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21 June 2009

खदबदाहट के बीच जैसे पकना

भीतर की खदबदाहट जैसे उकसाती है………वही खदबदाहट जो चूल्हे पर चढ़े भात के बर्तन में होती है………………पर जब इसमें उफान आता है तो फिर क्या होता है………कारण मालूम नहीं इस खदबदाहट का……लेकिन इक बेचैनी सी तारी रहती है……… हावी नहीं होता खुमार किसी चीज का……………लेकिन भरी रहती है वह बेचैनी जो अक्सर असंतुलित सा कर देती है मन को……मन की क्या बात करें……इसे तो खुद ही नहीं मालूम कि आखिर इसे चाहिए क्या……क्या अंत है इसकी चाहतों का……लेकिन यह चाहत भी क्या है……बस इक भूलभूलैया ही न……फिर भी मन क्यों उलझता ही रहता है इस भूलभूलैया में……कहीं कुछ बीता सा…कहीं कुछ छूटा सा………पल-पल सरकता है जैसे हाथों से छूटा जा रहा हो ……उसके बाद भी लगता है जैसे समय बीता भी नहीं और लेकिन दिन जरूर बीत गया………कैसे……यह पता नहीं चलता……कैसी है यह छटपटाहट……क्यों है यह बेचैनी…… अंतस की बेचैनी………आंखे जैसे उस सूरज को देखना चाहती है जिसे निकलते हुए कभी देखा नहीं………दिखता है चांद छुटपन से बुजुर्गियत से लेकिन उसकी शीतलता भी नहीं कर पाती यह छटपटाहट……यह खदबदाहट …धीमी आंच का चूल्हा और उस पर चढ़ा हुआ भात का बरतन जिसमें जारी ही रहती है खदबदाहट……लिखता तो रोज हूं पर दिल कहता है कि अपने लिए लिख……लिख……और लिख………अखबारी कागज पर लिखना और उन लिखे शब्दों का कल बासी हो जाना……लेकिन दिल का लिखना कब………लिखने बैठूं तो सोचता हूं क्या लिखूं……दिखते जमाने को लिखूं या उसे लिखूं जो इस दिखते जमाने के बीच नहीं दिखता……अपने को लिखूं तो उस अपने को लिखूं जिसे सब जानते हैं या उस अपने को लिखूं जिसे सिर्फ मैं जानता हूं…………लेकिन लिखूं क्या………यूं ही जब तैरते पानी में डाली आंखे……तो दिखी कुछ झांकती-उभरती परछाईयां उन पर लिखूं या न लिखूं……तैरता पानी तो आंखों में भी होता है, परछाईयां उसमें भी उभरती है……क्या इस दर्द को लिखूं……दर्द तो उनका है जो रोजाना अपने अपनों को खो रहे हैं और सरकारें खामोश बैठी देखती रहती हैं क्योंकि न्याय की आंखों पर काली पट्टी बंधी है, उनमें न तैरता पानी है न ही उसमें परछाईयां झांकती-उभरती हैं क्योंकि काली पट्टी बंधी है……पट्टी तो सिर्फ आंखों पर ही बंधी है कान खुले हैं लेकिन उन कानों तक वह आर्तनाद क्यों नहीं पहुंचता जो सड़क पर चलते हुए सुनते शोर के उपर से भी हमें सुनाई देता है……लगता है मुझे किसी की पुकार नहीं सुनाई देती सड़क पर लेकिन वह आर्तनाद हर पल मुझे भेदते रहता है……अंतस को………छलनी किए रहता है……इस भरी गर्मी में शाम को राहत भरे एक झोंके की तलाश में सड़कों पर भटकना चाहते हुए भी नहीं भटक पाता…राहत है कहां………शिखर से पाताल तक राहत कहीं और ही है………लेकिन कहां………यही तो खदबदाहट है……ठीक उस भात के बरतन की खदबदाहट की तरह……इस खदबदाहट के बीच खोए हुए जब कलम हाथ में आती है तो समझ में नहीं आता कि क्या लिखूं………और कैसे लिखूं…………चूल्हे की धीमी आंच में………खदबदाहट और……पकता हुआ भात………क्या यह पकने की ही प्रक्रिया है जो अंतस में खदबदाहट चलाए हुए है……

10 टिप्पणी:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जानबूझ कर बहरे बने लोगों तक कोई आवाज नहीं पहुँचती। उन को स्थानच्युत करना होता है।

Mahesh Sinha said...

मन की व्यथा मन ही जाने

Anil Pusadkar said...

चिंता मत करो कभी तो भात पकेगा।मन की व्यथा को मन मे ही दबाये रखोगे तो खदबदाहट के बाद बर्तन के फ़टने का डर भी सामने आयेगा।सो सब कुछ भूल कर फ़िर से अपने काम मे लग जाओ।

anitakumar said...

हमेशा की तरह एक और बेहतरीन लेख , मन को छूता हुआ।
वैसे तो मेरी यादाश्त पर समय की गर्द पढ़ रही है लेकिन अगर मैं भूल नहीं रही तो ये पोस्ट रीठेल है न?

Udan Tashtari said...

ये आज एकदम अलग तरह का लिख गये भई भात पकने के चक्कर में.

bablu tiwari said...

शादी कर लो भईया, तब भात की खदबदाहत पर ध्यान ही नहीं जाएगा, क्योंकि तब चिंता रहेगी भात पकने के बाद उसे खाने के लिए नून-तेल का इंतजाम करने की। मन को कंट्रोल में रखो, अभी तो सिस्टम के हिसाब से ही चलो नहीं तो सिस्टम आपको बदल देगा। वह चाहे शरीर की हो या समाज की। रही बात सामाज कि तो इसके लिए टीएन शेषन का उदाहरण हमारे सामने है, सिस्टम के हिसाब से चलकर वे सिस्टम को बदनले की ताकत वाले पद पर पहुंचे, और जब पहुंचे तो अपनी खदबदाहट को सामने लाकर सिस्टम को बदल दिया..और अपना योगदान समाज-देश को दे गए..

anuradha srivastav said...

संजीत बहुत दिनों के बाद तुम्हें पढा ....... तुम्हारी व्याकुलता ,अकुलाहट उलझाती भी है पर अगले ही पल ये व्याकुलता,अकुलाहट तमाम लोगों की बैचेनी का प्रतिनिधित्व भी करती है।
दूसरा पहलू- भाईजान शादी कर ही लो ः) ।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

खदबदाते भात को देखना एक आध्यात्मिक अनुभव है। मैं यह हल्के से नहीं कह रहा। यह कई बार अनुभूत कर चुका हूं। अब कुकर में भात बनने से वह अनुभव कम हो गया है।

अभिषेक ओझा said...

पोस्ट पढने से तो कहीं भी इस खदबदाहट और कुंवारा होने में कोई सम्बन्ध नहीं दिखा. लेकिन टिपण्णीयां पढने से तो कुछ और ही संकेत मिल रहा है :)

अमिताभ श्रीवास्तव said...

khdbadaahat..pakna..
mere vichar se meri kavita ki do panktiya he ki-
"jitna tapataa sonaa
uatana nikhartaa he.."
ab ise yu kah lo ki
jitanaa pakoge uatne nikhroge.../
kher..//apni mansikataa ko behtreen dhang diyaa he aapne..//

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