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04 April 2010

माओस्तान में अरुंधति का अवतार

(छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ के संपादकीय पेज पर रविवार को एक लेख छपा है। आवारा बंजारा ने उसे पढ़ा और फौरन अखबार के संपादक महोदय से इस लेख को अपने पाठकों के लिए अपने ब्लॉग पर डालने की इजाजत ली। सो पेश है वह लेख)

माओस्तान में अरुंधति का अवतार

हर राज्य क्रूर होने की क्षमता रखता है। हर राज्य संविधान के बताए मुताबिक सीमाएं तय करता है, और आप उन सीमाओं से बाहर जाएं, तो राज्यबल के साथ प्रतियिा करता है। प्रजातंत्र में भी, राज्य पर हमला हो तो राज्य इस तरह का बर्ताव करता है। अब्राहम लिंकन ने अमरीकी संघ को बचाने के लिए लड़ाई लड़ी। नोबल पुरस्कार लेते हुए अपने भाषण में बराक ओबामा ने नार्वे के लोगों को बतला दिया कि वह तख्ती लेकर चलने वाले शांति दूत नहीं हैं। राज्य अपने बल प्रयोग को यह कहकर सही ठहराता है कि उसे विद्रोहियों से पेश नुकसान से, निर्दोष लोगों को बचाना पड़ता है। विद्रोही दावा करते हैं कि वह तो केवल राज्य या उससे सहयोग करने वालों को ही निशाना बनाते हैं-नागरिकों को नहीं। भारत अनेक तरह की ताकतों वाले कई विद्रोही आंदोलनों से निपटा है। पंजाब में 'गोली का जवाब गोली' से देने की रानीति रही हो, या सशस्त्र सेना विशेष अधिकार विधेयक के जरिये उत्तर पूर्व में लगातार बनी हुई युध्द की स्थिति से। लेकिन माओवादी इन सबसे अनोखे हैं कम्युनिस्ट विद्रोह 1960 के दशक में नक्सलबारी से शुरू हुआ और उसी विचारधार में लिपटा हुए माओवादी उग्रवाद- एक खास नेतृत्व के लाल झंडे तले संघर्ष चला आ रहा है।


माओवादियों ने बहुतों को मारा, और उनसे भी ज्यादा को बरगलाया है। उनका ताज़ातरीन शिकार अरुंधति राय है जो अपनी साहित्यिक प्रतिभा का इस्तेमाल उनके घिसे-पिटे दावों को काव्यात्मक अलंकरण में लपेटकर पेश करने के लिए करती हैं। वह अपनी सत्ता की भूख की तुलना जंगल में रहने वाले लोगों की जायज मांगों, अधिकारों और चिंताओं से करती हैं। जार्ज बुश के 'हम और वह' कहने पर ऐतराज करने वाली वह खुद, अब यही भाषा बोल रही हैं। माओवादियों की बंधक बने बिना अरुंधति राय स्टाकहोम सिंड्रोम जैसे रोग का शिकार हो गई हैं (एक रोग जिसमें इंसान में खुद को बंधक बनाने वाले के लिए सहानुभूति पैदा हो जाती है) वह उनकी शर्तों पर उनके इलाकों में जाती है, और जैसा कि सुधन्वा देशपांडे ने कही। इसके बारे में लिखा है कि इस तरह के तौर-तरीकों को वह युध्द रिपोर्टिंग कहती है।


राय जांबांज पत्रकारिता के अनुभवों से गुजर रही है, जिसकी सारे रिपोर्टर हसरत रखते हैं। विद्रोहियों के साथ जंगल को रौंदना। लेकिन वास्तविक पत्रकार और रॉय के बीच फर्क यह है कि वह, उन्हें जो बताया जाता है उसका विश्वास कर लेती हैं, ज्यादा सवाल नहीं करतीं और क्रांतिकारियों के बारे में रूमानियत से सोचती हैं।

जबकि आल्म गुलिर्मोर्प्रिएतो जैसे लोग, द न्यूयार्क रिव्यू आफ बुक्स के शब्दों में, और उनके खुद के मुताबिक भी, हमें यह याद दिलाते हैं कि दुनिया कितनी जटिल है और किस तरह हर कहानी के कम से कम दो पहलू होते हैं। दंडकारण्य के जंगलों में (यह नाम रामायणा की कहानी की याद दिलाता है) राय की साहस यात्रा में अच्छा और बुरा है, जबकि गुलिर्मोर्प्रिएतो की मार्क्वेजी दुनिया में सिर्फ शैतान ही शैतान हैं, कोई देवदूत नहीं है।


यह सच है कि प्रजातंत्र का उल्लंघन किया जाता है,और राज्य जैसों की दया से उसमें लोगों को यह जानने का मौका भी मिलता है कि ज्यादातर लोगों के दुख-दर्दों की वजह क्या है। संविधान से दगा करने के लिए उनका भारत सरकार खिंचाई करना सही है, सरकार के दोगलेपन में हामी भरने से इंकार करना भी सही है, और मीडिया की मिलीभगत पर सवाल उठाना भी जायज है। लेकिन माओवादियों के इस दावे पर कि वह अगवा किए गए पुलिस वालों के साथ क्या करते हैं, किस तरह वह नागरिकों को बख्श देते हैं, किस तरह वह गाय तक को बख्श देते हैं और उन्हें हिन्दू मतों की भी परवाह है- हर बात पर वह आश्चर्यजनक तरीके से यकीन कर लेती है।


वह जंगल में रहने वालों की दुश्वारियों के बारे में बातें करते हुए इस नतीजे पर पहुंच जाती है कि उनके पास हिंसक होने के अलावा कोई चारा नहीं , उनमें हथियारों के लिए एक घिनौना लगाव नजर आता है। अनिर्बान गुप्ता निगम ने राय को kafila.org. वेबसाईट में दिए गए जोशीले जवाब में इसका ज़िक्र भी किया है। रॉय कामरेडों के बमों, मोर्टारों, एके-47 पर वारी जाती हैं, एक मुठभेड़ में तुरत-फुरत बनाए गए एक विस्फोटक से पुलिस जवानों की जीप उड़ाने के वीडियो से प्रभावित युवाओं की भावनाएं बखानते हुये तो उन्होंने हद पार कर दी है। बहुत से कामरेड बाल सिपाही जैसे हैं, लेकिन क्रांति में सब जायज है। वरिष्ठ कामरेड संघर्ष की कहानियां सुनाकर बच्चों को लगातार बरगलाते रहते हैं- सियरा लिओने में फोदे साखो का युनाईटेड फ्रंट उत्तरी युगान्डा में जोसेफ नोय लार्ड की प्रतिरोधी सेना, और तमिल ईलम में मुक्ति चीते। माओ के चीन में बच्चों ने अपने माता- पिता को छोड़ दिया। पोल पोट के कम्बोडिया में उन्होंने अपने बड़ों पर क्रूरता की, क्या रॉय यही सांस्कृतिक क्रांति चाहती हैं? क्या उन्होंने बच्चों को यह बताया कि भविष्य की तरफ लम्बी छलांग (माओ की आर्थिक क्रांति 'ग्रेट लीप फार्वर्ड') असल में क्या थी?

माओवाद के लिए मुग्धता नैतिक संवेदनशीलता से परे है। यह एक समानांतर दुनिया है जहां गांधी की तर्ज पर होती भूख हड़ताल पर लोग पेट पकड़कर हंसते हैं, जहां जंगल में औरतों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की तुलना शहर की औरतों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार से की जाती है। यह नैतिक समानता के पतन की नई ऊंचाई है। यह अनैतिक विनाशवाद है यह राय का हनोइ जेन पल भी है(हनोई जेन: वार सेक्स एंड फेंटेसीज ऑफ बिट्रेयल, जेरी लेम्बेक का उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि विख्यात भिनेत्री जेन फोंडा पर वियतनाम युध्द के दौरान तरह अमरीकी सैनिकों का मनोबल बल तोड़ने का आरोप लगता रहा है) वह एक विद्वान है जिसके लिये आकाश चादर है, तारे जिसके मार्गदर्शक हैं, पक्षियों का संगीत जिसकी अलार्म घड़ी है। वह इन तारों को अनोखे आकार में जोड़ती है। इस दुनिया में बच्चे स्कूल नहीं जाते, वह मुठभेड़ के वीडियो देखकर मारना सीखते हैं यहां आदिवासी और विद्रोहियों में कोई फर्क नहीं। जहां हाथ के एक इशारे से किए गए इंसाफ को ही सही मान लिया जाता है, क्योंकि दूसरी सारी बातें बेमानी हो चुकी हैं। यह माओस्तान है जहां लोग शायद ना वी भाषा (फिल्म अवतार के ग्रह की भाषा) बोलते हैं और राय उनकी अवतार है।

सलिल त्रिपाठी
(लेखक लंदन में रहते हैं। आप टिप्पणियां salil@livemint.com पर भी भेज सकते हैं।)
(रायपुर से प्रकाशित सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ से साभार)

7 टिप्पणी:

युवराज गजपाल said...

दुनिया को लोगो ने तरह - तरह से बाटा है । गरीबी, बेचारी, लाचारी और अत्याचार जैसे शब्दो को भी अरँन्धती जैसे लोगो ने विभाजित कर दिया है । सलिल जी का ये आलेख बौद्धिक नक्सल्वाद विचारधारा से ग्रसित लोगो के इस "वैचारिक- अलगाववाद" के षडयँत्र को उजागार करता है ।
सलिल और सँजीत जी दोनो को साधुवाद ।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

सलिल जी नें बहुत स्‍पष्‍ट विश्‍लेषण किया है, हकीकत तो हम छत्‍तीसगढिये जानते हैं.

इसे यहां प्रकाशित करने के लिए धन्‍यवाद.

श्याम कोरी 'उदय' said...

...सार्थक प्रस्तुति,आभार!!!

मुकुल वर्मा said...

गन्दा सच यह है की अरुंधती रॉय बकचोद हैं और उनकी सहानुभूति देश-विरोधी ताकतों से है. देश की प्रगतिशीलता उनसे हजम नहीं होती है. २६/११ हमलों को भी अरुंधती ने गुजरात और कश्मीर का फल बताया था. वैसे पांच-सितारा होटलों में खाने-पीने और बिज़नस क्लास की टिकेट पर विदेशों में जा कर भारत की बुराई करने में इन्हें कोई परहेज़ नहीं है. अगर उन्हें देश के शहरीकरण, उद्यमशीलता और सामाजिक चुनौतियों से इतनी दिक्कत है तो उन्हें चाहिए की वह क़तर या चीन की नागरिकता ले लें और वहीँ रहे और गरीबों/अल्पसंख्यकों की भलाई देश के राजनेताओं पर छोड़ दे. आप जानते ही होंगे की अरुंधती NDTV के प्रणय रॉय की रिश्ते की बहन हैं. ज़ाहिर है की दोनों भाई बहन झोला-छाप विचारधारा के दुकानदार हैं. एक तरह से देखा जाए तो वह लेफ्ट की भाषणपटु प्रवीण तोगडिया है - उनकी सामाजिक नासमझी और नैतिक दिवालियेपन की कसम खाने वालों में बुद्धिजीवी वर्ग, अप्रवासी भारतीय, और कुछ भटके हुए अल्पसंख्यक समूह सबसे आगे हैं.

शर्तिया वह एक बेहतरीन लेखिका हैं, लेकिन अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए उनका यह स्वयं-कृपालु और अतिश्योक्तिक परिप्रेक्ष्य शर्मनाक है. ऐसे में जब पत्रकारिता जगत और अन्य तकर्संगत लोग अरुंधती की आलोचना करें तो अचरज नहीं होना चाहिए.

(वैसे मैं इस प्रतीक्षा में हूँ की अब अजमल कसब के बचाव में अरुंधती रॉय का बयान कब आएगा. हमलों के दौरान अरुंधती के देश-प्रेम को अंतुले-जी के मतिभ्रम ने परास्त कर दिया था! )

Anil Pusadkar said...

ये पब्लिक है,सब जानती है.

Anil Pusadkar said...

संजीत आभार आपका और सलिल जी का भी जिन्होने बेबाक लिखा है।

ePandit said...

सालों पहले जब अरुंधति ने बुकर जीता था तो हमें उन पर गर्व हुआ था, आज हमें उन पर हमें शर्म आती है।

अरुंधति जैसे पाखण्डी लोग प्रसिद्धि पाने के लिये नकारात्मक तरीकों का सहारा लेते हैं। उनके कृत्य साफ तौर पर देशद्रोह सरीखे हैं फिर भी वे खुद को महान होने की गफलत पाले हैं तो उनकी बुद्धि पर तरस आता है।

साधुवाद इस बेहतरीन लेख के लिये।

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