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23 October 2007

हमारे शहर का अनाथालय और वहां के बच्चे

19 तारीख को अपने पिता की पुण्यतिथि के अवसर पर शहर के अनाथालय मे जाना हुआ, वहां के बच्चों को नाश्ता-भोजन करवाने के लिए। दो साल हो गए वहां जाते। पिता जीवित थे तब वो अक्सर इस अनाथालाय के प्रांगण मे स्थित खादी एवम ग्रामोद्योग कार्यालय की बैठकों के लिए जाते ही रहते थे अत: हम बचपन से ही इस अनाथालय के नाम से परिचित थे।

इस अनाथालय का स्वरुप बदलते हमने देखा है, पहले यह खपरैल वाला, बड़े से मैदान वाला हुआ करता था फ़िर समय के साथ बदलाव आता गया मैदान छोटा होता गया, खपरैल गायब होकर कांक्रीट की बिल्डिंग मे बदलता गया और आज आलम यह है कि वहां जाने पर बिल्डिंग्स के बीच में यह अनाथालय अर्थात "बाल आश्रम" खोया हुआ सा लगता है। खैर, हमे इस बाल आश्रम के बारे मे हल्की फ़ुल्की जानकारी तो थी ही लेकिन फ़िर सोचा कि आज और जानकारी बटोर ली जाए तो हमारे अंदर का पत्रकार जागा और वहां के कर्मचारी से बाल आश्रम के इतिहास और वर्तमान तक की बातें करना लगा। बातों से वहां की अंदरुनी राजनीति और घोषित-अघोषित भ्रष्टाचार की जो जानकारी मिली वो तो अलग से एक लंबा चिट्ठा है पर फ़िलहाल हम उस आश्रम और उसकी अच्छी बातों को यहां रखते हैं।

हमारे भतीजे वहां के बच्चों को परोसते जा रहे थे और हमने इस बीच जो जाना--

1924 में महंत लक्ष्मीनारायण दास, बालचंद व यतियतन दास, शिवदास डागा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, पंडित रविशंकर शुक्ल और लक्ष्मणराव उद्गीरकर ( सभी जानेमाने समाजसेवी व स्वतंत्रता सेनानी) ने मिलकर हिंदु अनाथालय की स्थापना की जिसके लिए बालचंद ने अपनी पांच एकड़ जमीन दी।
इसका मूल उद्देश्य अनाथ, निराश्रित बच्चों का पालन पोषण कर , शिक्षा देकर उत्तम नागरिक बनाना। 1948 मे स्वतंत्रता के पश्चात इस अनाथालय का नाम बदलकर "बाल आश्रम" रखा गया। मध्यप्रदेश सरकार प्रति बच्चे सौ रुपए के हिसाब से इस संस्था को मदद करती रही फ़िर बाद में जैसे-जैसे संस्था स्वावलंबी होती
गई नियमों के तहत वह सरकारी मदद बंद हो गई।

संस्था स्वावलंबी कैसे बनी- संस्था के पास पांच एकड़ खुली जमीन थी, जिस पर आज कई बिल्डिंग्स तनी खड़ी है जिनमे एक कन्या महाविद्यालय है, एक लड़को का स्कूल है, स्टेटबैंक की एक हरदम व्यस्त रहने वाली शाखा है, कई दुकाने हैं, दफ़्तर है, दो-तीन चिकित्सकों के व्यस्त रहने वाले क्लिनिक है। व्यस्त शब्द का प्रयोग हम
इसलिए कर रहे हैं ताकि आप इसके "लोकेशन" का अंदाज़ा लगा सकें, वैसे जानकारी के लिए बता दें कि यह बाल आश्रम शहर के बीच में ही कहा जाएगा, कचहरी और कलेक्ट्रेट के सामने ही स्थित है। आजू मे एक बड़ा सा व्यवसायिक कांप्लेक्स है तो बाजु मे एक बड़ा होटेल। तो कुल मिलाकर आश्रम को होने वाली मासिक आय का अनुमान लगाया जा सकता है। तो इस किराए के कारण ही यह संस्था स्वावलंबी बनी, नुकसान सिर्फ़ इतना ही कि खुली जगह मे बस एक छोटा सा मैदान कहा जा सकने वाला हिस्सा ही बाकी है।

तो इस आश्रम में बच्चों को पांच से अठारह साल की उमर तक रखा जाता है उनके शिक्षा के लिए उन्हें आश्रम प्रांगण मे ही स्थित स्कूल राष्ट्रीय विद्यालय मे भरती करवाया जाता है। आश्रम बच्चों को बारहवीं तक पढ़वाने की जिम्मेदारी लेता है। कर्मचारी से मिली जानकारी के मुताबिक पहले मध्यप्रदेश सरकार राजकीय अनुरक्षण गृह में अठारह से ज्यादा उमर वाले बच्चे को जो मेट्रिक/बारहवीं पास कर चुके होते थे उन्हे रखकर तकनीकी शिक्षा जैसे आई टी आई आदि की प्रदान करती थी ताकि वह रोजगार पाकर अपनी ज़िंदगी बना सकें। फ़िर बाद मे म प्र सरकार ने इस राजकीय अनुरक्षण गृह को "किसी" देशपांडे नामक महिला वाली संस्था विनोबा आश्रम के हवाले कर दिया जो इसे चला नही सकी और यह बंद हो गया। तब से बाल आश्रम के बच्चे बारहवीं के बाद से ही अपना जुगाड़ खुद करने को मजबूर हैं।

पांच साल से छोटे बच्चे को यहां नही रखा जाता क्योंकि ऐसी कोई व्यवस्था यहां नही है, ना ही यहां लड़कियों को रखा जाता है। बताया गया कि समय-समय पर जिला प्रशासन निराश्रित बच्चों को इस आश्रम में भिजवा देता है और भिजवा कर भूल जाता है ऐसे ही दो भाईयों से हमारी बात भी हुई जो कि क्रमश: सात और नौ साल के आसपास उमर के थे। रायपुर से करीब 60-65 किमी दूर किसी गांव मे इन बच्चों का अपना हंसता खेलता परिवार था, मां थी, पिता थे और इन दोनो बच्चों समेत तीन भाई। पता नही इनकी मां को क्या बीमारी हुई कि उसके इलाज़ में पांच एकड़ जमीन जाती रही। अपना व इन बच्चों का पेट भरने की खातिर पिता को मजदूरी करनी पड़ी लेकिन एक दिन अचानक गड्ढा खोदते समय इन बच्चों के पिता को हार्ट अटैक आया और वह चल बसा।
तब इन दोनो बच्चों को प्रशासन ने बाल आश्रम में भिजवा दिया जबकि इनका बड़ा भाई रायपुर से लगे औद्योगिक इलाके उरला-सिलतरा में रहकर नौकरी कर अपना पेट पालता है।

वर्तमान में यहां 107 बच्चे हैं। इस आश्रम से निकले कुछ बच्चों ने न केवल अपना बल्कि इस आश्रम का भी नाम रोशन किया है, कर्मचारी से मिली जानकारी के मुताबिक एक श्री चरणलाल साहु हैं जो आज सुप्रीम कोर्ट में वकील है, एक स्वर्गीय विष्णु शर्मा जो कि स्थानीय विश्वविद्यालय मे मनोविज्ञान के एच ओ डी थे। इसके अलावा कई बच्चे मिलिट्री मे भी रहें। और आज भी हैं।

इतनी सब बातें जानने और करने के बाद मन मे यही ख्याल आ रहा था कि शुरुआत करने वाले तो एक बहुत अच्छी और निस्वार्थ भाव से शुरु करते हैं पर बाद मे उस काम को संभालने वाले अगर उसमे व्यवसायिकता और स्वार्थ का घालमेल कर दें तब???

अनाथालय के बच्चों के लिए अपने स्तर पर कुछ करने की इच्छा तो है ही और अब मन हो रहा है कि एक चक्कर अपने शहर के कुष्ठ रोगी आश्रम का भी लगा कर आया जाए क्योंकि हमारे पिता किसी जमाने मे कुष्ठ रोगियों के सेवा कार्य से भी जुड़े थे।

19 टिप्पणी:

Shiv Kumar Mishra said...

इसे शुरू करने वालों ने सचमुच बढ़िया काम किया था....समय बदलने के साथ-साथ बाकी चीजें भी बदलती रहती हैं...लेकिन आशा है कि इस आश्रम के चलाने वाले कम से कम स्वार्थ को आगे नहीं आने देंगे....

बहुत बढ़िया जानकारी दी, संजीत...ये पोस्ट लोगों के लिए प्रेरणा का काम कर सकती है.

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति असली ज़िंदगी के दर्शन तो अनाथालयो मे ही किए जा सकते है |

मीनाक्षी said...

आपकी पोस्ट पढ़कर जहाँ आपको आभार प्रकट करना है , वहीं शब्द कुछ और कहने को मूक हो जाते हैं.. शब्द बोलते नहीं, चाहते है कि हम कुछ करें.

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ALOK PURANIK said...

मार्मिक है जी, जो अच्छे काम दिल में आ रहे हैं फौरन कर गुजरिये।
अच्छा मैने नोट यह किया है कि जब आप नजर का चश्मा लगाकर फोटू पेश करते हैं, तो पोस्ट बहुत सात्विक होती है।
जब धूप का चश्मा लगाकर पोस्ट लिखते हैं, तो खासी आवारगी भरी होती है। अगर चश्मे से इस तरह मनस्थिति में बदलाव आता हो, तो क्या कहने, यार ऐसे चार-चश्मे अपन को भी भिजवाओ ना।

Gyandutt Pandey said...

आपके पिताजी की स्मृति में सादर नमन। निराश्रितों के प्रति अपने कर्तव्य को समझना और उस दिशा में सार्थक कार्य करना मानव के बड़प्पन की पहचान है। आपके पिताजी निश्चय ही सार्थक जीवन जिये।
आपने जो जानकारी दी उसके लिये भी धन्यवाद।

Mired Mirage said...

आपका लेख पढ़कर खुशी हुई । व्यवसायीकरण बुरा चाहे लगे किन्तु यदि इससे आश्रम स्वावलंबी हो गया तो अच्छा ही हुआ । आलोक जी सही कह रहे हैं क्या?
घुघूती बासूती

satyendra... said...

bahut barhiya likha aapne, banaras me bhee tamam aasram hai aur ab vo sab flop show bankar rah gaye hai. Abhi waha halat acchi hai is-se khushi hui.

Udan Tashtari said...

पिता जी की याद को सादर नमन.

बहुत सुन्दर पोस्ट. प्रेरणादायक. बहुत ही उत्तम एवं सार्थक कार्य.

बोधिसत्व said...

आपको पढ़ कर सचमुच अच्छा लगा। यह काम लोगों को एक नई दिशा दे सकता है। बधाई

आभा said...

रायपुर के लोग कितना नेक काम कर रहे हैं....सब को और आपको भी इस जानकारी को हम तक पहुचाने के लिए आभार

रंजू said...

मार्मिक और एक याद गार लेख है यह आपका सजीत जी ...आलोक जी की बात बहुत मजेदार लगी :)
शुभ काम है यह शुभकामना के साथ
रंजू

Sanjeeva Tiwari said...

बहुत ही अच्‍छी जानकारी दी है संजीत जी आपने, रायपुर के ही अनेकों लोगों को यह जानकारी नही थी ।

सार्थक प्रयास, धन्‍यवाद

Manish said...

लीक से हटकर एक अच्छा विषय चुना आपने। अच्छा लगा पढ़कर।

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

देर से आने के लिये माफ करे। आप और संजीव जी मिलकर बढिया काम कर रहे हो। राज्य और शहर की अच्छाइयो पर कम ही लिखने वाले मिलते है।

काकेश said...

बहुत ही उत्तम एवं सार्थक कार्य कर रहे हैं आप. आभार.

विनीत कुमार said...

बहुत अच्छा लगा पढ़कर,समझिए कि समाज की जिन गतिविधियों का विस्तार होना चाहिए था,निर्मम बाजार लील कर गया,अब तो डर है कि इस अनाथालय को किसी बहुराष्ट्रीय एनजीओ के हाथ न दे दिया जाए,संजीत भाई आप इस पर नजर बनाए रखेंगे और जरुरत पड़ी तो अपन कुछ लोग दिल्ली से भी चल पड़ेगे।

अनूप शुक्ल said...

पांच साल पहले की पोस्ट आज पढ़कर अच्छा लगा। उस समय के लोगों की टिप्पणियां भी अच्छी लगीं।

Rahul Singh said...

इस संस्‍था के बारे में इतने करीब से पहली बार जाना. बाबूजी के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि.

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शुक्रिया ।