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26 December 2010

चिपलूनकर जी ने कहा था…


शीर्षक पढ़कर चौंका न जाए। ब्लॉगजगत के एंग्री यंगमैन सुरेश चिपलूनकर जी ने ऐसा वैसा कुछ नहीं कहा था। उन्होंने 10 अक्टूबर को राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन व कार्यशाला में हमारे समूह के प्रतिनिधि के रुप में जो कहा वही यहां पेश किया जा रहा है।  सवाल इतनी देर का है तो बात यह है कि चिपलूनकर जी ने  यह मुझे ईमेल कर दिया था 20 नवंबर को, लेकिन आवारा बंजारा अपनी आलसी फितरत  के चलते इसे आज ब्लॉग पर डाल रहा है। तो पढ़ा जाए कि चिपलूनकर जी ने क्या कहा था।

वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन में हमारे समूह की ओर से पढ़ा गया लेख…
Vardha Bloggers Meeting Hindi University

      वर्धा का ब्लॉगर सम्मेलन समाप्त हुए काफ़ी समय बीत गया, वहाँ की खुशनुमा यादें हमेशा ताज़ा रहेंगी। यह सम्मेलन हिन्दी ब्लॉगिंग में नैतिकता और आचार संहिता पर फ़ोकस लिये था (जिसमें किसी आचार संहिता लागू करने के बारे में सभी ब्लॉगरों में एकमत था कि "यह सम्भव नहीं है और उचित भी नहीं है…")। दूसरे दिन वैचारिक सत्र के अगले भाग में ब्लॉगरों के चार-पाँच के समूह बनाकर ब्लॉगिंग से सम्बन्धित अलग-अलग विषयों पर विचार-विमर्श किया गया, इसमें हमारे समूह के हिस्से जो विषय आया, वह था "हिन्दी ब्लॉगिंग में सभ्याचरण (एटीकेट्स)"। हमारे समूह में सुरेश चिपलूनकर (उज्जैन), डॉ श्रीमती अजित गुप्ता (उदयपुर), डॉ महेश सिन्हा (रायपुर), संजीत त्रिपाठी (रायपुर) एवं श्री विवेक सिंह (पानीपत) शामिल किये गये थे। हम पाँचों की सहमति और आपसी चर्चा के पश्चात यह पेपर तैयार करके सत्र में पेश किया गया… इसमें प्रस्तुत विचार और सुझाव "सामूहिक" हैं।

हिन्दी ब्लॉगिंग में सभ्याचरण ("एटीकेट्स")…

      देखा जाये तो हिन्दी ब्लॉगिंग को अब हम आयु के हिसाब से परिपक्व कह सकते हैं, परन्तु संख्या बल के लिहाज़ से यह अभी परिपक्व तो क्या, शैशव अवस्था तक भी नहीं पहुँची है। क्योंकि जहाँ एक तरफ़ हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास सन 2001 से भी पहले तक जाता है यानी लगभग 10 वर्ष हो चुके हैं, वहीं दूसरी तरफ़ यदि हिन्दी ब्लॉग्स की संख्या देखी जाये तो शायद 25,000 भी पार नहीं करेगी। इन बीस-पच्चीस हजार में भी मुश्किल से 1000 या 1500 ब्लॉग्स ही ऐसे होंगे जो नियमित रुप से अपडेट (अद्यतन) होते रहते हैं, और लेखक जिस पर लगातार लिखते रहे हैं। बाकी के 20-22000 से अधिक ब्लॉग्स या तो शौकिया बना लिये गये हैं या सिर्फ़ यह जताने के लिये कि "मैं भी ब्लॉग लिखता हूं, मेरा भी ब्लॉग है…" (क्योंकि अमिताभ बच्चन की वजह से ब्लॉग लिखना भी आजकल लग्ज़री और आत्मप्रशंसा माना जाने लगा है)। इनमें से भी कुछ ब्लॉग्स ऐसे हैं जिनमें काफ़ी सम्भावना दिखती है, लेकिन अधिकतर सिर्फ़ महीने में 1-2 पोस्ट लिखने तक ही सीमित हैं। फ़िर भी इसे उल्लेखनीय तरक्की तो कहा ही जा सकता है।
      तात्पर्य यह है कि पिछले 2 से 3 वर्ष में ही हिन्दी के ब्लॉग लेखन में अचानक उछाल आया है और कई पाठक अब लेखक बन गये हैं या बनने की कगार पर हैं, परन्तु हिन्दी ब्लॉगिंग में ब्लॉगर्स की सीमित संख्या को देखते हुए "एथिक्स" के नियम-कायदों की बात करना शायद अभी जल्दबाजी होगी। किसी भी पेशे में, विधा में, कला में, "एथिक्स" अर्थात नैतिकता अथवा आचरण सम्बन्धी नियम-कानून एक तरह से "अलिखित कानून" की तरह होते हैं, कुछ ऐसे सर्वमान्य नियम-कायदे जो कि कहीं भी लिखित रुप में मौजूद नहीं होते, लेकिन सामान्यतः सभी लोग उसका पालन करते हैं। सभी मामलों में नैतिकता अथवा आचरण सम्बन्धी आग्रह पहले-पहल एक समूह द्वारा शुरु किये जाते हैं, नये आने वालों को उसका पाठ पढ़ाया जाता है, जो उसका पालन नहीं करता उसकी लानत-मलामत और बहिष्कार तक किया जाता है… अन्त में एक मोटा-मोटी अलिखित सी आचार संहिता बन ही जाती है, जिसका पालन सभी लोग करने लगते हैं।
      चूंकि हिन्दी ब्लॉगिंग में सक्रिय लेखकों की संख्या बहुत कम है और समूचा हिन्दी क्षेत्र इतनी विभिन्न प्रकार की सामाजिक-राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं में धँसा-फ़ँसा हुआ है कि स्वाभाविक तौर पर प्रत्येक लेखन पर बहस-मुबाहिसा, तीखे तर्क-वितर्क, गुटबाजी, वैमनस्यता, गाली-गलौज जैसी स्वाभाविक बुराईयाँ आ ही जाती हैं। जैसे-जैसे ब्लॉगर्स की संख्या बढ़ेगी, लिखने वाले अपनी मर्जी से किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता के मुताबिक अपने लेखन पर ध्यान केन्द्रित करेंगे, उनका एक विशिष्ट पाठक वर्ग तैयार होगा, लोग उन्हें विभिन्न एग्रीगेटर्स और गूगल रीडर या फ़ीड में सब्स्र्काइब करके पढ़ने लगेंगे यह तमाम गंदगी अपने-आप दूर हो जायेगी, क्योंकि कई लोगों को, कई बार तो यह पता ही नहीं चलेगा कि किस ब्लॉगर ने कौन सी विवादास्पद बात कही है या किसी का किसी से कोई धार्मिक-जातीय-राजनैतिक विवाद चल रहा है। ज़ाहिर है कि सारा खेल संख्या बल का है, जैसे एक पोखर के पानी के गंदे होने की सम्भावना 99% होगी, लेकिन एक विशाल नदी के प्रदूषित होने की सम्भावना 10% भी नहीं होगी। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि ब्लॉगर्स की संख्या बढ़ने पर आचार-विचार और नैतिकता सम्बन्धी सभी समस्याएं जादू के जोर से गायब हो जाएंगी, लेकिन फ़िर भी उनमें बहुत कमी अवश्य आयेगी।
      वैसे तो ब्लॉगिंग करना एक नितांत व्यक्तिगत शौक और उपल्ब्धि होती है, लेकिन फ़िर भी चूंकि आप अपनी "इंटरनेट डायरी" लोगों को पढ़वा रहे हैं उसे पूरे विश्व के लोगों के लिये खोल रहे हैं तो ज़ाहिर है कि आपको उसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों-दबावों को झेलना ही पड़ेगा। वैसे तो ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में भी एक सामान्य आचरण संहिता लगभग वैसी ही होती है, जैसी कि हम लोग अपने रोज़मर्रा के जीवन में सभ्य आचरण करते हैं, फ़िर भी कुछ अलिखित नियम ऐसे हैं जिनका पालन-पोषण सभी ब्लॉगर्स करें तो निश्चित ही ब्लॉगिंग और समाज का भला होगा।

1) यदि ब्लॉग बनाया है तो इस बात की कोशिश करें कि उस पर नियमित लिखें, ऐसा भी नहीं कि दिन में 2-4 पोस्ट ठेल दीं और ऐसा भी नहीं कि महीने-दो महीने में सिर्फ़ एक पोस्ट लिखकर भूल गये… लेखन में नियमितता होनी चाहिये, निरन्तरता होनी चाहिए। धीरे-धीरे पाठक निश्चित ही जुटेंगे… जब ऐसा लगने लगे कि आप बहुत व्यस्त रहने वाले हैं और कई दिनों तक कुछ लिख नहीं पायेंगे तो इसी बात पर एक पाठकों को सूचना देते हुए एक माइक्रो पोस्ट अवश्य लिखें… वरना पाठक एक-दो बार आपके ब्लॉग पर आयेगा, कोई नई पोस्ट नहीं पाकर निराश होगा और वापस कभी नहीं आयेगा।

2) दुनिया में सिर्फ़ मैं और मेरी पोस्ट ही नहीं है न ही मैं सर्वश्रेष्ठ और सर्वज्ञाता हूं, इसलिये यदि ऐसी कोई भावना है तो मन से निकाल दें… दूसरे लोग क्या लिख रहे हैं उसे पढ़ें, उस पर टिप्पणी करें, वहाँ चल रही बहस में हिस्सा लेने का प्रयास करें… लगातार सकारात्मक और तथ्यात्मक टिप्पणियाँ करने से अन्य लोग आपके नाम को ध्यान से देखने लगेंगे और फ़िर निश्चित रुप से आपके ब्लॉग पर भी आएंगे…

3) सामान्य जनजीवन का आचरण हिन्दी ब्लॉगिंग की आभासी दुनिया में भी बरकरार रखें, जैसे कि यदि किसी महिला के ब्लॉग पर जायें और टिप्पणी करें तो मर्यादा भरे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, यही व्यवहार किसी बुज़ुर्ग या अपने से उम्र में बड़े व्यक्ति के ब्लॉग पर जाने पर भी करें… इससे आपकी भी इज़्ज़त बढ़ेगी, और दूसरे भी अपने-आप उस अदृश्य परम्परा का निर्वहन करने लगेंगे।

4) यदि राजनैतिक या सामाजिक विषय पर ब्लॉग लिखते हैं तो ब्लॉगर अपने लेखन में यदि तारतम्यता, तथ्यात्मक विश्लेषण और भाषागत रोचकता बना सकें तो अति-उत्तम होगा। जब कोई पाठक ब्लॉग पर आये तो उसे वह ब्लॉग "झिलाऊ" किस्म का उपदेशात्मक नहीं लगना चाहिए, लेखक की शैली ऐसी हो कि पाठक लम्बा लेख पढ़ते समय भी बोर नहीं हो।

5) ब्लॉग को लोकप्रिय और पठनीय बनाने के लिये यह भी जरूरी है कि आप अपने पाठकों से जीवंत संवाद बनाये रखें, इसलिये ब्लॉग पर आने वाले कमेण्ट्स को पब्लिश करें। स्पैम मेल भेजने वालों और गाली-गलौज करने वालों से बचने के लिये मॉडरेशन टूल का उपयोग जरुर करें, लेकिन मॉडरेशन का उपयोग अपने विरोधी की टिप्पणी हटाने या रोकने के लिये नहीं करें… जहाँ तक सम्भव हो अपने विरोधियों की टिप्पणी को जरुर प्रकाशित करें, भले ही वे आपकी आलोचना करें या मजाक उड़ायें… जब भी कोई कमेण्ट डिलीट करें तो सबूत के तौर पर उसकी एक कॉपी रख लें ताकि बाद में कोई मिथ्या आरोप लगने पर आप अपनी स्थिति सबके सामने स्पष्ट कर सकें कि वह टिप्पणी क्यों हटाई गई।

6) अपने ब्लॉग पर जो भी लिखें पूरी जिम्मेदारी से लिखें, जहाँ तक हो सके तथ्यात्मक बनें, कहीं से लिंक लेने पर उस लिंक का उल्लेख करें, कहीं से रेफ़रेंस लेने पर उस लेखक का नाम, अखबार का नाम और वेबसाइट का पता अवश्य दें, इससे ब्लॉग और लेखक की विश्वसनीयता बढती है।

7) भले ही आज के तकनीकी दौर में आपकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में जानकारी को सार्वजनिक करने में एक खतरा है, लेकिन फ़िर भी मैं यह सुझाव दूंगा कि अपने ब्लॉग पर अथवा अपनी वेबसाइट पर कम से कम आपकी फ़ोटो, निवास स्थान और ईमेल पता तो होना चाहिए। महिला ब्लॉगर्स के लिये यह थोड़ा असुविधाजनक हो सकता है लेकिन पुरुषों को अपनी पहचान सार्वजनिक करने से घबराना नहीं चाहिए…

8) दूसरे लेखकों के अन्य ब्लॉग्स जो आपको पसन्द हों उनका एक ब्लॉगरोल बनाकर अपने ब्लॉग पर साइड बार में लगाएं और उन लेखकों के पसन्दीदा लेखों की लिंक अपने लेख में भी देते रहें ताकि अन्य पाठकों को भी फ़ायदा हो तथा जो नये पाठक हैं वे भी जानें कि हिन्दी ब्लॉगिंग में भी अच्छा-खासा लेखन हो रहा है…

9) ब्लॉग पर आई हुई टिप्पणियों और व्यक्तिगत ईमेल का जवाब देने की भरसक कोशिश करें, यदि आपकी आलोचना या विरोध में कोई टिप्पणी आई है तो सधे हुए नम्र शब्दों में तार्किक रुप से अपनी बात सामने वाले तक पहुँचाने का प्रयास करें। ऐसा हो सकता है कि कई बार गालियाँ खाने के बाद आपको भी गुस्सा आ जाये तो "साले तू हरामजादा है…" की बजाय शालीन शब्दों में "भाई साहब, आप तो बड़े हरामजादे हैं…" कह सकते हैं। तात्पर्य यह कि लेख या टिप्पणी की भाषा, शालीन, मर्यादित और सामान्य आचरण में सर्वमान्य हो, ऐसी होना चाहिये।

10) अपने ब्लॉग को तकनीकी रुप से जल्दी खुलने वाला रखें, अर्थात खामखा के गैजेट्स, घड़ियाँ, तस्वीरें, वीडियो इत्यादि न लगायें, क्योंकि इस वजह से ब्लॉग खुलने में देरी होती है (कोई जरुरी नहीं कि हरेक के पास ब्राडबैण्ड हो)… ऐसे में पाठक आपका ब्लॉग खुलने से पहले ही वहाँ से भाग सकता है।

11) अपने ब्लॉग का प्रचार करने के लिये किसी को थोक में ई-मेल न भेजें, यदि पहली बार भेज दिया है और पाने वाले ने आपको मेल भेजने से मना कर दिया है तो उससे माफ़ी मांगते हुए दोबारा कभी अपने ब्लॉग की लिंक ई-मेल न करें। इसी प्रकार दूसरे के ब्लॉग्स पर टिप्पणी करते समय भी गैरजरुरी लिंक्स का प्रचार न करें, इससे आपकी छवि भी खराब होती है और पाठक झुंझलाता है।
      इस प्रकार देखा जाये तो यह कुछ सामान्य शिष्टाचार के अलिखित नियम हैं जिन्हें हम ब्लॉग एथिक्स कह सकते हैं, हालांकि कोई भी इन नियमों को मानने के लिये बाध्य नहीं होता, लेकिन जब एक बड़ा समूह इन्हें फ़ॉलो करने लगता है तो कुछ "भटके हुए" और शैतान ब्लॉगर भी धीरे-धीरे सीधे रास्ते पर आ जाते हैं। इन नियमों में से अमूमन इनकी सबसे अधिक आवश्यकता राजनैतिक लेख लिखने वाले ब्लॉगर्स को होती है, क्योंकि कहानी-कविता-संस्मरण-यात्रा वृत्तांत-पहेलियाँ जैसी बातें ब्लॉग पर लिखने वालों को "इनपुट" के रुप में पाठकों की ओर से कोई विशेष समस्या प्राप्त नहीं होती है, परन्तु राजनैतिक लेख लिखने वाले को कई प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, आगे भी पड़ सकता है।
      बहरहाल, ब्लॉग एथिक्स वगैरह सब बाद की बातें हैं सबसे पहले जिनका ब्लॉग नहीं है वह अपना एक ब्लॉग बनाएं, यदि ब्लॉग है तो उस पर लिखना शुरु करें, यदि पहले से लिख रहे हैं तो सक्रिय रुप से लिखें (एक हफ़्ते में कम से कम 2-3 पोस्ट तो लिखें ही लिखें), अपना एक विशिष्ट पाठक वर्ग बनाएं, अपनी एक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय पहचान बनाएं… फ़िर चार गालियाँ खाएंगे, दस लानत झेलेंगे, सौ बेहूदगियाँ पाएंगे… तो धीरे-धीरे ब्लॉगिंग के एथिक्स-वेथिक्स सब अपने-आप सीख ही जायेंगे…
      जय हिन्द, जय हिन्दी, वन्देमातरम…

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वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन में समूह चर्चा के पश्चात पेश किया गया -
सुरेश चिपलूनकर
डॉ श्रीमती अजित गुप्ता
डॉ महेश सिन्हा
संजीत त्रिपाठी
विवेक सिंह
(वर्धा - दिनांक 10 अक्टूबर 2010, प्रातः 11.00 बजे)

14 टिप्पणी:

ajit gupta said...

इतने दिनों बाद क्‍यों? वैसे पूर्व में ही पढ़ ली गयी थी।

सोमेश सक्सेना said...

चिपलूनकर जी के विचार पठनीय व विचारनीय हैं.

प्रवीण पाण्डेय said...

सुना था, स्मृति में था, पुनः ताजा हो गया।

jay said...

बहुत बढ़िया.वास्तव में ब्लोगरों के लिए स्व-नियंत्रण का मानक तय करने वाला अच्छा सूत्र. अच्छी संहिता. निश्चय ही इस विधि-निषेध को अपना कर ब्लॉग जगत अपने को परिपक्व बना सकता है.
पंकज झा.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर जी, यादे ताजा हो गई

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बहुत सही। ऑलमोस्ट पूरी सहमति!

anitakumar said...

एक बार फ़िर से सुखद यादें ताजा हो गयीं। खास कर उनका लास्ट सेंटेस् गाली भी दो तो प्यार से, जोर का झटका धीरे से…।:)
सुरेश जी से मिलना बहुत सुखद रहा, उनसे मिलने से पहले मैं उनके नाम से ही कांप जाती थी इतना तीखा लिखने वाला व्यक्ति पता नहीं कितना गुस्सैल होगा लेकिन वो तो इतने संवेदनशील निकले कि मेरा पूरा डर काफ़ूर हो गया और अब तो कभी कभार मजाक करने की भी हिम्मत कर लेती हूँ…:)

ललित शर्मा said...

बहुत बढिया राय है आप लोगों की।
विचार होना चाहिए।

आभार

aradhana said...

बहुत अच्छी बातें हैं. मेरी भी पूरी सहमति.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

आपलोगों की सामूहिक राय से हम भी सहमत हैं, भविष्‍य में टिप्‍पणियों व आत्‍मप्रशंसा की अदम्‍य आकांक्षा से परिपूर्ण लिखे गए पोस्‍टों की औकात स्‍वयं ही सामने आ जायेगी जब ब्‍लॉगों पर बिना टिप्‍पणी किए/हो हल्‍ला किए फीड सब्‍सक्राईबर पाठकों की संख्‍या बढ़ जायेगी.

Suresh Chiplunkar said...

@ अनिता कुमार जी -

क्या तीखा लिखने वाले या उग्र विचारों वाले लोगों को "भयानक" दिखना चाहिये? :) :) :)

बाल ठाकरे का चेहरा नगर निगम के क्लर्क जैसा दिखता है… लेकिन विचार देखिये…

हिटलर का कद साढ़े पाँच फ़ुट और टूथब्रश जैसी मूँछें, एकदम चिरकुट लगता है… लेकिन विचार देखिये…

आक्रामकता "मन के भीतर" से, दिमाग से भी आती है, चेहरे-मोहरे, हाव-भाव से नहीं…

बल्कि मुझे आप से डर लगता था कि इतनी पढ़ी-लिखी प्रोफ़ेसर महिला हैं, और कहाँ मैं… क्या बात करूंगा उनसे… :)

:) :) स्माइली जोड़िये इसमें ढेर सारे…

cgsongs said...

आपके समूह का सामूहिक विचार सचमुच विचारनीय व अमल में लाने योग्य है.

bilaspur property market said...

नूतन वर्ष मंगलमय हो आप की लेखनी नित नवीन साहित्य व ज्ञान
का सृजन करे आप को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये ..

Satish Chandra Satyarthi said...

सौ प्रतिशत सहमत.. अभी हिन्दी ब्लोगिंग को बढाने का समय है.. एथिक्स-वेथिक्स सब अपने आप सीख जायेंगे.. कोइ गालियाँ लिखता है.. लिखने दीजिए... अपने आप थक जाएगा.. और फिर भविष्य में कोइ गूगल पर हिन्दी में गालियाँ ही सर्च करे तो उसे भी तो लगे कि ये मैटेरिअल भी उपलब्ध है हिन्दी में :) :)

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आपकी राय बहुत ही महत्वपूर्ण है।
अत: टिप्पणी कर अपनी राय से अवगत कराते रहें।
शुक्रिया ।