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11 October 2007

मन

मन
शांत
नीला गहरा जल

जैसे मन
पर
सागर का जल तूफ़ान से पहले ही शांत रहता है
कहीं मन मे छाई इस शांति के बाद
तूफ़ां तो नही उठेगा
भावनाओं की लहरों प डूबता उतरता मन
सोचों के जंगल मे भटकता मन
स्थिर नही होता मन
लोगों की बातों को सोचता मन
बहुत कुछ पाकर भी असंतुष्ट रहता मन
आखिर चाहता क्या है मन

18 टिप्पणी:

मीनाक्षी said...

मन आखिर चाहता क्या है
मन स्वयं ही नही जानता !
उसकी अनगिनत चाहें
हर दिशा से आती राहें.

रुकने को,ठहरने को कहो पर
मन किसी की नही मानता !

ALOK PURANIK said...

सच्ची में सीरियस हो रहे हैं। खुशी की बात है।

रंजू said...

ह्म्म्म्म्म:) गड़बड़ है संजीत जी ...:) चलो कुछ तो सीरियस हुए आप अपने लिए
एक के बाद एक धमाकेदार कविता :) बहुत सुंदर लिखा है आपने
सच में मन क्या चाहता है यह समझ आ जाता तो जीना आसान हो जाता :)
पर यह तो उड़ता फिरता है :) बधाई सुंदर रचना के लिए

विनीत कुमार said...

भटकाव और उलझन में अपने ढंग की सर्जना होती है, जिसकी परिणति आपकी कविता है..लेकिन ख्याल रहे कविता की सृजनात्मकता के साथ-साथ जीवन भी सुंदर बनता रहे, यानि हमेशा खुश रहने की जी-तोड़ कोशिश

anuradha srivastav said...

कहीं ये वाकई तूफान से पहले की शान्ति तो नहीं-
बहुत कुछ पाकर भी
असंतुष्ट रहता मन
आखिर चाहता क्या है मन
संजीत जी दिल में झांक कर पूछो-
क्या उत्तर मिला ,अरे नहीं समझे क्या ?
बाबा एक अदद बीबी।
मन का भटकाव खत्म हो जायेगा जनाब।

Divine India said...

सीमाएँ जिसकी अनंत हो उसकी क्रिया भी
अनूठी ही होगी…
अच्छे भाव…।

anitakumar said...

यही तो दुविधा है न जी कि इस मन को कोई समझ ही नही पाता चाहे कोई कित्ता भी विद्वान हो ले। अकारण हसता है ये मन और कभी रोता है ये मन

Udan Tashtari said...

सच में-बहुत घबड़ाहट हो रही है. किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाओ कोई इन्हें. ये क्या हो गया-कौन सा रोग पाल बैठे. संगत तो तुम्हारी हम जैसी अच्छी थी-फिर कैसे???

बेहतरीन झील की गहराई में उतर रहे हो, बधाई एवं शाबास!!!

काकेश said...

आप सीरियस अच्छे नहीं लगते जी.

Dard Hindustani (पंकज अवधिया) said...

अरे कोई तो पता करे। यह ब्लाग हैक तो नही हो गया है। कही हमारे संजीत को तो किसी ने हैक नही कर लिया--?--?--?

पर लिख बढिया रहे हो।

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर ! बहुत समय बाद आपकी कविता पढ़ी ।
घुघूती बासूती

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत बढ़िया, संजीत.

मन की भावनाएं.....लेकिन इतना सोचने के बाद भी मन क्या चाहता है, कुछ पता नहीं..

Sanjeeva Tiwari said...

अहा, स्‍वागत है आपकी कविताओं का, पर मैं बधाई नहीं दूंगा आपके खजाने में और भी अच्‍छी, अच्‍छी कवितायें हैं । कुकरी के प्रति के अंश याद आ रहे हैं -
किया न तूने बतलाने का अब तक कभी प्रयास
किस सीमा के पार रूचिर है तेरा चिर आवास
सुना, स्‍वर्णमय भूमि वहां की मणिमय है आकाश
... मन मे तेरे मंडराते हैं, रह रह कौन विचार

बोधिसत्व said...

मन क्या चहता है यह कौन जान पाया है मन के नैन हजार.....अच्छा कहन है....भाई

Reetesh Gupta said...

बढ़िया है ...कविताओं ने आपका दामन थाम लिया है ...अच्छा लगा

sunita (shanoo) said...

मन से अच्छा द्वंद चल रहा है
मन मगर कब ठहरा है
मन की सुनेगा भी कौन?
मगर आज आपका चिन्तन सचमुच गहरा है
एक श्रेष्ठ रचना के लिये बधाई

सुनीता(शानू)

Mrs. Asha Joglekar said...

मन की चाहों का कोई और छोर नही
खींचना चाहो भी तो बंधी कोई डोर नही
ये उन्मुक्त करे विचरण
इसके कहीं रुकते नही चरण

सुंदर रचना, एक ही व्यक्ती के कितने पहलू होते हैं।

seema gupta said...

mun to chanchal hotta hai bhatkta rehta hai kabee aakash mey kabhee sagar mey
kabhee dil kee attha gehraee mey
"mun ke chahat assemet hotee hai jo kabhee pure nahee hotee chah kr bhee nahee"

beautiful, liked reading it ya.

Regards

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