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18 July 2007

कलाम की "मुस्कान" और छत्तीसगढ़ के अखबार

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में आने वाली नकारात्मक खबरों पर नाखुशी जाहिए करते हुए पिछले दिनों राष्ट्रपति ए पी जे अब्दुल कलाम नें क्या कहा यह जानने के लिए यहां क्लिक करें
राष्ट्रपति महोदय की बातों पर गौर फ़रमाते हुए अगर हम अपने आसपास के हिन्दी अखबारों को देखें तो हमारे शहर से कई अखबार निकलते हैं एक तो स्वतंत्रता से पूर्व का और छत्तीसगढ़ का पहला अखबार है "महाकौशल" जो कि मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल द्वारा प्रारंभ किया गया था यहां कई स्वतंत्रता सेनानियों ने पत्रकारिता की थी और हमारे पिता भी उन्ही में से एक थे! महाकौशल आज भी छपता है पर शायद स्वांत: सुखाय के लिए। रायपुर से छपने वाले प्रमुख अखबार हैं, देशबन्धु-, नवभारत, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, जनसत्ता और नई दुनिया, इनमें से दैनिक भास्कर 1988-89 में नव-भास्कर के नाम से शुरु हुआ जबकि जनसत्ता और हरिभूमि एक दूसरे के आसपास 2002-03 में यहां से छपने शुरु हुए है। नई दुनिया रायपुर संस्करण को तो अभी एक साल भी पूरा नही हुआ है। इनके अलावा भी बहुत से अखबार यहां से निकलते हैं जिनके उद्देश्य भी बहुत से हैं।

तो हम बात कर रहे थे कि "खबरें ऐसी हों, जो लाएं मुस्कान" तो राष्ट्रीय स्तर पर बहुत से अखबारों ने किया होगा पर छत्तीसगढ़ में इस तरह का प्रयोग करते हमने सिर्फ़ देशबन्धु अखबार को ही देखा है।

देशबन्धु ने एक बार साल के पहले दिन अखबार के पहले पन्ने पर समाचारों की साइज़ के कॉलम तो बना दिए पर उन कॉलम्स के बीच जगह कोरी छोड़ दी थी इस टिप्पणी के साथ कि पाठक खुद तय करें कि वह साल के पहले दिन प्रमुख पन्ने पर कैसी खबरें पढ़ना चाहेंगे। इसी तरह एक और मौके पर , शायद वह भी साल का पहला ही दिन था इसी अखबार ने अपने पहले पन्ने पर समूचे छत्तीसगढ़ से चुन-चुन कर लोगों की सामूहिकता, मानवीय सफ़लता और जीवटता की खबरें छापी, कोई बुरी या दुखद खबर पहले पन्ने पर नहीं। हमारी जानकारी में कम से कम रायपुर में ऐसा प्रयोग करते हमने किसी और अखबार को नही देखा है।

रायपुर के अखबारों की बात चल ही रही है तो हम यह भी बता दें कि बावजूद इसके कि हम यहां खुद जनसत्ता व नवभारत और अन्य कुछ समाचार पत्रों मे काम कर चुके हैं फ़िर भी स्थानीय स्तर पर हमें देशबन्धु ही सबसे ज्यादा पसंद रहा है। घर में पिता जी का पसंदीदा अखबार यही रहा तो जब से हमने होश संभाला और जिस अखबार अक्षर-अक्षर जोड़कर अखबार पढ़ना सीखा तो वह देशबन्धु ही था।

नवभारत अखबार के कई संस्करणों मे बरसों गुजारने के बाद 1958 में रायपुर आए स्व श्री मायाराम सुरजन ने 1959 में अपना खुद का अखबार शुरु किया जो कि देशबंधु ही था। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कई जगह से छपने वाले इस अखबार को हम नि:संदेह जमीन से जुड़ा अखबार कह सकते हैं ( यह अलग बात है कि पिछले साल यहां कर्मचारियों की लंबी हड़ताल की वजह से अखबार कितने दिन बंद रहा) ग्रामीण पत्रकारिता के लिए विख्यात स्टेट्समेन अवार्ड भी देशबंधु के पत्रकार कई बार पा चुके हैं।

बचपन में छपी खबरें तो याद नही लेकिन दो स्तंभ आज भी याद है एक तो "रायपुर डायरी" जिसमें सभी सिटी रिपोर्टर ऐसी बातें कहते थे जो खबरों मे नही कही जा सकती थी और इस डायरी को "दरवेश" के मुंह से कहलवाया जाता था। दूसरा था "घूमता आईना", इस स्तंभ को तब शायद आज के वरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकार श्री राजनारायण मिश्र जी लिखा करते थे। इन्हें हम ही नही बल्कि रायपुर का सारा पत्रकारिता जगत सम्मान व स्नेह से "दा" कहता हैं। "दा" आज भी अपने पत्रकारिता धर्म का निर्वाह कर रहे हैं एक साप्ताहिक अखबार निकाल रहे हैं एक पत्रिका निकालने की तैयारी में है और दैनिक भास्कर रायपुर में सलाहकार संपादक की भूमिका भी निभा रहे हैं। हमारे किशोरावस्था से ही हम देशबन्धु में संपादक के रुप में सुनील कुमार जी को देखते आए जो कि आजकल स्वयं का सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़निकाल रहे है और बखूबी चला रहे हैं। सुनील कुमार जी के कॉलम आजकल को कभी नही भुलाया जा सकता। स्थानीय संपादक के रुप में यहां छात्र जीवन में हमने रुचिर गर्ग जी को देखा जो कि अब शायद सहारा चैनल के छत्तीसगढ़ प्रमुख की ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं। रुचिर गर्ग जी के कॉलम "इस शहर का कोई माई-बाप नही" को याद करें तो एक बार उन्होंने गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के पहले दिन अपने कॉलम में लिखा और जोरदार लिखा कि प्रशासन स्वतंत्रता सेनानियों से ज्यादा अहमियत मंत्री और अफ़सरों को देता है इसीलिए कार्यक्रम में सेनानियों को मंत्रियों और अफ़सरों के पीछे बैठाया जा रहा है, बस कॉलम छपा और रातोंरात ही बैठक व्यवस्था बदल कर सेनानियों को आगे बैठाया गया था। ऐसे ही कई उदाहरण है इन दोनो सज्जन के बेबाक लेखन के।

देशबन्धु अखबार में उसकी खबरों से ज्यादा अहमियत उसमें छपने वाले आलेखों व संपादकीय की रही! नक्सली मामलों में नक्सलियों का पक्ष अगर छत्तीसगढ़ के किसी अखबार में आता रहा तो वह सर्वप्रथम देशबन्धु ही है। अक्सर क्रेडिट्लाईन होती थी " बस्तर के बीहड़ जंगलों से लौटकर फ़लां फ़लां की रपट" । इन रपट में ना केवल नक्सलियों का पक्ष रखा जाता था बल्कि उनके इंटरव्यू भी हुआ करते थे। यह बात इसलिए उल्लेखित कर रहा हूं कि यही मीडिया का दायित्व है कि दोनो पक्षों की बात को बराबरी से पाठकों के सामने रखे, अफ़सोस कि अब नक्सलियों का पक्ष यहां के समाचार पत्रों से करीब करीब गायब ही होता जा रहा है, शायद इसके पीछे नक्सली हिंसा का बढ़ता जाना भी एक प्रमुख कारण है। देशबन्धु ही वह अखबार है जिसने छत्तीसगढ़ी में पूरा एक पेज "मड़ई" नाम से हर हफ़्ते निकाला है!! देशबन्धु अखबार को यहां एक तरह से पत्रकारिता स्कूल का दर्जा प्राप्त रहा है। अपने की बोर्ड के सिपाही नीरज दीवान भी यहीं की उपज हैं, जो कि हमारे साथ जनसत्ता में भी रह चुके हैं।

तो यह थी हमारे पसंदीदा रहे एक अखबार की बात , जिसमे अब नही है वो बात!!


13 टिप्पणी:

shanoo said...

संजीत जी हमने तो आपके देश-बंधु अखबार को अपने कंप्यूटर में सेव कर लिया है...हाँ आपका लिखा ठीक है अखबार में प्रथन पृष्ठ पर वही होना चाहिये जो अब्दुल कलाम ने कहा...ये क्या सुबह-सुबह लूट-पाट,मार-धाड़ कुछ मनोरंजक खबरे होनी चाहिये जो हम चाय की चुस्कियों के साथ पढ़ पायें...मगर एसा कहीं किसी अखबार या न्यूज चेनल में नही बचा है,एक खबर पकड़ते है और उसी के पीछे लग जाते है,बाकि दुनिया में क्या हो रहा है इससे कोई सरोकार नही...लेख आपने अच्छा लिखा है...


सुनीता(शानू)

Udan Tashtari said...

आपके यहाँ जबलपुर का जब दीपक सुरजन (माया राम जी के सुपुत्र) का देशबन्धु, माहेश्वरी जी का नवभारत, अग्रवाल जी का दैनिक भास्कर सब आता है, तो हमारे स्वतंत्र मत (हितकारिणी सभा द्वारा संचालित) का जिक्र न देख कर बड़ा अजीब लगा..वो नहीं बंटता क्या?

अगर नहीं, तो बतायें, हम देखते हैं कि क्यूं और कैसे नहीं बंटता !!!

vimal verma said...

कलाम की "मुस्कान" और छत्तीसगढ के बारे में लिखा आपने !!

yunus said...

भाई उड़न तश्‍तरी जी ने साबित कर दिया कि वे ठेठ जबलपुरिया हैं । बहरहाल देशबंधु मैंने बहुत बचपन से पढ़ा है । पहले भोपाल संस्‍करण । फिर जबलपुर संस्‍करण । देशबंधु के उस कॉलम का जिक्र करना चाहूंगा जिसे बाद में पुस्‍तक रूप में छापा गया । ‘पूछिये परसाई से’ । बरसों बरस परसाई जी ना जाने किन किन सवालों के जवाब देते रहे । जब जबलपुर पहुंचे तो हम परसाई से मिलने गये, पूछा कि आप जवाब कहां कहां से खोज लाते हैं । याद रहे वो इंटरनेट का जमाना नहीं था और हमारे शहर की फटियल लाइब्ररी के बारे में आप भी जानते ही हैं । तो परसाई जी ने कहा कि ज्ञानार्जन एक सतत प्रक्रिया है, और ये जो सवाल बच्‍चों और युवकों के मन में आते हैं उनके जवाब देना मेरा फर्ज है । यहां ये जिक्र भी करना है कि पूछिये परसाई से पुस्‍तक रूप में छपी पर हमारा ही कोई मित्र उसे उड़ा ले गया है । हम जब भी उस पुस्‍तक को याद करते हैं तो कलपते हैं । क्‍या करें इन पुस्‍तक उड़ा ले जाने वालों का । देशबंधु में रविवार को साहित्‍य की काफी जगह होती थी । कविताएं कॉलम की शक्‍ल में छपती थीं । और कहानियां भी ।
पता नहीं आज क्‍या स्थिति है ।
पर ये तो तय है कि अखबार सबेरे सबेरे दिमाग़ ख़राब करने का काम कर रहे हैं । छ0ग0 के अखबार अगर इसको लेकर सचेत हैं तो ये हर्ष का विषय है ।

Gyandutt Pandey said...

भैया, अंचल की खबर पढ़ने का सुख और ही है. आपको धन्यवाद.

Sanjeeva Tiwari said...

संजीत भाई, आपने देशबंधु के संबंध में जानकारी देकर हमारे भी मन में इस समाचार पत्र के संबंध में दबी श्रद्धा को जागृत कर दिया है। हम भी यूनूस भाई के द्वारा उल्लिखित स्‍तंभों के पाठक रहे हैं और सही मायने में साहित्‍य और अंचल के रचनाकारों से इसी समाचार पत्र के द्वारा ही वाकिफ हुए हैं, हमारे शुरूआती रचनाओं को इसने ही स्‍थान दिया था और अहम बात यह कि हमने पत्रकारिता का एबीसीडी भी इसी समाचार पत्र के सिमगा संवाददाता हमारे मित्र के साथ 1986-86 में सीखी थी । पुन: धन्‍यवाद । देर से टिप्‍पणी देने के लिए क्षमा।

Isht Deo Sankrityaayan said...

मित्र कलाम साहब की बात अपनी जगह सही है, लेकिन अगर इस पर अमल किया जाने लगे तो यह भी एक अति ही होगी. ज़रा सोचिए, संसद की जूतम पैजार, किसानों-मजदूरों की गला घोटाई, सरकार की दमनकारी नीतियाँ - इन्हें आप पहले पन्ने पर न दें तो फायदा किसका होगा? फिर तो राजनेताओं की बल्ले-बल्ले होगी. हाँ हत्या-बलात्कार जैसी खबरों को जैसी प्रमुखता दी जाती है, उससे बचने की बात अगर आप कहें तो मैं जरूर सहमत हूँ.

Maulik's Blog said...

Think Positive, Get Positive.

Media Doesnt build Nation, its help to build Nation. If every media work with responsibility and try to make every news positive and impactable thn India Will Shines faster.

And Respected Kalam sir's views is very much right about good news on front page.

Mukul said...

namaste,

aapka chittha pada. bahut hi rochak aur samsaamayik jaan pada.

khushi ki baat hai ki chhattisgarh se bhi hindi ke shreshth blog saamne aa rahe hain.

likhna zaari rakhiyega!

aapko Orkut par dhoondha, aap mile nahin to socha yahin par badhai de doon. main bilaspur ka rehne waala hoon, shaayad aap Raipur se honge. Agar Orkut par aapki pravishthi ho to zaroor sandesh chhodiyega!

bhavdiya,

mukul

http://www.orkut.com/Profile.aspx?uid=808581360787293976

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लेख लिखा है।कुछ् दिन पहले मायाराम सुरजनजी की आत्मकथा पढ़ी थी। उसमें देशबन्धु को रायपुर में जमाने के किस्से हैं।

सफल प्रहरी said...

निसंदेह देशबंधु जमीन से जुड़ा अखबार रहा है पहले कभी इस अखबार का परचम मध्यप्रदेश मे लहराया करता था . यह अखबार कभी जबलपुर शहर मे काफी लोकप्रिय था बदलते समय केसाथ इसकी लोकप्रियता मे कमी आई है . साथ ही माननीय कलाम के विचारो से सहमत हूँ कि पाठक की पसंद के अनुसार मैटर प्रकाशित हो साथ ही एक बात कहना चाहता हूँ कि आजकल मीडिया द्वारा हिंसा,अपराध,अंधविश्वास, आदि के समाचार जबरन प्रकाशित किए जा रहे है जो सभी पाठक गण पसंद नही करते है . बहुत सुंदर आलेख के लिए धन्यवाद

सफल प्रहरी said...

bhai hamare yahan jabalapur Express sanat jain ka sath hi ek akhabaar or hai Hindi Express (evening pepar) bhi hai

सफल प्रहरी said...

निसंदेह देशबंधु जमीन से जुड़ा अखबार रहा है पहले कभी इस अखबार का परचम मध्यप्रदेश मे लहराया करता था . यह अखबार कभी जबलपुर शहर मे काफी लोकप्रिय था बदलते समय केसाथ इसकी लोकप्रियता मे कमी आई है . साथ ही माननीय कलाम के विचारो से सहमत हूँ कि पाठक की पसंद के अनुसार मैटर प्रकाशित हो साथ ही एक बात कहना चाहता हूँ कि आजकल मीडिया द्वारा हिंसा,अपराध,अंधविश्वास, आदि के समाचार जबरन प्रकाशित किए जा रहे है जो सभी पाठक गण पसंद नही करते है . बहुत सुंदर आलेख के लिए धन्यवाद

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