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22 January 2010

सोच और उसके होने के बीच के लोचे

पता नईं क्यों अक्सर ऐसा होता है कि हम जो पहले से तय करते हैं, उसमें लोचे आ ही जाते हैं। दरअसल सोमवार से यह तय कर के बैठा था कि इस शुक्रवार यानी कि आज अपन अपना साप्ताहिक अवकाश होने की वजह से आराम से बैठेंगे और शब्दों का सफर में चंदू भाई के आत्मकथ्य को पढ़ेंगे।

सुबह हुई जैसा कि साप्ताहिक अवकाश के दिनों में होती है, देर से। एक पंडित जी का फोन आ गया कि भाई संजीत कुछ कुंडलियां बनानी है आज ही। अपन ने कहा अपनी छुट्टी है तो जरुर बना देंगे, आप शाम को 6 बजे कलेक्ट कर लीजिएगा चारों कुंडली। उनसे बात हुई फिर अपन अपना हुलिया सुधरवाने नाई के यहां पहुंचे दुपहरी के 12 बजे।

वहां बैठे रहे इत्ते में प्रधान संपादक जी का फोन आया कि उनकी तबियत खराब है और शनिवार को उनका साप्ताहिक कालम छपना है इसलिए उन्होंने मुझे याद किया कि वे डिक्टेट करवा देंगे और मै लिखता जाउंगा। सो उधर पहुंचा। सुना, लिखा और फिर उस लिखे हुए को दफ्तर छोड़ा। घर आते बज गए 3:30 खाना खा के कुंडली निकालने बैठा तो प्रिंटर महोदय ने धोखा देना शुरु किया। एक पन्ना निकले दूसरा अटक जाए, फिर एक निकले फिर एक अटक जाए। जैसे तैसे एक कुंडली निकली डेढ़ घंटे में। मन हो रहा था कि प्रिंटर को उठाऊं और कर दूं काम तमाम फिर ख्याल आया नई भाया जैसे भी हो काम तो चल रहा है। जब तक या तो नया नई लाना है या इसे ही रिपेयर नहीं करवाना है तब तक इसे ही नमस्कार कहते हुए काम चलाना है।

सो पंडित जी पहुंचे कुंडली लेने, उनसे क्षमायाचना करते हुए अपनी फीस वसूली अपन ने। ;)
सो बीत गया ऐसे ही यह दिन, अब शाम को साढ़े छह बजे यह पोस्ट लिख रहे हैं कि कम से कम दिनचर्या ही लिख डालें।

वैसे इतने बड़े दिन छुट्टी मनाना भी अजीब लग रहा है, बड़ा दिन से आशय यह कि आज केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम समेत उड़ीसा के मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री पाटिल व कुछ राज्यों के डीजीपी यहां नक्सल ऑपरेशन पर चर्चा करने पहुंचे थे। चलिए देखते हैं कि इनकी इस बैठक का आगे क्या नतीजा निकलता है और नक्सल समस्या की दशा और दिशा क्या तय होती है।

अपन जाते हैं जरा शाम को अपना शहर देख आते हैं, कम ही मौका मिलता है शाम में शहर में मटरगश्ती करने का, नहीं तो हर शाम दफ्तर में ही बीतती है वहां से निकलने पर रात आधी हो चुकी होती है।

सो अपन चले, मिलते हैं फिर…

6 टिप्पणी:

Rajey Sha said...

कम ही मौका मिलता है शाम में शहर में मटरगश्ती करने का....

जब भी कुछ लोचा हो ये कि‍या जाना चाहि‍ये।

ललित शर्मा said...

चलिए इस तरह आज के दिन का समापन हुआ।

डॉ महेश सिन्हा said...

मिलते हैं इतवार को

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

maine kal hui bloggers meeting kee charcha apne blog par kee hai... kripya aa kar kuchh sudhaar karein...

http://ab8oct.blogspot.com/

अभिषेक प्रसाद 'अवि' said...

maine kal hui bloggers meeting kee charcha apne blog par kee hai... kripya aa kar kuchh sudhaar karein...

http://ab8oct.blogspot.com/

anitakumar said...

्दिनचर्या अच्छी रही

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शुक्रिया ।