये सौभग्य की बात होगी अगर वे यंहा लिखते हैं.उन्हे मेरा प्रणाम कहना.

अखिल कुमार said...

is chintneey vishy ko sarkaar itne halke dhang se kyon leti hai

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

दिवाकर जी ने वे सब बातें कह दी हैं जो मैं कहना चाहता था। मैं शायद इन्हें इस रूप में नहीं कह पाता। मुझे इस समस्या का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है। हालांकि चिंता उतनी ही है।
मुझे तो चिंता तब होती है जब यहाँ राजस्थान में कोई सिविल प्रशासन और न्यायप्रणाली से दुखी हो कर नक्सलियों की गतिविधियों को सही बताने लगता है।

anjeev pandey said...

संदीपजी,
पहले तो आपको धन्यवाद दे दूं कि आप इस प्रकार के लेख अपने ब्लाग पर लाते हैं। अब बात मुक्तिबोधजी के विचारों की। करीब डेढ़ साल बाद उन्हें पढ़ने का मौका मिला।
सोनल जी की टिप्पणी सही है- विचारो का ये तूफ़ान शांत नहीं होना चाहिए, विचारोतेजक लेख। मुझे भी यह लेख विचारोत्तेजक ही लगा इसलिए इस पर प्रतिक्रिया दे रहा हूं। किसी लेख का विचारोत्तेजक होना और उस विचार के धरातल से जुड़े होने में अंतर है। इस समय बस्तर के हालात पर विचारों में उत्तेजना की नहीं वरन जरूरत है संयम की। १६००० करोड़ रुपयों के रेड कारिडोर और युद्ध जैसे हालात, रणनीतिक चूक या फिर सुरक्षा बलों की लापरवाही, बहस लंबी खिंच सकती है। खोज और तर्कों के अलावा भी हैं पत्रकारिता के मायने। मैं तो सरकार को यही कहना चाहूंगा कि समय रहते इस समस्या पर काबू पा ले अन्यथा भविष्य में यह समस्या दिवाकरजी, संजीतजी, अनिलजी, सोनलजी और मुझे- यानी हम सबको नेस्तनाबूत कर देगी। रायपुर आउंगा तो दिवाकर सर से जरूर मिलूंगा।

anjeev pandey said...

संदीपजी,
पहले तो आपको धन्यवाद दे दूं कि आप इस प्रकार के लेख अपने ब्लाग पर लाते हैं। अब बात मुक्तिबोधजी के विचारों की। करीब डेढ़ साल बाद उन्हें पढ़ने का मौका मिला।
सोनल जी की टिप्पणी सही है- विचारो का ये तूफ़ान शांत नहीं होना चाहिए, विचारोतेजक लेख। मुझे भी यह लेख विचारोत्तेजक ही लगा इसलिए इस पर प्रतिक्रिया दे रहा हूं। किसी लेख का विचारोत्तेजक होना और उस विचार के धरातल से जुड़े होने में अंतर है। इस समय बस्तर के हालात पर विचारों में उत्तेजना की नहीं वरन जरूरत है संयम की। १६००० करोड़ रुपयों के रेड कारिडोर और युद्ध जैसे हालात, रणनीतिक चूक या फिर सुरक्षा बलों की लापरवाही, बहस लंबी खिंच सकती है। खोज और तर्कों के अलावा भी हैं पत्रकारिता के मायने। मैं तो सरकार को यही कहना चाहूंगा कि समय रहते इस समस्या पर काबू पा ले अन्यथा भविष्य में यह समस्या दिवाकरजी, संजीतजी, अनिलजी, सोनलजी और मुझे- यानी हम सबको नेस्तनाबूत कर देगी। रायपुर आउंगा तो दिवाकर सर से जरूर मिलूंगा।

ePandit said...

बहुत ही दुखद स्थिति है। एक तरफ तो बेचारे आदिवासी दुर्दशा में जी रहे हैं ऊपर से नक्सलियों का आतंक। नक्सलियों की ये रक्तपिपासा पता नहीं कितना खून पीकर शांत होगी। सरकार नक्सलियों के खिलाफ आधी-अधूरी इच्छा से कार्यवाही कर रही है। स्थानीय नेता नक्सलियों के प्रति नरम रुख अपनाते हैं। इस सारे ड्रामे में निरंतर जवानों और बेकसूर लोगों की बलि चढ़ रही है।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

सामरिक समाधान ही समाधान है। विकास का मलहम पेरेलल चले!

श्याम कोरी 'उदय' said...

...प्रभावशाली व सारगर्भित अभिव्यक्ति, प्रसंशनीय प्रस्तुति !!!

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आपकी राय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।