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27 October 2010

छत्तीसगढ़ राज्योत्सव का मंच और "सलमानी" संस्कृति


छत्तीसगढ़ राज्य को अस्तित्व में आए आए 1 नवंबर को दस साल हो जाएंगे। दीपावली के कारण एक सप्ताह तक चलने वाला राज्योत्सव मंगलवार से शुरु हो गया। 
राज्य के कर्णधारों पर उस समय क्या गुजरी होगी जब उनके ही राज्य के राज्योत्सव के मंच से फिल्म अभिनेता सलमान खान ने मौजूद जनता को बताते हुए विडियोकॉन समूह के मालिक अनिरुद्ध धूत का विज्ञापन कर दिया कि ये हैं वीडियोकॉन समूह के मालिक अनिरुद्ध धूत और ये छत्तीसगढ़ में पावर प्लांट खोलने जा रहे हैं, इससे यहां बड़ी संख्या में नौकरी मिलेगी। इस तरह तो सलमान ने अंदर का सारा तिया-पांचा जनता के सामने उजागर कर दिया कि उन्हें यहां बुलाने के एवज में राज्य सरकार की तरफ से अनिरुद्ध धूत को क्या सहूलियतें मिली होंगी? क्योंकि इससे पहले शासन खुद यह कहता रहा है कि वीडियोकॉन समूह की पहल पर ही सलमान आ रहे हैं। 

सलमान आए और मंच पर दबंग फिल्म का मशहूर डॉयलॉग मारा कि "इतने छेद  कर देंगे कि समझ नहीं पाओगे सांस कहां से लें और …… कहां से"। क्या राज्य के कर्णधारों समेत संस्कृति के रखवाले राज्य के सबसे बड़े मंच से  बस यही डॉयलॉग सुनवाने लाए थे सलमान को? 

इस बात का जवाब कौन देगा कि सलमान ने महज पांच मिनट के लिए  शासन से कितने का भुगतान लिया? और अगर नहीं लिया, उनका भुगतान वीडियोकॉन समूह कर रहा है तो सरकार इस समूह को इसके एवज में क्या विशेष देने जा रही है। सीधी सी बात है कि वीडियोकॉन समूह या उसके मालिक अनिरुद्ध धूत कोई जनसेवा नहीं कर रहे हैं या उन्हें छत्तीसगढ़ की माटी इतनी वंदनीय नहीं लगती कि वे सलमान को यहां ले आएं और बदले में सरकार से कुछ न लें। सरकार से लेकर शासन के प्रतिनिधियों को इस बात का जवाब देना चाहिए। 

दूसरी बात यह कि बात-बात में छत्तीसगढ़िया संस्कृति का दंभ भरने वाले  और मंच से सलमान के मुंह से "छत्तीसगढ़िया, सबले बढ़िया" का नारा बुलवाने वाले सरकार के कर्णधारों व संस्कृति के पहरुओं को अब यह दंभ भरना छोड़ देना चाहिए। उनके सामने ही राज्योत्सव के मंच पर सयाली भगत का जो अशालीन नृत्य चल रहा था उसे देखते हुए उन्हें यह  महसूस जरूर हुआ होगा कि वे रायपुर के मंच पर नहीं बल्कि मुंबई के किसी फिल्मी मंच पर कार्यक्रम देख रहे हैं जहां शरीर दिखाऊ वस्त्रों में सजी बाला " सारे हसीं, अहा नाचे-नाचे" से लेकर "हरि ओम हरि" और "लैला ओ लैला" जैसे गानों पर नाच रही थी और  'छत्तीसगढ़' की निराली संस्कृति के पहरूए मूकदर्शक बने तालियां पीट-पीटकर उसकी हौसला आफजाई कर रहे थे। 


(मूलतः अपने अख़बार के तात्कालिक टिप्पणी के लिए लिखा गया )

25 टिप्पणी:

डॉ महेश सिन्हा said...

शर्म अब आती किसे है। सलमान अँड कम्पनी को बुला कर आयोजंकर्ताओ ने अपनी सोच का इजहार कर दिया है।

pinky said...

Rajyotsva mein kya dikhaya jaye, yeh kaun tay karta hai? Rajya ne dus saalon mein kya paya, kya khoya, rajya ke navyuvak kis haal mein hain; college pe college khule jaa rahe hain kabhi kisi ne dekha nahi ki wahan padhne wale bachchon mein apne rajya ke kitne bachche hain, baaki jagahon se fees kam hone ke naate dusre yahan aakar padh rahe hai, aur rajya ke bachche vanchit rah jaate hain, to dusri taraf sadke ubad khabad, hawa dushit, naliya bhari hui, yeh to shahar ka haal hain, udhar gaon mein paristithi kya hai, bijli paida karne wale rajye ke hi gaon mein bijli nahi hai... Kabhi lagta hai logon ko dikhai nahi deta ya samajhna band kar diya hai, aur phir aise rajyotsva mein filmy glamour dikha kar kya disha tay karna chahti hai...yeh sawaal sabhi ke liye hai khudke antarmann ko tatolne ke liye.

Awasthi.S said...

Nice and true post....

अजित वडनेरकर said...

भाई, आप क्यों सवाल खड़े करते हो? अब हर तरह के कार्यक्रमों की शोभा फिल्मी आइटम्स से ही बनती है। अधकचरे राजनेताओं के लिए संस्कृति का अर्थ ही फूहड़ता है। दो टके की कॉलेज राजनीति से सत्ता पानेवाले चवन्नी छाप नेताओं के लिए राष्ट्रीय या प्रदेश की गरिमा बढ़ानेवाले संस्कृतिकर्म का अर्थ ही महाविद्यालय स्तर के वार्षिकोत्सव जैसे आयोजन करना रह गया है। वही उन्होंने सीखा और वही उन्हें आता है।

राज भाटिय़ा said...

यह सलमान वोही हे ना जिस ने बेजुबान हिरनो का शिकार किया, फटरी पर सोये ल्गो को शराब के नशे मै मार दिया, भारत मै पहले ही पुलिस दबंग हे, इस की ब्फ़िल्म देख कर क्या वो सुधरेगी?लेकिन गुंडे नेतओ को तो यही भांड अच्छॆ लगते हे, इस की जगह किसी फ़ोजी को बुलाते जो सीमा पर हम सब के लिये गोलिया झेलते हे, किसी ईमान दार पुलिस वाले को बुलाते बच्चे उन से कुछ सीखते, दबंग देख कर आप के बच्चे क्या सीखॆगे???? लानत हे इन सब पर

Triambak Sharma said...

bhaut sahi likha hai..lekin aapne munni badnaam hui...wale gane ka jikra nahi kia..
ise is tarah bhi likha ja sakta hai..
SARKAAR BADNAAM HUI..SALMAAN TERE LIYE..
SANSKRITI BADNAAM HUI..VIDEOCON TERE LIYE..
POWER PLANT LAGEGA..JANTA TERE LIYE.

rashmi ravija said...

तस्वीरें देख कर तो ऐसा लगा...कि आपने रिपोर्ट लिख डाली है..
पर शुक्र है...कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही सब स्पष्ट हो गया.
और 100% सलमान को भुगतान किया गया होगा. ये एक्टर्स यूँ ही मुंबई में कहीं नहीं जाते...इतनी दूर छत्तीसगढ़ जाएंगे???

विनीत कुमार said...

अजीतजी की शुरुआती लाइनों से मैं पूरी तरह सहमत हूं। सही बात है कि जो कॉलेज के दिनों में पैसे उगाही के लिए वार्षिकोत्सव कराते आए,उनके लिए संस्कृति की समझ वही है जो वो राज्योत्सव के तौर पर पेश करते हैं। लेकिन इसके साथ ही एक जरुरी सवाल है कि हर जगह वॉवीवुड के साथ सांठ-गांठ किस मासिकता की ओर इशारा करता है,इस पर गंभीरता से विचार किा जाना चाहिए। लोग जब ये कहते हैं कि यहां सारी चीजें राजनीति से तय होती है तो यही बात मुझे गले में अटकती नजर आती है। असल बाक है,सारी चीजें पॉपुलरिटी से तय होती है,आप ऐसा क्या कर दें कि पॉपुलर हो जाएं,चर्चा में बन जाएं,मीडिया कवरेज मिल जाए। इसके लिए जरुरी है कि ऐसे शख्स का दान थामा जाए जो कि ये एलीमेंट पैदा कर सकता है और जाहिर तौर पर वॉलीवुड के लोगों को लाने का यही फार्मूला काम करता है। एक वो दौर था जब सारी पार्टियां चुनावी रैलियों में सिने सितारों को जुटाते थे। लेकिन इस पॉपुलरिटी का आप क्या करेंगे,इसा आउटपुट क्या होगा,इस पर बात करने की जहमत नहीं उठाते.

girish pankaj said...

isi tarh kalekhn sarthak lekhan kahalata hai. badhai. kal maine bhi ek tippani likhi thee. aaj ise post kar raha hoo. dekhana

'उदय' said...

... ab kyaa kahen ( meraa bolanaa uchit nahee hai isliye ... ) !!!

kewal krishna said...

मेरे दिल की बात आपकी कलम से पढ़कर अच्छा लगा।

kewal krishna said...
This comment has been removed by the author.
kewal krishna said...

मेरे दिल की बात आपकी कलम से पढ़कर अच्छा लगा।

भुवनेश शर्मा said...

जब सारा देश दबंग के नशे में डूबा हो तो उसे भुना लेने से समझदार लोग काहे चूकें....बकिया जनता तो है ही तमाशबीन :)

Neeraj नीरज نیرج said...

हम यहां दिल्ली में मरे जाते हैं कि माटी के कोई कलाकार दिख जाए। चंदैनी-गोंदा, कारी, मोर भुइयां, चरणदास जैसे उत्कृष्ट कार्यक्रमों का मंचन हो जाए। वहां रायपुर में मुंबइया तमाशा दिखाया जा रहा है। सरकारी खर्चों पर इस तरह का आयोजन ठीक मालूम नहीं पड़ता। अलबत्ता सलमान क्राउड पुलर है सो कंपनियां उसे क्यों ना बुलाएं। रायपुरिया भी मौज-मस्ती का हक़दार है। फोकट में मिल जाए तो क्या बुरा।

shekhar said...

कुछ नही भैया ये सब मार्केटिंग का जमाना है ,, कौन अपने प्रोडक्ट को कितनी achhi तरह से प्रस्तुत कर सकता है ये उसी का उदहारण है.......सलमान का आना , सलमान अपने फीस लेकर vidiocon की modelling कर रहा था..जिस से videocon की ब्रांड image बन जाए ....सरकारी loogoo को कमाई करने का मौका मिल जाए...और जनता का ध्यान अपनी बुनियादी जरूरतों से कूछ समय के लिए हट जाए..

प्रवीण पाण्डेय said...

ऊपर के लोगों का खेल,
उससे राजनीति का मेल,
और उस पर से फिल्मी ठेल,
क्यों न जनता कहे अझेल।

amar jeet said...

सबसे बुरा तब लगा जब तीन तीन राज्यों के मुख्यमंत्री व छत्तीसगढ़ राज्य के राज्यपाल लाइन लगाकर एक ऐसे व्यक्ति का सम्मान कर रहे थे जोकि कलाकार होने के साथ अपराधी भी है! काले हिरन का शिकार, फुटपाथ पर शोये निर्दोष गरीबो पर शराब पीकर गाडी चलाने से लेकर पाकिस्तान में कसाब को लेकर भारत विरोधी बयान ऐसे देशद्रोही के लिए छत्तीसगढ़ के निर्दोष लोगो पर लाठी चलाना वो भी ऐसे पुलिस अधिकारी के निर्देश पर जिसे सलमान ने अपना पुराना दोस्त कह दिया !शर्मनाक है ...............

सुनीता शानू said...

मै भी अक्सर यही सोचती हूँ कि आजकल सबको हो क्या रहा है भाषा में इतनी अश्लीलता, फ़ूहड़ता, नंगापन आ कैसे गया। हर बार तर्क यही होता है कि दुनिया इसे पसंद करती है परन्तु ऎसा नही है। मै जब अपने बच्चों से यही प्रश्न करती हूँकि क्या तुम यह सब पसंद करते हो वह आजकल के मॉर्डन खयाल के बच्चे है शायद करते हो परन्तु बच्चे एक ही बात कह कर बच्चे चुप कर देते हैं कि आप ऎसा सोच ही कैसे सकती हैं। हम देखते है सुनते हैं समझते हैं मगर क्या कभी ऎसा बोलते हैं या गुनगुनाते सुना है आपने? सच मानिये आपके और हमारे बीच ऎसे और बहुत लोग हैं जो चनों के साथ घुण की तरह पिस रहे हैं बस। किन्तु यह सौभाग्य है हमारा कि हम पर या हमारे बच्चों पर ऎसी वाहियात बातों का अब असर नही होता।

Anonymous said...

Mera to yahi kahna hai is baare me ki .(salman khan ji ab kabhi nahi aayenge chhattisgarh) aisa mujhe lagta hai ....:)

Neeraj नीरज نیرج said...

आज अख़बार में पढ़ा कि एक व्यक्ति सलमान के शो के दौरान करंट खाकर मर गया। भीड़ मस्ती में थी.. शो खत्म होने के बाद लाश देखी गई।

ali said...

कोई शक़ नहीं कि उसे लाने वाले बन्दों के अपने स्वार्थ रहे होंगे ! कौन है वे लोग जिन्होने ये तय किया कि सलमान खान राज्योत्सव का 'आइकन चेहरा' बन सकता है ?
अगर उसे राज्य शासन के द्वारा प्रायोजित किया गया तो फिर ये पैसा मेहनतकश जनता के 'खीसे' का था और अगर किसी उद्योग समूह ने तो फिर विश्वास कीजिये कि आज से आगे भी जनता को 'दुहने' की तैयारी है !
क्या उत्सव के आयोजन के लिये कोई मानदंड भी तय किये गये थे ? यहां पर पहला सवाल , भिन्न मामलों के आरोपी अभिनेता सलमान खान के आने का नहीं है ! उसे तो बुलाया गया था बाकायदा भुगतान की एवज में जोकि उसका पेशा है ! पर...ये सब किया किसने ? और किस कीमत पर ?

ali said...

कोई शक़ नहीं कि उसे लाने वाले बन्दों के अपने स्वार्थ रहे होंगे ! कौन है वे लोग जिन्होने ये तय किया कि सलमान खान राज्योत्सव का 'आइकन चेहरा' बन सकता है ?
अगर उसे राज्य शासन के द्वारा प्रायोजित किया गया तो फिर ये पैसा मेहनतकश जनता के 'खीसे' का था और अगर किसी उद्योग समूह ने तो फिर विश्वास कीजिये कि आज से आगे भी जनता को 'दुहने' की तैयारी है !
क्या उत्सव के आयोजन के लिये कोई मानदंड भी तय किये गये थे ? यहां पर पहला सवाल , भिन्न मामलों के आरोपी अभिनेता सलमान खान के आने का नहीं है ! उसे तो बुलाया गया था बाकायदा भुगतान की एवज में जोकि उसका पेशा है ! पर...ये सब किया किसने ? और किस कीमत पर ?

Anonymous said...

(Bhaskar font mai likha hai, chankya mai convert hoga)

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Sanjeet Tripathi said...

दैनिक भास्कर रायपुर में कार्यरत पत्रकार साथी गोविंद पटेल ने भास्कर फोंट में जो कमेंट किया वह यूनिकोड में परिवर्तन करने के बाद यह रहा।


“ राज्योत्सव में सलमान के लिए सरकार ने लोगों को बांट दिया। एक वीआईपी खेमा और दूसरा भेड़-बकरियां। वीआईपी लोगों को सलमान खान को नजदीक से देखने का पास दिया गया। जबकि आम लोगों के लिए भीड़, धक्का-मुक्की, लाठियां, धूल, गंदगी और करंट का इंतजाम किया गया। मुझे अपने प्रदेश के कर्णधारों पर शर्म आती है, जो गांधी जी के उन वाक्यों को याद करके योजना बनाने का दावा करते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी योजना की सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के अंतिम व्यक्ति को उसका कितना फायदा मिला। हमारे कर्णधार राज्योत्सव का आयोजन अंतिम व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि प्रथम पंक्ति के वीआईपी लोगों के लिए करते हैं”।

गोविंद

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