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25 July 2010

अब बड़ी लकीर खींची जाए

अब बड़ी लकीर खींची जाए
अरविंद उप्रेती
प्रभाष जोशी के बनाए जनसत्ता को आज भी बदले हुए हालत में हम लोग निकाल रहे है. आलोचना करना बहुत आसान होता है और कुछ कर दिखाना बहुत मुश्किल. फिर भी यह सही है कि बहुत से साथी आज भी इस मशाल को जलाए हुए है. प्रभाष जोशी परंपरा न्यास को लेकर हुए विवाद और फ़ालतू की बहस के बाद मैंने साथी अंबरीश कुमार से यही कहा कि फिर बड़ी लकीर खींच दो जो काम वे पहले भी कर चुके है.

प्रभाष जोशी खुद एक जिम्मेदारी अंबरीश को पिछले साल जुलाई में दे चुके है वह था जनसत्ता और देश भर में इससे जुड़े पत्रकारों की जानकारी देने वाली पुस्तक का प्रकाशन .इसका शीर्षक खुद प्रभाष जोशी ने दिया और आधा काम हो भी चुका है. इसे जल्द पूरा कर प्रकाशित करवाना अंबरीश कुमार की जिम्मेदारी है. पिछली बार अंबरीश के साथ प्रभाष जी से जब मिले रथे तो दो अन्य मुद्दों पर बात हुई थी जो प्रभाष जी करना चाहते थे जिसमे एक देश के अख़बारों का एक संग्रहालय बनाना और दूसरा भाषा को लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में वर्कशाप करना. संग्रहालय के लिए अंबरीश ने चेन्नई में जयप्रकाश नारायण की पत्नी के नाम बने प्रभावती देवी ट्रस्ट के लोगों से बात भी कर ली थी और वे चेन्नई शहर के बीच बड़ी जगह उपलब्ध करने को तैयार भी थे. पर बाद में इसे भोपाल में बनाने की बात हुई.

पर दूसरा काम यानी पत्रकारिता की भाषा को लेकर वर्कशाप करने का काम शुरू किया जाना चाहिए. शुरुवात छत्तीसगढ़ से हो जहा अंबरीश कुमार के शुरू किए जनसत्ता की टीम अभी भी सक्रिय है. अनिल पुसदकर, राजकुमार सोनी, भारती, संजीत आदि को इसमे मदद करनी चाहिए. इसके बाद मध्य प्रदेश में आलोक तोमर तो उत्तर प्रदेश में सत्य प्रकाश त्रिपाठी मदद कर सकते है. यह एक बड़ा काम होगा.


इसके अलावा पत्रकारों की सामाजिक सुरक्षा को लेकर अंबरीश केंद्र सरकार की तरफ से गठित वेज बोर्ड पर दबाव बनाने में मदद करे और इसमे असंगठित पत्रकारों का सवाल भी जोड़े. जिलों-जिलों में काम करने वाले ज्यादातर पत्रकारों को न तो वेतन मिलता है और न ही कोई खास सुविधा. अनहोनी होने पर कोई मदद को भी सामने नहीं आता. ऐसी स्थिति कई छोटे अख़बारों के पत्रकारों की भी है.
ऐसे में हम लोगों को इस विवाद को विराम देते हुए और बड़ी लकीर खींचनी चाहिए.


(अरविंद उप्रेती जनसत्ता की शुरूआती टीम से है. इस समय दिल्ली जनसत्ता में उप समाचार संपादक और इंडियन एक्सप्रेस एम्प्लाइज यूनियन के अध्यक्ष है. इन्होंने ने ही अंबरीश कुमार को जनसत्ता में ज्वाइन कराया था. जब अंबरीश कुमार ने छत्तीसगढ़ में इंडियन एक्सप्रेस ब्यूरो संभाला तो छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार रम्मू श्रीवास्तव और बब्बन प्रसाद मिश्र से मिलवाने उनके साथ गए थे जिनके साथ अरविंद ने जबलपुर में काम किया था)

5 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय said...

हल तो बड़ी लकीर खींचने में ही है।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

सहीं है विवादों से दूर रह कर उल्‍लेखनीय कार्य में जुए जांए यही उचित होगा।

हमें भरोशा है कि आप लोग छत्‍तीसगढ़ में अम्‍बरीश जी के सहयोग के लिए सदैव तत्‍पर रहेंगें।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पत्रकारिता की भाषा पर काम होना बहुत आवश्यक है। आज अखबारों में जो हिन्दी देखने को मिलती है उस पर बहुत अफसोस होता है।

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी सोच है । मेरी शुभ कामनाएँ आप सभी साथियों के साथ हैं । - आशुतोष मिश्र

खबरों की दुनियाँ said...

अच्छी सोच है । शुभ कामनाएँ । आगे बढ़ना ही बेहतर होगा । -आशुतोष मिश्र

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