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25 October 2010

क्या छत्तीसगढ़ की संस्कृति 'मोगली' है?


0 आदिवासियों को मुंह चिढ़ाने की कोशिश
0 आदिवासियों के बीच मुख्यमंत्री की छवि खराब करने की कोशिश




 राज्योत्सव में पत्रकारिता के क्षेत्र में दिए जाने वाले सम्मान को लेकर जमकर बवाल  मचने वाला है। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह से नाराज चल रहे ज्यूरी के एक सदस्य ने मुख्यमंत्री पर ऐसा निशाना साधा है कि आदिवासियों के बीच उनकी लोकप्रियता खटाई में पड़ सकती है।  इस बार राज्योत्सव में छत्तीसगढ़ की संस्कृति को ' मोगली' करार दे दिया गया है।

दरअसल राज्योत्सव के मौके पर  हर साल प्रविष्टियां बुलाईं जाती हैं। हर साल की तरह इस वर्ष भी  प्रविष्टियां बुलाई गईं थीं।  उसमें ' छत्तीसगढ़ के मोगली' को चयनित किया गया है। जबकि यह प्रविष्टि इस वर्ग में शामिल ही नहीं की जा सकती। चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता सम्मान के लिए छत्तीसगढ़ की संस्कृति पर अथवा किसी गंभीर विषय पर प्रविष्टि किए जाने की अर्हता रखी गई थी। जनसंपर्क संचालनायल ने इसके लिए बकायदा इश्तेहार  जारी कर प्रविष्टियां आमंत्रित की थी। इन इश्तेहार में विषयों की पूरी जानकारी भी  जारी कर दी गई थी।  इसके बावजूद ज्यूरी के सदस्यों ने बिना गंभीरता का परिचय दिए उस रिपोर्ट को चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता सम्मान के लिए चयनित कर दिया जो उस सम्मान के लिए अर्हता ही नहीं रखती। 'मोगली' न तो छत्तीसगढ़ की संस्कृति में शामिल है न ही कला में। इतनी बात ज्यूरी के सदस्यों को समझ में नहीं आई, उन्हें तो मुख्यमंत्री को घेरने के लिए नया हथियार नजर आ रहा था।  दिलचस्प बात यह है कि जनसंपर्क विभाग के अफसरों ने भी चंदूलाल चंद्राकर स्मृति  पुरुस्कार के लिए चयनित विषय को लेकर किसी भी तरह की आपत्ति इस बैठक में दर्ज नहीं कराई।  इस पुरुस्कार के लिए  जो अर्हता रखी गई है वह अर्हता कोई खबर पूरी करती है या नहीं , इस ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं दिया गया। ज्यूरी का एक सदस्य तमाम सदस्यों पर भारी पड़ा और उसने मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह  को बदनाम करने की साजिश को अंजाम दे दिया।  छत्तीसगढ़ की संस्कृति के कई जानकारों से इस बारे में बात की गई तो किसी ने भी इस बात को प्रमाणित नहीं किया कि ' मोगली' छत्तीसगढ़ की संस्कृति या कला में शुमार हो सकता है, अलबत्ता संस्कृति के जानकारों ने इसे एक बेहतर मनोरंजक खबर बताया। हालांकि ज्यूरी की बैठक हो चुकी है और उसने अपना निर्णय बंद लिफाफे में शासन को सौंप दिया है। अब छत्तीसगढ़ की इस 'मोगली संस्कृति' पर शासन की मुहर लगने वाली है। संस्कृति के जानकारों की मानें तो  छत्तीसगढ़ में निवासरत आदिवासी, अनुसूचित जाति व जनजाति समेत पिछड़ा वर्ग यहां तक कि सामान्य वर्ग की संस्कृति न तो कभी ' मोगली' की तरह रही है,  न ही इन वर्गों में मोगली छाप परंपराएं प्रचलित रही हैं। 

ऐसे में एक बड़े वर्ग को मोगली करार देकर बदनाम किया जाना न केवल चंदूलाल चंद्राकर पत्रकारिता सम्मान के साथ न्याय होगा और न ही छत्तीसगढ़ की अनूठी संस्कृति के साथ सम्मान्। फिलहाल  संस्कृति प्रेमियों को उम्मीद है कि नई ज्यूरी का गठन कर राज्य सरकार नए सिरे से चंदूलाल चंद्राकर  स्मृति पत्रकारिता सम्मान
की पड़ताल करेगी। ताकि किसी वर्ग विशेष  के खिलाफ रची गई साजिश को कामयाबी न मिल पाए।

11 टिप्पणी:

'उदय' said...

... वाह भई वाह मानना पडेगा ... क्या यहां भी घपलेवाजी की संभावना परिलक्षित हो रही है ? ... ये मोगली संस्कृति क्या है ? ... क्या कोई काम ईमानदारी व पारदर्शिता से से छत्तीसगढ में संभव नहीं है ? ... सब को मिलकर कोशिश करनी चाहिये कि राज्योत्सव कार्यक्रम साफ़-सुथरे ढंग से संपन्न हो ... निर्विवाद रहे !!!

प्रवीण पाण्डेय said...

मोगली एक नयी कृति है उससे एक पूरी संस्कृति परिभाषित कर देना उचित नहीं।

खबरों की दुनियाँ said...

एक अच्छे मुद्दे पर अच्छी रपट । संजीत , छत्तीसगढ़ की संस्कृति को दिखाने का ठेका जब तक गैर या ऐसे ही नकली छत्तीसगढ़िया लोगों की गिरफ़्त में रहेगा यही होगा । छत्तीसगढ़िया संस्कृति की ऐसी-तैसी कर रहे हैं यहाँ छत्तीसगढ़ी फ़िल्म बनाने वाले भी और हम छत्तीसगढ़िया लोग हमारा प्रदेश शासन मुक दर्शक बना बैठा है ,क्यों ? क्यों कि यह सही मायने में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करने वालों का शासन है ही नहीं , यह तो विशुद्ध रूप से बनियों का , बनियों के लिए बनियों के द्वारा किया गया प्रमाणिक शासन है । फ़िर इनसे हम अपनी संस्कृति की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं ? अब हमारी एक ही संस्कृति है इसकी-उसकी चाहे जिसकी भी जमीन बेच दो , कॉम्प्लेक्स बनाओ , मल्टीप्लेक्स बनाओ, मॉल बनाओ, सरकारी बंगलों की रजिस्ट्री करवा लो । दमदार हो तो अतिक्रमण करो - दादागिरी करो , यही है हमारे राज्य की संस्कृति । जिसे बोलने-बताने तक की हिम्मत नहीं है किसी छत्तीसगढ़िया में । सब केवल और केवल चापलूसी में व्यस्त हैं - मस्त हैं

Anonymous said...

अभी यह समझना बचा हुआ है कि यह अवार्ड है, सम्मान है, पुरस्कार है, फेलोशीप है. मुझे पहले पुरस्कार (जिसे फेलोशीप कहा गया था) का किस्सा याद आता है, जब लगभग आधी रात को जनसंपर्क के कुछ अधिकारी मुझ से मुखातिब थे और एन राम समेत दूसरे पत्रकारों का जीवन परिचय मुझसे पूछ कर अपनी डायरी में लिखते जा रहे थे. कारण तो बाद में मुझे पता चला जब इन पत्रकारों को चंदूलाल चंद्राकर.... की कथित जूरी में शामिल बता कर खबर छपी और साथ ही इस अवार्ड/सम्मान/पुरस्कार/फेलोशीप के विजेता का नाम भी सामने आया.
आप चाहें तो इसे रमन की जोगी संस्कृति कह सकते हैं.

आलोक

edharhai said...

beda gark hai.....jaise patrkar....waise adhikari....

राज भाटिय़ा said...

क्या हे कि सभी अपनी रोटिया सेकने मै लगे हे, देश ओर संस्कृति जाये भाड मे इस से किसी को मतलब नही ओर यह सिर्फ़ छत्तीसगढ मै नही पुरे भारत मे हो रहा हे, धन्यवाद इस सुंदर लेख के लिये

altafhusainjouhary said...

janab....aaj jab aankh me ungly gayi tab maloom ho raha hai ki ahamare chhattisgarh shasan me kya ho raha hai ye hame to us vaqt maloom ho gaya tha jab urdu ka milne vala haji hasan samman jo ki urdu ki seva karne vale shayar ko milna chahiye tha....90 varshiy shayar marhoom sulemaan irani jo mere babu g the unhe balaye tak me rakh kar unse kai aayu me chhote shayron ko jo urdu ka imla nahi jante the unhe diya gaya..aur to aur..jab is baare me charcha ki gayi to logon ne kaha ki bhai g ye jayada partibha shaali the isliye inhe ye samman mil gaya ..aur aaj bhi iske pichhe lamba khel khela ja raha hai juyuri ke sadasy bakayda len den kar rahe hai aur samman paa rahe hai aap...bhi agar partibha shaali hai to jyuri ke sadasyon ko patao aur samman hasil kar lo....mogli sanskiriti..ka koi haal poochhne vala nahi ...isliyedindhora pitne ke bajaye..partibha shaali bane..aur khamosh khel dekhte rahe... nahi to chillane vale ko log bhala kam bura jyada kahte hai..sorry mai agar jyada bol diya hoo to kyu ki mai bhugatmaan hoo isliye dil i bhadas nikal liya ...aage aap ki marzi....

shekhar said...

bhai in loogoo ko Rudyard kipling ki Jungle book padhne de dena chahiye.kyu ki ..in ka general knowledge kamjoor hai...varna ye aisyi galgi nehi karte..

Rahul Singh said...

आपने भी फिलहाल तथ्‍यों का अपना लिफाफा बंद ही रखा है, इसलिए पूरी बात संदर्भ सहित आने पर ही ठीक पता लग सकेगा.

Anonymous said...

मोगली का सच आज साहित्य शिल्पी पर आया है- http://sahityashilpi.blogspot.com/2010/10/blog-post_28.html

Sanjeet Tripathi said...

बेनामी साहब, इतनी सी बात कहने के लिए आपको बेनामी बनने की जरुरत क्यों पड़ गई। वहां मेरा कमेंट मौजूद है पहले ही, जरा उसे भी देख लेते बंधु।

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